मंदिर के बारे में

काशी विश्वनाथ मंदिर जिसे विश्वेश्वर महादेव मंदिर भी कहा जाता है। बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है काशी विश्वनाथ जिसकी गिनती मोक्षदायिनी सप्त पुरियों में होती है। यह नगरई इक्यावन शक्तिपीठों में से एक शक्तिपीठ (मणिकर्णिका विशालाक्षी) के कारण भी विशेष महत्व रखती है। संसार के प्राचीनतम नगरों में से एक है। यही कारण है कि देश के हर कोने से भगवान शिव के भक्त यहां दर्शन पूजन करने के लिए आते हैं।

काशी विश्वनाथ मंदिर का इतिहास

इसका उल्लेख महाभारत और उपनिषद में भी किया गया है। ईसा पूर्व 11वीं सदी में राजा हरीशचन्द्र ने जिस विश्वनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था उसका सम्राट विक्रमादित्य ने जीर्णोद्धार करवाया था। उसे ही 1194 में मुहम्मद गौरी ने लूटने के बाद तुड़वा दिया था।

विश्वनाथ मंदिर के भवन का निर्माण किस वर्ष किया गया, यह अभी तक अज्ञात है। इतिहासकारों के अनुसार इस भव्य मंदिर को सन् 1194 में मुहम्मद गौरी द्वारा तोड़ा गया था। इसे फिर से बनाया गया, लेकिन एक बार फिर इसे सन् 1447 में जौनपुर के सुल्तान महमूद शाह द्वारा तोड़ दिया गया। पुन: सन् 1585 ई. में राजा टोडरमल की सहायता से पं. नारायण भट्ट द्वारा इस स्थान पर फिर से एक भव्य मंदिर का निर्माण किया गया। इस भव्य मंदिर को सन् 1632 में शाहजहां ने आदेश पारित कर इसे तोड़ने के लिए सेना भेज दी। सेना हिन्दुओं के प्रबल प्रतिरोध के कारण विश्वनाथ मंदिर के केंद्रीय मंदिर को तो तोड़ नहीं सकी, लेकिन काशी के 63 अन्य मंदिर तोड़ दिए गए।
वर्तमान मंदिर का निर्माण महारानी अहिल्या बाई होल्कर द्वारा सन 1780 में करवाया गया था। बाद में महाराजा रणजीत सिंह द्वारा 1853 में 1000 कि.ग्रा शुद्ध सोने द्वारा बनवाया गया था।

काशी विश्वनाथ मंदिर के बारे में रोचक तथ्य

  • बाबा विश्वनाथ के नाम से दुनिया भर में प्रसिद्ध यह शिवलिंग 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। कहा जाता है कि गंगा किनारे स्थापित इस मंदिर की स्थापना 1490 में हुई थी।
  • ऐसी पौराणिक मान्यता है कि भगवान शिव गंगा के किनारे इस नगरी में निवास करते हैं। उनके त्रिशूल की नोक पर काशी बसी है। भगवान शिव काशी के पालक और संरक्षक है, जो यहां के लोगों की रक्षा करते हैं।
  • विश्वनाथ मंदिर के अंदर एक गर्भगृह है जो काले पत्थर से बना एक मंडप और शिवलिंग को समेटे हुए है। यह चांदी की चौकोर वेदी में स्थापित है।मंदिर परिसर में कालभैरव, भगवान विष्णु और विरूपाक्ष गौरी के छोटे छोटे मंदिर हैं।
  • काशी विश्वनाथ मंदिर के ऊपर एक सोने का छत्र लगा हुआ है। ऐसा मान्यता है कि इस छत्र के दर्शन से लोगों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
  • बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी के बारे में एक और बात कही जाती है कि जब पृथ्वी का निर्माण हुआ तो सूर्य की पहली किरण काशी पर ही पड़ी थी।
  • काशी नगरी को मोक्ष की नगरी भी कहा जाता है। मान्यता है कि बाबा विश्वनाथ के दरबार में उपस्थिति मात्र से ही भक्त को जन्म-जन्मांतर के चक्र से मुक्ति मिल जाती है।
  • सावन के माह में बाबा विश्वनाथ के दरबार में हाजिरी लगाने के लिए देश-विदेश से लोग आते हैं। उस दौरान अभिषेक से भगवान शिव जल्द प्रसन्न होते हैं और भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं। हालांकि, सोमवार के दिन भी यहां भारी संख्या में भक्त काशी के राजा महादेव के दर्शनों के लिए विशेष तौर पर आते हैं।
  • आदि शंकराचार्य, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, बामाख्यापा, गोस्वामी तुलसीदास, स्वामी दयानंद सरस्वती, सत्य साईं बाबा और गुरुनानक सहित कई प्रमुख संत इस स्थल पर आये हैं।
  • पवित्र नदी गंगा में नहाकर पूरे विधिविधान से विश्वनाथ मंदिर में पूजा करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।
  • इस मंदिर को आक्रमणकारियों ने कई बार निशाना बनाया। मुगल सम्राट अकबर ने प्राचीन मंदिर को दोबारा बनवाने का आदेश दिया था, जिसे बाद में औरंगजेब ने तोड़वा डाला। वहां पर उसने मस्जिद का निर्माण कराया, जो ज्ञानवापी मस्जिद के नाम से जाना जाता है।
  • बताया जाता है कि लोगों को जब पता चला कि औरंगजेब इस मंदिर को तोड़ना चाहता है तो भगवान शिव के ज्योतिर्लिंग को एक कुएं में छिपा दिया गया। वह कुआं आज भी मंदिर और मस्जिद के बीच में स्थित है।
  • उसके बाद इंदौर की रानी अहिल्याबाई होल्कर ने बाबा विश्वनाथ के इस प्राचीन मंदिर का पुनर्रुद्धार कराया। मृत्यु, समय और काल से परे भगवान शिव फिर से यहां पूजे जाने लगे। एक बार फिर देवों के देव महादेव के दर्शनों के लिए भक्त उमड़ने लगे।

आरती समय

श्री काशी विश्वनाथ मंदिर में श्री काशी विश्वनाथ की 5 आरतियाँ हैं:

मंगला आरती: – 3.00 – 4.00 (सुबह)।
भोग आरती: – 11.15 से 12.20 (दिन)।
संध्या आरती: – 7.00 से 8.15 (शाम)।
शृंगार आरती: – 9.00 से 10.15 (रात)।
शयन आरती: – 10.30-11.00 (रात्रि)।

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि काशी विश्वनाथ मंदिर भोर में ढाई बजे खुलता है। मंदिर खुलने के बाद सुबह तीन से चार बजे के बीच मंगला आरती होती है। यह बहुत विशेष प्रकार की आरती है, जिसमें शामिल होने के लिए शुल्क लगता है। इसके बाद सुबह चार बजे से ग्यारह बजे तक मंदिर श्रद्धालुओं के लिए खोल दिया जाता है। 11:15 से 12:20 के बीच भोगी आरती होती है और मंदिर के देवालय का फाटक बंद कर दिया जाता है। इसके बाद दो बजे के बाद मंदिर फिर से खुलता है। सात बजे से सवा आठ बजे तक सप्त ऋषि या सांध्य आरती होती है, नौ बजे से सवा दस बजे तक श्रृंगार आरती होती है और साढ़े दस बजे से 11 बजे के बीच शयन आरती होती है। रात ग्यारह बजे मंदिर बंद हो जाता है।

सुरक्षा व्यवस्था के लिए मंदिर के अंदर किसी भी प्रकार के सेल फोन, कैमरा, धातु की बक्कल के साथ बेल्ट, सिगरेट, लाइटर आदि ले जाने की अनुमति नहीं दी जाती है।

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