मकर संक्रांति 2027 शुभ मुहूर्त जयपुर, राजस्थान
- सूर्य का मकर राशि में प्रवेश
- 14 जनवरी, रात 08:58
- पुण्य काल (स्नान-दान)
- 15 जनवरी, सूर्योदय (लगभग 07:17) से दोपहर तक
- सबसे श्रेष्ठ समय
- 15 जनवरी, सूर्योदय के बाद पहले दो-तीन घंटे
समय जयपुर, राजस्थान (IST) के सूर्योदय पर आधारित हैं – दृक् गणना, लाहिरी अयनांश। आपके शहर में कुछ मिनट का अंतर हो सकता है। कुछ पंचांगों में तिथि को लेकर एक दिन का अंतर संभव है। विवाह, गृह प्रवेश जैसे महत्वपूर्ण कार्यों के लिए स्थानीय पंडित से मुहूर्त की पुष्टि करें।

मकर संक्रांति वह दिन है जब सूर्य देव धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं। यह हिंदू धर्म का ऐसा प्रमुख पर्व है जो चंद्रमा की तिथि से नहीं, सूर्य की गति से तय होता है – इसीलिए यह लगभग हर साल 14 या 15 जनवरी को ही आता है। इसी दिन से सूर्य उत्तरायण होते हैं, दिन बड़े होने लगते हैं और शुभ कामों का समय शुरू होता है। साल 2027 में सूर्य 14 जनवरी की रात मकर राशि में प्रवेश करेंगे, इसलिए मकर संक्रांति का पुण्य काल और स्नान-दान शुक्रवार, 15 जनवरी को होगा। इस लेख में जानिए सही तारीख़, पुण्य काल, पूजा विधि, दान, खिचड़ी-तिल-गुड़ की परंपरा और पूरे भारत में यह पर्व कैसे मनाया जाता है।
मकर संक्रांति 2027 कब है – 14 या 15 जनवरी?
पंचांग के अनुसार सूर्य गुरुवार, 14 जनवरी 2027 को रात 08:58 पर मकर राशि में प्रवेश करेंगे (जयपुर के अनुसार)। शास्त्रों का नियम है कि संक्रांति अगर सूर्यास्त के बाद हो, तो उसका पुण्य काल अगले दिन सूर्योदय से माना जाता है। इसलिए:
- संक्रांति का क्षण: 14 जनवरी, रात 08:58
- मकर संक्रांति पर्व, स्नान-दान: शुक्रवार, 15 जनवरी 2027
- पुण्य काल: 15 जनवरी को सूर्योदय (लगभग 07:17) से दोपहर तक; सुबह के पहले दो-तीन घंटे सबसे श्रेष्ठ
कुछ कैलेंडर संक्रांति के क्षण के आधार पर 14 जनवरी लिखते हैं, पर स्नान, दान, सूर्य अर्घ्य और खिचड़ी का पर्व 15 जनवरी को ही मनाना शास्त्र सम्मत है। लोहड़ी इससे पहली शाम, 14 जनवरी को मनाई जाएगी, और तमिलनाडु में थाई पोंगल भी 15 जनवरी को है।
मकर संक्रांति का धार्मिक महत्व
उत्तरायण की शुरुआत
शास्त्रों में साल को दो भागों में बाँटा गया है – दक्षिणायन और उत्तरायण। उत्तरायण को देवताओं का दिन माना जाता है। महाभारत में भीष्म पितामह ने बाणों की शय्या पर लेटे रहकर देह त्याग के लिए उत्तरायण की प्रतीक्षा की थी, क्योंकि इस काल में शरीर छोड़ने वाले को मोक्ष मिलता है। गीता (8.24) में भी उत्तरायण के छह महीनों को प्रकाश और मुक्ति का मार्ग बताया गया है।
सूर्य और शनि का मिलन
मकर राशि के स्वामी शनि देव हैं, जो सूर्य के पुत्र हैं। पौराणिक मान्यता के अनुसार पिता-पुत्र के बीच मनमुटाव था, पर मकर संक्रांति के दिन सूर्य स्वयं अपने पुत्र शनि के घर जाते हैं। इसलिए यह पर्व रिश्तों में मिठास और पुराने मतभेद भुलाने का संदेश देता है – और इसीलिए इस दिन “तिल-गुड़ खाओ, मीठा-मीठा बोलो” कहा जाता है। सूर्य देव और शनि देव के बारे में और पढ़ें।
गंगा का सागर से मिलन
मान्यता है कि राजा भगीरथ के पीछे-पीछे चलते हुए गंगा इसी दिन कपिल मुनि के आश्रम से होते हुए सागर में मिली थीं और सगर के साठ हज़ार पुत्रों का उद्धार हुआ था। इसीलिए पश्चिम बंगाल में गंगा सागर मेला लगता है, जहाँ लाखों लोग स्नान करते हैं। प्रयागराज में इसी समय माघ मेले का स्नान होता है। गंगा की कथा माता गंगा के पेज पर पढ़ें।
मकर संक्रांति पूजा विधि
- 15 जनवरी को सूर्योदय से पहले उठें। पवित्र नदी में स्नान करें, या घर पर नहाने के पानी में गंगाजल और काले तिल मिलाएँ।
- तांबे के लोटे में जल, लाल चंदन, लाल फूल, अक्षत और थोड़े तिल डालकर उगते सूर्य को अर्घ्य दें। अर्घ्य देते समय “ॐ घृणि सूर्याय नमः” या “ॐ सूर्याय नमः” बोलें।
- घर के मंदिर में भगवान सूर्य और भगवान विष्णु की पूजा करें। तिल, गुड़ और खिचड़ी का भोग लगाएँ।
- सूर्य देव की आरती करें और सूर्य चालीसा या आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करें।
- स्नान के बाद, भोजन से पहले दान करें – तिल, गुड़, खिचड़ी, कंबल और गर्म कपड़े।
- घर के बड़ों के पैर छूकर आशीर्वाद लें और सबको तिल-गुड़ बाँटें।
मकर संक्रांति पर क्या दान करें
मकर संक्रांति को “दान का पर्व” कहा जाता है। मान्यता है कि इस दिन किया गया दान सौ गुना होकर लौटता है।
- तिल: काले तिल का दान शनि दोष और पितृ दोष की शांति के लिए विशेष माना जाता है।
- गुड़ और तिल के लड्डू: सूर्य से जुड़ा दान, जो रिश्तों में मिठास लाता है।
- खिचड़ी: चावल और उड़द की दाल का दान – उत्तर प्रदेश और बिहार में इस पर्व को “खिचड़ी” ही कहते हैं।
- कंबल और गर्म कपड़े: कड़ाके की ठंड में ज़रूरतमंदों के लिए सबसे उपयोगी दान।
- घी: मंदिर में या ब्राह्मण को घी का दान।
- गाय को चारा: हरा चारा या गुड़ खिलाना।
तिल-गुड़ और खिचड़ी क्यों खाते हैं
जनवरी में ठंड चरम पर होती है। तिल और गुड़ दोनों शरीर को गर्मी देते हैं, ऊर्जा बढ़ाते हैं और पाचन ठीक रखते हैं। नई फसल के चावल और उड़द की खिचड़ी हल्की और पौष्टिक होती है। इसलिए हमारे पूर्वजों ने त्योहार के साथ मौसम के अनुसार भोजन की परंपरा जोड़ी। गोरखपुर के गोरखनाथ मंदिर में इस दिन खिचड़ी चढ़ाने की बहुत पुरानी परंपरा है, और वहाँ बड़ा खिचड़ी मेला लगता है।
पूरे भारत में मकर संक्रांति के रंग
- पंजाब और हरियाणा: एक दिन पहले लोहड़ी, और संक्रांति के दिन माघी।
- गुजरात और राजस्थान: उत्तरायण – पूरे दिन पतंगबाज़ी, “काई पो छे” के नारे, तिल-चिक्की और उंधियू। जयपुर में भी इस दिन आसमान पतंगों से भर जाता है।
- उत्तर प्रदेश और बिहार: खिचड़ी पर्व – स्नान, दान और दही-चूड़ा।
- महाराष्ट्र: “तिळगूळ घ्या, गोड गोड बोला” – तिल-गुड़ बाँटकर मीठा बोलने का संदेश; विवाहित महिलाएँ हल्दी-कुमकुम करती हैं।
- तमिलनाडु: चार दिन का पोंगल पर्व।
- असम: माघ बिहू (भोगाली बिहू) – फसल का उत्सव और सामूहिक भोज।
- कर्नाटक और आंध्र प्रदेश: संक्रांति / पेद्दा पंडुगा – “एल्लु बीरोधु” (तिल, गुड़, नारियल, मूंगफली का मिश्रण) बाँटना।
- पश्चिम बंगाल: पौष संक्रांति – गंगा सागर स्नान और पीठे-पुली मिठाई।
मकर संक्रांति पर क्या न करें
- स्नान और दान से पहले भोजन न करें – पहले सूर्य को अर्घ्य और दान, फिर भोजन।
- इस दिन तामसिक भोजन, मांस-मदिरा और नशे से दूर रहें।
- किसी से कटु वचन न बोलें और झगड़ा न करें – यह पर्व मीठा बोलने का है।
- पेड़-पौधे न काटें और किसी भी जीव को कष्ट न दें।
- घर आए भिक्षुक या ज़रूरतमंद को खाली हाथ न लौटाएँ – कम से कम तिल-गुड़ ज़रूर दें।
माघ मास और कल्पवास की शुरुआत
मकर संक्रांति के आसपास से माघ का पवित्र महीना शुरू होता है, जिसमें प्रयागराज के संगम तट पर माघ मेला लगता है। हज़ारों श्रद्धालु पूरे महीने तंबुओं में रहकर कल्पवास करते हैं – रोज़ गंगा स्नान, एक समय भोजन, जप-तप और सत्संग। माघ में सूर्योदय से पहले स्नान को सबसे पुण्यकारी माना गया है। मकर संक्रांति, मौनी अमावस्या, बसंत पंचमी और माघ पूर्णिमा इस मेले के प्रमुख स्नान पर्व हैं।
पतंग उड़ाते समय सावधानी
पतंगबाज़ी इस पर्व की खुशी है, पर ध्यान रखें – चीनी (नायलॉन/ग्लास कोटेड) मांझा पक्षियों और राह चलते लोगों के लिए जानलेवा है, इसका इस्तेमाल न करें। सुबह-शाम पक्षियों के उड़ने के समय पतंग कम उड़ाएँ, छत पर बच्चों के साथ बड़ा ज़रूर रहे और बिजली के तारों से दूर रहें।
निष्कर्ष
मकर संक्रांति प्रकाश, नई फसल और नई शुरुआत का पर्व है। 2027 में सूर्य 14 जनवरी की रात मकर राशि में प्रवेश करेंगे, इसलिए 15 जनवरी की सुबह स्नान करें, सूर्य को अर्घ्य दें, तिल-गुड़ और खिचड़ी का दान करें और सबसे मीठा बोलें। छत पर पतंग उड़ाएँ, पर पक्षियों और राहगीरों का ध्यान रखते हुए। इसके बाद माघ का पवित्र महीना शुरू होता है – पौष पूर्णिमा (22 जनवरी) से प्रयागराज में कल्पवास आरंभ होगा।
पूजा सामग्री
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मकर संक्रांति पर पढ़ें
मकर संक्रांति कब है? आने वाले वर्षों की तिथियाँ
| वर्ष | तिथि | दिन |
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