मंदिर के बारे में

केदारनाथ मन्दिर भारत के उत्तराखण्ड राज्य के रूद्रप्रयाग जिले में स्थित है। हिमालय पर्वत की गोद में केदारनाथ मन्दिर बारह ज्योतिर्लिंग में सम्मिलित होने के साथ चार धाम और पंच केदार में से भी एक है।
यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। केदारनाथ मंदिर अपने सामने बहने वाली मंदाकिनी नदी के साथ बर्फ से ढके और ऊंचे पहाड़ों के बीच स्थित होने की वजह से लाखों श्रद्धालुओं को अपनी तरफ आकर्षित करता है। वर्तमान केदारनाथ मंदिर का निर्माण आदि शंकराचार्य द्वारा किया गया है हिमालय की देवभूमि में बसे इस तीर्थ स्थान के दर्शन केवल 6 महीने ही होते है

केदारनाथ मंदिर का इतिहास और कहानी

महाभारत के युद्ध के बाद पांडव अपने ही गोत्र-जन की हत्या के पापा से मुक्ति पाना चाहते थे। इसके लिए पांचों पांडव भगवान शिव के दर्शन करने के लिए केदार क्षेत्र में गए, लेकिन वहां उन्हें भगवान के दर्शन न हो सके। भगवान शिव महिष यानी बैल रूप धारण करके पशुओं के झुंड में शामिल हो गए और पांडवों को दर्शन न देकर ही जाने लगे। भीम ने भगवान शिव को पहचान लिया और उन्हें पकड़ने के लिए दौड़े। भीम भगवान शिव का केवल पृष्ठभाग यानी पीठ का हिस्सा ही पकड़ सके। ऐसा होने पर पांडव बहुत दुखी हो गए और भगवान शिव की तपस्या करने लगे। पांडवों की भक्ति से खुश होकर भगवान शिव ने आकाशवाणी की और कहा कि भगवान शिव के उसी पृष्ठ भाग की शिला रूप में स्थापना करके, उसी की पूजा की जाए। भगवान शिव के उसी पृष्ठभाग की शिला को आज केदारनाथ के रूप में पूजा जाता है।

केदारनाथ मंदिर की वास्तुकला

केदारनाथ मंदिर वास्तुकला का आकर्षक व अद्भुत नमूना है। केदारानाथ मंदिर की जितनी मान्यता है इसकी कारीगरी उतनी ही देखने लायक है। यह मंदिर छह फीट ऊंचे चौकोर चबूतरे पर बना हुआ है। ये मंदिर असलार शैली में बना हुआ है, जिसमें पत्थर स्लैब या सीमेंट के बिना ही एकदूसरे में इंटरलॉक्ड हैं। महाभारत में भी मंदिर क्षेत्र का उल्लेख मिलता है। मंदिर में एक गर्भगृह है। इस गर्भ गृह में नुकीली चट्टान भगवान शिव के सदाशिव रूप में पूजी जाती है। बाहर प्रांगण में नंदी बैल वाहन के रूप में विराजमान है। मंदिर के पीछे कई कुंड बने हुए हैं, जिनमें आचमन और तर्पण किया जा सकता है।

केदारनाथ मंदिर से जुड़ी रोचक बातें

    • केदरानाथ मंदिर महज एक नहीं बल्कि पांच अलग-अलग मंदिरों का संमूह है। इन सभी में शिव जी के विभिन्न अंग गिरे थे। इसलिए इसे पंच केदार के नाम से भी जाना जाता है।
    • यह मन्दिर छह फीट के एक ऊंचे चौकोर चबूतरे पर बना हुआ है। मन्दिर में मुख्य भाग मण्डप और गर्भगृह के चारों ओर प्रदक्षिणा पथ है।
    • इस मंदिर के कपाट सर्दियों में बंद रहते हैं क्योंकि भारी बर्फबारी के कारण मंदिर बर्फ से ढक जाता है। केदारनाथ के दर्शनों के लिए बैशाखी बाद गर्मियों में इस मंदिर को खोला जाता है। इस बार इस मंदिर के कपाट 9 मई को खोले गए हैं और ये कपाट 29 अक्टूबर को बंद हो सकते हैं।
    • दीपावली के बाद पड़वा के दिन जब मंदिर के द्वार बंद होते है, तो उस मंदिर में एक दीपक जला देते हैं। 6 माह बाद जब मई में पुजारी वापस केदारनाथ लौटते हैं तो वह दीपक उनको जलता हुआ मिलता है।
    • आश्चर्य की बात तो यह है कि मंदिर को जब खोला जाता है तो उसमें वैसी ही साफ सफाई रहती है, जब उसे बंद करने के समय की गई रहती है।
    • केदारनाथ के कपाट जब बंद होते हैं तो पुजारी भगवान शिव के विग्रह एवं दंडी को 6 माह तक पहाड़ से नीचे ऊखीमठ में ले जाते हैं और वहीं उनकी पूजा करते हैं। 6 माह बाद फिर उन्हें वापस लाते हैं।
    • केदारनाथ मंदिर सुबह 4 बजे से ही खुल जाता है लेकिन भोलेनाथ के दर्शन सुबह 6 बजे से ही होता है। दोपहर में 3 से 5 बजे तक कपाट बंद करते हैं, उस दौरान विशेष पूजा होती है। शाम को 7.30 बजे से 8.30 बजे तक आरती होती है, इससे पहले भगवान पंचमुखी केदारनाथ का विशेष श्रृंगार होता है।