शिव या महादेव देवताओ में त्रिदेव का सबसे अलग स्थान प्राप्त है और इसमें ब्रह्मा को सृष्टि का रचियता, भगवान् विष्णु को संरक्षक और भगवान् शिव को विनाशक कहा जाता हैं। सर्वप्रथम शिव ने ही धरती पर जीवन के प्रचार-प्रसार का प्रयास किया इसलिए उन्हें ‘आदिदेव’ भी कहा जाता है। ‘आदि’ का अर्थ प्रारंभ। आदिनाथ होने के कारण उनका एक नाम ‘आदिश’ भी है। इन्हें भोलेनाथ, शंकर, महेश, रुद्र, नीलकंठ, गंगाधार आदि नामों से भी जाना जाता है। परंतु शैव संप्रदाय के अनुयायी शिव को परमतत्व मानते हैं। वास्तव में शिव का स्वरूप सर्वाधिक जटिल है। शिव का रूप घोर भी है, अघोर भी। भयानक या भयंकर है, तो शिवकर भी है।

शिव स्वरूप

भगवान शिव का व्यक्तित्व इतना विराट है कि उसका पूरा चित्र प्रस्तुत कर पाना असंभव है। दरअसल शिव के इस स्वरूप की रचना कलाकारों ने पौराणिक काव्यो और कथाओं में भगवान शिव के चरित्र चित्रण के आधार पर की है।
इसलिये भगवान शिवशंकर के इस पौराणिक स्वरूप की जो छवि हम चित्रों या मूर्तियों के माध्यम से देखते हैं। उनके स्वरूप की बात करें तो सोचने को विवश करता है। कई प्रश्नों को जन्म देता है। शीर्ष पर घनी लंबी और उलझी हुई काली जटाएं है। जटाओं में गंगा का वास है, मस्तक पर त्रिपुंड की तीन रेखाएं हैं, मस्तक पर चंद्रमा धारण कर रखा है। कानों में कुंडल धारण किए हुए हैं। तन पर भस्म रमी हुई है। जिनका कंठ नीला पड़ गया है। वे गले में सर्प और रुद्राक्ष की माला लपेटे रहते हैं। एक हाथ में डमरू और दूसरे हाथ में त्रिशूल है। उनके शरीर के निचले हिस्से को वे व्याघ्र चर्म से लपेटे रहते हैं। भगवान शिव नंदी वृषभ (बैल) की सवारी करते हैं।

कभी आपने सोचा कि इन सब शिव प्रतीकों के पीछे का रहस्य क्या है? शिव की वेशभूषा ऐसी है कि प्रत्येक धर्म के लोग उनमें अपने प्रतीक ढूंढ सकते हैं। आइए जानते हैं शिव प्रतीकों के रहस्य

त्रिनेत्र – पुराण अनुसार भगवान के तीनो नेत्रों को त्रिकाल का प्रतीक माना गया है | जिसमें भूत, वर्तमान और भविष्य का वास होता है। स्वर्गलोक , मृत्युलोक और पाताललोक भी इन्ही तीनों नेत्रों के प्रतीक है। त्रिनेत्र होने के कारण ही भगवान शिव त्रिलोचन कहे जाते हैं।

प्रत्येक मनुष्य की भौहों के बीच तीसरा नेत्र रहता है। शिव का तीसरा नेत्र हमेशा जाग्रत रहता है, लेकिन बंद। किन्तु इसका अहसास कठोर साधना और ज्ञान के द्वारा ही किया जा सकता है यदि आप अपनी आंखें बंद करेंगे तो आपको भी इस नेत्र का अहसास होगा।

धरम ग्रंथो में भगवान शिव की तीसरी आँख से झुड़े रहस्य में कई सारी कथाएं कथा प्रचलित है

एक समय की बात है, जब पार्वती जी ने भगवान शिव के पीछे जाकर उनकी दोनों आंखें अपनी हथेलियों से बंद कर दी। इससे सारे संसार में अंधकार छा गया क्योंकि माना जाता है कि भगवान शिव की एक आंख सूर्य है, दूसरी चंद्रमा। अंधकार होते ही समस्त संसार में हाहाकार मच गया तब भोलेनाथ ने तुरंत अपने माथे से अग्नि निकाल कर पूरी दुनिया में रोशनी फैला दी। रोशनी इतनी तेज थी कि इससे पूरा हिमालय जलने लगा। ये देखकर मां पार्वती घबरा गई और तुंरत अपनी हथेलियां शिव की आंखों से हटा दी। तब शिव जी ने मुस्कुरा कर अपनी तीसरी आंख बंद की। शिव पुराण के अनुसार पार्वती जी को इससे पूर्व ज्ञान नहीं था कि शिव त्रिनेत्रधारी हैं।

जिसमे प्रणय के देवता कामदेव अपनी क्रीडाओं के द्वारा शिव जी की तपस्या भंग करने का प्रयास करते है। और जैसे ही शिव जी तपस्या भंग होती है शिव जी क्रोधित हो अपने तीसरे नेत्र की अग्नि से कामदेव को भस्म कर देते है।यह कथा मनुष्य जीवन के लिए प्रेरणा का स्त्रोत भी है। कामदेव का वास प्रत्येक मनुष्य के अन्दर होता है। उसे अपने विवेक और बुद्धि द्वारा मन में उठने वाले क्रोध और अवांछित काम वासना को शांत करना चाहिए।

जटाएं – शिव की जटाएं अंतरिक्ष का प्रतीक हैं। उनका नाम व्योमकेश है। घने बादलों से काली और उलझी जटाओं में चंद्रमा विराजमान है। इन्हीं से गंगा का अवतरण भी हुआ है। तो यह अनंत अंतरिक्ष का प्रतीक हैं।

चन्द्र – शिव का एक नाम ‘सोम’ भी है। सोम का अर्थ चन्द्र होता है। चंद्रमा मन का प्रतीक है शिव का मन चांद की तरह भोला, निर्मल, उज्ज्वल और जाग्रत है

गंगा – गंगा को जटा में धारण करने के कारण ही शिव को जल चढ़ाए जाने की प्रथा शुरू हुई। जब स्वर्ग से गंगा को धरती पर उतारने का उपक्रम हुआ तो यह भी सवाल उठा कि गंगा के इस अपार वेग से धरती में विशालकाय छिद्र हो सकता है, तब गंगा पाताल में समा जाएगी। ऐसे में इस समाधान के लिए भगवान शिव ने गंगा को सर्वप्रथम अपनी जटा में विराजमान किया और फिर उसे धरती पर उतारा। गंगोत्री तीर्थ इसी घटना का गवाह है।

त्रिशूल – महादेव का त्रिशूल प्रकृति के तीन प्रारूप- आविष्कार, रखरखाव और तबाही को भी दर्शाता है. तीनों काल- भूत,वर्तमान और भविष्य भी इस त्रिशूल के अंदर समाते हैं. सिर्फ यही नहीं, त्रिमूर्ति- ब्रह्मा, विष्णु और महेश का भी रूप त्रिशूल में देखा जा सकता है.

गले में सर्प – वासुकि सर्प जैसा हिंसक जीव शिव के अधीन है। सर्प तमोगुणी व संहारक जीव है, जिसे शिव ने अपने वश में कर रखा है। भगवान शंकर तमोगुण, दोष, विकारों के नियंत्रक व संहारक हैं, जो कलह का कारण ही नहीं बल्कि जीवन के लिये घातक भी होते हैं। इसलिए उन्हें कालों का काल भी कहा जाता है| सर्प को कुंडलिनी शक्ति भी कहा गया है जोकि एक निष्क्रिय ऊर्जा है और हर एक के भीतर होती है।

रूद्राक्ष – माना जाता है कि रुद्राक्ष की उत्पत्ति शिव के आंसुओं से हुई थी। धार्मिक ग्रंथानुसार 21 मुख तक के रुद्राक्ष होने के प्रमाण हैं, परंतु वर्तमान में 14 मुखी के पश्चात सभी रुद्राक्ष अप्राप्य हैं। इसे धारण करने से सकारात्मक ऊर्जा मिलती है तथा रक्त प्रवाह भी संतुलित रहता है।

डमरू – शिव के एक हाथ में डमरू है, जिसे वह तांडव नृत्य करते समय बजाते हैं। भगवान शिव को संगीत का जनक भी माना जाता है। डमरू का नाद ही ब्रह्मा रूप है।

नाद अर्थात ऐसी ध्वनि, जो ब्रह्मांड में निरंतर जारी है जिसे ‘ॐ’ कहा जाता है। संगीत में अन्य स्वर तो आते-जाते रहते हैं, उनके बीच विद्यमान केंद्रीय स्वर नाद है। नाद से ही वाणी के चारों रूपों की उत्पत्ति मानी जाती है- 1. पर, 2. पश्यंती, 3. मध्यमा और 4. वैखरी।

आहत नाद का नहीं अपितु अनाहत नाद का विषय है। बिना किसी आघात के उत्पन्न चिदानंद, अखंड, अगम एवं अलख रूप सूक्ष्म ध्वनियों का प्रस्फुटन अनाहत या अनहद नाद है। इस अनाहत नाद का दिव्य संगीत सुनने से गुप्त मानसिक शक्तियां प्रकट हो जाती हैं। नाद पर ध्यान की एकाग्रता से धीरे-धीरे समाधि लगने लगती है। डमरू इसी नाद-साधना का प्रतीक है।

भभूत या भस्म– शिव अपने शरीर पर भस्म धारण करते हैं। भस्म जगत की निस्सारता का बोध कराती है। भस्म आकर्षण, मोह आदि से मुक्ति का प्रतीक भी है। देश में एकमात्र जगह उज्जैन के महाकाल मंदिर में शिव की भस्म आरती होती है जिसमें श्मशान की भस्म का इस्तेमाल किया जाता है। यज्ञ की भस्म में वैसे कई आयुर्वेदिक गुण होते हैं। प्रलयकाल में समस्त जगत का विनाश हो जाता है, तब केवल भस्म (राख) ही शेष रहती है। यही दशा शरीर की भी होती है।

मुंडमाला – शिव के गले में मुंडमाला है, जो इस बात का प्रतीक है कि शिव ने मृत्यु को वश में किया हुआ है।

बाघ-चर्म – शिव ने शरीर परबाघ-चर्म यानी बाघ की खाल पहनी हुई है बाघ हिंसा और अहंकार का प्रतीक माना जाता है इसका अर्थ है कि शिव ने हिंसा और अहंकार का दमन कर उसे अपने नीचे दबा लिया है

नीलकंठ – अमृत पाने की इच्छा से जब देव-दानव बड़े जोश और वेग से मंथन कर रहे थे, तभी समुद मंथन से सबसे पहले कालकूट नामक भयंकर विष निकला।
उस विष की अग्नि से दसों दिशाएं जलने लगीं। समस्त प्राणियों में हाहाकार मच गया। देवताओं और दैत्यों सहित ऋषि, मुनि, मनुष्य, गंधर्व और यक्ष आदि उस विष की गरमी से जलने लगे।
देवताओं की प्रार्थना पर, भगवान शिव विषपान के लिए तैयार हो गए। उन्होंने भयंकर विष को हथेलियों में भरा और भगवान विष्णु का स्मरण कर उसे पी गए। भगवान विष्णु अपने भक्तों के संकट हर लेते हैं। उन्होंने उस विष को शिवजी के कंठ (गले) में ही रोक कर उसका प्रभाव खत्म कर दिया। विष के कारण भगवान शिव का कंठ नीला पड़ गया और वे संसार में नीलकंठ के नाम से प्रसिद्ध हुए।

वृषभ – वृषभ शिव का वाहन है। वे हमेशा शिव के साथ रहते हैं। वृषभ का अर्थ धर्म है। मनुस्मृति के अनुसार ‘वृषो हि भगवान धर्म:’। वेद ने धर्म को 4 पैरों वाला प्राणी कहा है। उसके 4 पैर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष हैं। महादेव इस 4 पैर वाले वृषभ की सवारी करते हैं यानी धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष उनके अधीन हैं।
एक मान्यता के अनुसार वृषभ को नंदी भी कहा जाता है, जो शिव के एक गण हैं। नंदी ने ही धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र, कामशास्त्र और मोक्षशास्त्र की रचना की थी।

शिव और उनका परिवार

भगवान शिव सही अर्थों में परिवार के देवता हैं। क्योंकि ये एकमात्र ऐसे देवता हैं, जिनका परिवार संपूर्ण है। ब्रह्मा और विष्णु के चित्र परिवार के साथ नहीं मिलते परंतु शिव-पार्वती, गणेश और कार्तिकेय तथा उनके वाहनों के साथ संपूर्ण चित्र एक भरे-पूरे परिवार का दृश्य उपस्थित करते हैं। इनकी अर्धांगिन का नाम पार्वती है। इनके पुत्र कार्तिकेय और गणेश हैं, तथा पुत्री अशोक सुंदरी हैं।

पार्वती भगवान शिव की पत्नी जगदंबा पार्वती हैं। शिवपुराण के अनुसार, ये पर्वतराज हिमालय व मैना की पुत्री हैं। पार्वती को ही शक्ति माना गया है। शरीर में शक्ति ना हो तो शरीर बेकार है। शक्ति तेज का पुंज है। मानव को हर काम में सफलता की शक्ति पार्वती यानी दुर्गा देती हैं। भगवान शिव ने अर्धनारीश्वर स्वरूप में स्वयं शक्ति के महत्व को सिद्ध कि

अशोक सुंदरी – भगवान शिव की पुत्री का नाम अशोक सुंदरी है। पौराणिक कथाओं और कुछ लोक मान्यताओं के अनुसार, माता पार्वती ने अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए कल्प वृक्ष ( से कन्या प्राप्ति का वरदान मांगा, जिसके फलस्वरूप अशोक सुंदरी का जन्म हुआ। अशोक सुंदरी का विवाह परम पराक्रमी राजा नहुष से हुआ था। माता पार्वती के वरदान से अशोक सुंदरी ययाति जैसे वीर पुत्र तथा सौ रूपवती कन्याओं की माता बनीं।

कार्तिकेय – ये भगवान शिव के बड़े पुत्र हैं। कार्तिकेय के पास देवताओं के सेनापति का पद है। वे साहस के अवतार हैं। कम आयु में ही अपने अदम्य साहस के बल पर उन्होंने तारकासुर का नाश किया था। इसलिए आत्मविश्वास और आत्मबल की प्राप्ति कार्तिकेय से होती है। शिवपुराण के अनुसार, कार्तिकेय ब्रह्मचारी हैं, वहीं ब्रह्मवैवर्त पुराण में इनकी पत्नी का नाम देवसेना बताया गया है।

श्रीगणेश – ये भगवान शिव के छोटे पुत्र हैं। इनका मुख हाथी का है इसलिए इन्हें गजमुख भी कहा जाता है। श्रीगणेश को प्रथम पूज्य की उपाधि प्राप्त है। किसी भी शुभ कार्य से पहले इनका पूजन किया जाता है। ग्रंथों में इन्हें परम शक्तिशाली व बुद्धिमान बताया गया है। इनके पूजन से सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। गणेश पुराण के अनुसार, श्रीगणेश ने अनेक अवतार लेकर दुष्टों का अंत किया है।

भगवान शिव की दो बहुएं हैं श्रीगणेश की पत्नी सिद्धि और बुद्धि। शिवपुराण के अनुसार, ये प्रजापति विश्वरूप की पुत्रियां हैं। कुछ स्थानों पर रिद्धि और सिद्धि का नाम मिलता है, लेकिन अधिकांश ग्रंथों में सिद्धि और बुद्धि को ही गणपति की पत्नी माना गया है। सिद्धि कार्यों में, मनोरथों में सफलता देती है। बुद्धि ज्ञान के मार्ग को प्रशस्त करती हैं।

ग्रंथों के अनुसार, भगवान गणेश के दो पुत्र हैं क्षेम और लाभ। क्षेम हमारे अर्जित पुण्य, धन, ज्ञान और ख्याति को सुरक्षित रखते हैं। सीधा अर्थ है हमारी मेहनत से कमाई गई हर वस्तु को सुरक्षित रखते हैं, उसे कम नहीं होने देते और धीरे-धीरे उसे बढ़ाते हैं। लाभ का काम निरंतर उसमें वृद्धि देने का है। लाभ हमें धन, यश आदि में निरंतर बढ़ोत्तरी देता है।

भगवान शिव के 19 अवतारों का रहस्य

शिव महापुराण में भगवान शिव के अनेक अवतारों का वर्णन मिलता है…

  1. वीरभद्र अवतार
  2. पिप्पलाद अवतार
  3. नंदी अवतार
  4. भैरव अवतार
  5. अश्वत्थामा
  6. शरभावतार
  7. गृहपति अवतार
  8. ऋषि दुर्वासा
  9. हनुमान
  10. वृषभ अवतार
  11. यतिनाथ अवतार
  12. कृष्णदर्शन अवतार
  13. अवधूत अवतार
  14. भिक्षुवर्य अवतार
  15. सुरेश्वर अवतार
  16. किरात अवतार
  17. ब्रह्मचारी अवतार
  18. सुनटनर्तक अवतार
  19. यक्ष अवतार