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भक्तिरस – BhaktiRas

पोंगल 2027

Pongal 2027 Date, Muhurat & Puja Vidhi

तमिल मास थाई का पहला दिन (सूर्य का मकर राशि में प्रवेश) अपडेट:
जनवरी
15
2027

पोंगल कब है?

69 दिन बाकी

पोंगल 2027 शुभ मुहूर्त जयपुर, राजस्थान

भोगी पोंगल
14 जनवरी, गुरुवार
सूर्य का मकर राशि में प्रवेश
14 जनवरी, रात 08:58
थाई पोंगल (मुख्य दिन)
15 जनवरी, शुक्रवार – सूर्योदय के बाद
मट्टू पोंगल
16 जनवरी, शनिवार
कानुम पोंगल
17 जनवरी, रविवार

समय जयपुर, राजस्थान (IST) के सूर्योदय पर आधारित हैं – दृक् गणना, लाहिरी अयनांश। आपके शहर में कुछ मिनट का अंतर हो सकता है। कुछ पंचांगों में तिथि को लेकर एक दिन का अंतर संभव है। विवाह, गृह प्रवेश जैसे महत्वपूर्ण कार्यों के लिए स्थानीय पंडित से मुहूर्त की पुष्टि करें।

पोंगल

पोंगल तमिलनाडु का सबसे बड़ा त्योहार है – नई फसल, सूर्य देव और पशुधन के प्रति आभार का चार दिन का उत्सव। “पोंगल” का अर्थ है “उफान” – नए बर्तन में दूध और नए चावल को तब तक पकाया जाता है जब तक वह उफनकर बाहर न आ जाए, और यह उफान घर में सुख-समृद्धि के उमड़ने का प्रतीक माना जाता है। यह पर्व तमिल महीने थाई के पहले दिन, यानी सूर्य के मकर राशि में प्रवेश के समय मनाया जाता है, इसलिए यह उत्तर भारत की मकर संक्रांति का ही दक्षिण भारतीय रूप है। साल 2027 में मुख्य थाई पोंगल शुक्रवार, 15 जनवरी को है।

पोंगल 2027 की तारीख़ें

पंचांग के अनुसार सूर्य 14 जनवरी 2027 को रात 08:58 पर मकर राशि में प्रवेश करेगा। तमिल परंपरा में अगर सूर्य का राशि प्रवेश सूर्यास्त के बाद हो, तो नया महीना अगले दिन से गिना जाता है। इसलिए थाई मास और थाई पोंगल 15 जनवरी से शुरू होंगे। चारों दिन इस प्रकार हैं:

  • भोगी पोंगल: गुरुवार, 14 जनवरी 2027
  • थाई पोंगल (सूर्य पोंगल): शुक्रवार, 15 जनवरी 2027 – मुख्य दिन
  • मट्टू पोंगल: शनिवार, 16 जनवरी 2027
  • कानुम पोंगल: रविवार, 17 जनवरी 2027

संक्रांति का समय भारत में लगभग एक ही रहता है, पर सूर्यास्त का समय शहर के अनुसार बदलता है। ऊपर का समय जयपुर के अनुसार है; चेन्नई और तमिलनाडु में भी इस बार संक्रांति सूर्यास्त के बाद ही है।

पहला दिन – भोगी पोंगल

भोगी वर्षा के देवता इंद्र को समर्पित है, जिनकी कृपा से अच्छी फसल हुई। इस दिन घर की पूरी सफ़ाई की जाती है और पुरानी, बेकार चीज़ों को सुबह-सुबह अलाव (भोगी मंटलु) में जलाया जाता है – यह पुराने को छोड़कर नए का स्वागत करने का प्रतीक है। घरों को रंगा जाता है, दरवाज़ों पर आम और नीम के पत्तों का तोरण बाँधा जाता है और शाम को परिवार साथ बैठकर भोजन करता है। आजकल पर्यावरण का ध्यान रखते हुए प्लास्टिक और टायर जलाने से बचने की अपील की जाती है।

दूसरा दिन – थाई पोंगल (मुख्य दिन)

थाई पोंगल सूर्य देव को समर्पित है। सुबह स्नान के बाद आँगन में चावल के आटे से सुंदर कोलम (रंगोली) बनाई जाती है। घर के बाहर या आँगन में, खुले आसमान के नीचे, धूप में नए मिट्टी या पीतल के बर्तन में – जिसके गले पर हल्दी का पौधा और गन्ना बाँधा जाता है – दूध उबाला जाता है। जैसे ही दूध उफनकर बर्तन से बाहर गिरता है, पूरा परिवार ज़ोर से “पोंगलो पोंगल!” बोलता है। फिर उसी बर्तन में नए चावल, मूंग दाल, गुड़ और घी डालकर मीठा सक्करई पोंगल बनाया जाता है।

पका हुआ पोंगल केले के पत्ते पर रखकर गन्ने, केले, हल्दी और नारियल के साथ सूर्य देव को अर्पित किया जाता है। इसके बाद परिवार और पड़ोसियों में प्रसाद बाँटा जाता है। सूर्य देव की आरती और सूर्य चालीसा के साथ आप भी इस दिन सूर्य पूजा कर सकते हैं।

तीसरा दिन – मट्टू पोंगल

“मट्टू” का अर्थ है गाय-बैल। खेती में साथ देने वाले पशुओं के प्रति आभार जताने का यह दिन है। गाय और बैलों को नहलाया जाता है, उनके सींगों को रंगा जाता है, गले में घंटियाँ और फूलों की मालाएँ पहनाई जाती हैं और उन्हें पोंगल, गुड़ और केले खिलाए जाते हैं। कई गाँवों में इसी दिन पारंपरिक खेल जल्लीकट्टू होता है, जो अब सरकार के नियमों और सुरक्षा व्यवस्थाओं के तहत आयोजित किया जाता है। कथा के अनुसार भगवान शिव ने अपने वाहन नंदी को धरती पर भेजा था, और तभी से बैल किसानों के साथी बने – इसलिए मट्टू पोंगल पर नंदी की भी पूजा होती है।

चौथा दिन – कानुम पोंगल

“कानुम” का अर्थ है “देखना” या “मिलना”। इस दिन लोग रिश्तेदारों और दोस्तों से मिलने जाते हैं, घूमने-फिरने निकलते हैं और नदी किनारे या समुद्र तट पर परिवार के साथ भोजन करते हैं। बहनें भाइयों की खुशहाली के लिए “कनु पिडी” की पूजा करती हैं – हल्दी के पत्ते पर रंग-बिरंगे चावल के गोले रखकर पक्षियों के लिए छोड़े जाते हैं। घर के बड़े छोटों को आशीर्वाद और उपहार देते हैं।

पोंगल से जुड़ी पौराणिक कथाएँ

भोगी और इंद्र: एक कथा के अनुसार जब श्रीकृष्ण ने गोकुल वासियों से इंद्र की जगह गोवर्धन पर्वत की पूजा करवाई, तो इंद्र ने क्रोध में भारी वर्षा कर दी। श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत उठाकर सबकी रक्षा की और इंद्र का अहंकार टूटा। क्षमा माँगने पर श्रीकृष्ण ने वरदान दिया कि फसल कटने के समय इंद्र की भी पूजा होगी – इसीलिए भोगी पर इंद्र को धन्यवाद दिया जाता है।

मट्टू पोंगल और नंदी: भगवान शिव ने नंदी को धरती पर भेजकर संदेश दिया कि लोग रोज़ तेल से स्नान करें और महीने में एक बार भोजन करें। नंदी ने गलती से उल्टा कह दिया – रोज़ भोजन और महीने में एक बार स्नान। शिव ने कहा कि अब लोगों को रोज़ भोजन के लिए अधिक अन्न उगाना होगा, इसलिए नंदी धरती पर रहकर खेत जोतने में मदद करेंगे। तभी से बैल किसानों के साथी हैं।

घर की सजावट – कोलम, गन्ना और तोरण

पोंगल के दिनों में तमिलनाडु के घरों के बाहर सुबह-सुबह चावल के आटे से बड़े-बड़े कोलम बनाए जाते हैं। चावल का आटा इसलिए, ताकि चींटियाँ और छोटे जीव भी उसे खा सकें – यह “सबके साथ बाँटने” की भावना है। मुख्य द्वार पर आम के पत्तों का तोरण, आँगन में गन्ने के जोड़े और हल्दी के पौधे रखे जाते हैं। नए कपड़े पहनना और घर के बड़ों का आशीर्वाद लेना भी इस पर्व की परंपरा है।

सक्करई (मीठा) पोंगल बनाने की विधि

  1. आधा कप मूंग दाल को हल्का भून लें और एक कप नए चावल के साथ धो लें।
  2. बर्तन में दो कप दूध और दो कप पानी उबालें; उफान आने पर चावल-दाल डालें और नरम होने तक पकाएँ।
  3. अलग से एक कप गुड़ को थोड़े पानी में पिघलाकर छान लें और पके चावल में मिलाएँ।
  4. घी में काजू और किशमिश तलें, इलायची पाउडर के साथ पोंगल में डालें और अच्छी तरह मिलाएँ।
  5. पहले सूर्य देव को भोग लगाएँ, फिर सबको प्रसाद दें।

नमकीन वेन पोंगल भी बनता है, जिसमें गुड़ की जगह काली मिर्च, जीरा, अदरक और करी पत्ता डाला जाता है।

पोंगल का महत्व

पोंगल प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का पर्व है – सूर्य, जिससे फसल पकती है; वर्षा, जो खेतों को सींचती है; और पशु, जो खेती में साथ देते हैं। तमिल में कहावत है “थाई पिरंधाल वड़ी पिरक्कुम” – यानी थाई महीना आने पर नए रास्ते खुलते हैं। इसलिए शादी-ब्याह और नए काम इसी महीने से शुरू करना शुभ माना जाता है। पोंगल यह भी सिखाता है कि त्योहार केवल पूजा नहीं, बल्कि परिवार, पड़ोस और प्रकृति के साथ खुशियाँ बाँटने का अवसर है।

उत्तर और दक्षिण – एक ही पर्व के कई नाम

जिस दिन तमिलनाडु में थाई पोंगल मनता है, उसी दिन पंजाब में माघी (एक दिन पहले लोहड़ी), गुजरात-राजस्थान में उत्तरायण और पतंगबाज़ी, उत्तर प्रदेश-बिहार में खिचड़ी, असम में माघ बिहू और कर्नाटक-आंध्र में संक्रांति मनाई जाती है। अलग-अलग नाम और रीति-रिवाज़ होते हुए भी सबका मूल एक है – सूर्य का उत्तरायण होना और नई फसल का स्वागत।

निष्कर्ष

पोंगल 2027 के चारों दिन – 14 से 17 जनवरी – सफ़ाई, सूर्य पूजा, पशुओं के सम्मान और रिश्तों की मिठास के दिन हैं। 15 जनवरी को सुबह सूर्य को अर्घ्य देकर सक्करई पोंगल का भोग लगाएँ और “पोंगलो पोंगल” के साथ नए साल की खुशहाली की कामना करें।

पूजा सामग्री

तैयारी करते हुए टिक करते जाएँ

पोंगल कब है? आने वाले वर्षों की तिथियाँ

वर्षतिथिदिन
पोंगल 2027शुक्रवार

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

पोंगल 2027 में कब है?
पोंगल 2027 में 14 से 17 जनवरी तक मनाया जाएगा। मुख्य थाई पोंगल शुक्रवार, 15 जनवरी 2027 को है। भोगी 14 जनवरी, मट्टू पोंगल 16 जनवरी और कानुम पोंगल 17 जनवरी को है।
इस बार थाई पोंगल 15 जनवरी को क्यों है?
सूर्य 14 जनवरी 2027 को रात 08:58 पर मकर राशि में प्रवेश करेगा। तमिल परंपरा में सूर्यास्त के बाद राशि प्रवेश होने पर नया थाई मास अगले दिन से गिना जाता है, इसलिए थाई पोंगल 15 जनवरी को है।
पोंगल के चार दिन कौन से हैं?
भोगी पोंगल (इंद्र पूजा और सफ़ाई), थाई पोंगल (सूर्य पूजा, मुख्य दिन), मट्टू पोंगल (गाय-बैल की पूजा) और कानुम पोंगल (रिश्तेदारों से मिलना)।
पोंगल का अर्थ क्या है?
पोंगल का अर्थ है "उफान"। नए बर्तन में दूध और चावल को उफनने तक पकाया जाता है, जो घर में सुख-समृद्धि के उमड़ने का प्रतीक है।
पोंगल किस देवता की पूजा का पर्व है?
मुख्य थाई पोंगल पर सूर्य देव की पूजा होती है। भोगी पर इंद्र देव और मट्टू पोंगल पर गाय-बैल तथा नंदी की पूजा की जाती है।
क्या पोंगल और मकर संक्रांति एक ही हैं?
दोनों सूर्य के मकर राशि में प्रवेश पर मनाए जाते हैं, इसलिए मूल रूप से एक ही पर्व हैं। तमिलनाडु में इसे चार दिन के पोंगल के रूप में और उत्तर भारत में मकर संक्रांति के रूप में मनाते हैं।

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