लोहड़ी 2027 शुभ मुहूर्त जयपुर, राजस्थान
- लोहड़ी
- 14 जनवरी 2027, गुरुवार
- अलाव पूजा
- 14 जनवरी, सूर्यास्त के बाद
- सूर्य का मकर राशि में प्रवेश
- 14 जनवरी, रात 08:58
- माघी / मकर संक्रांति
- 15 जनवरी, शुक्रवार
समय जयपुर, राजस्थान (IST) के सूर्योदय पर आधारित हैं – दृक् गणना, लाहिरी अयनांश। आपके शहर में कुछ मिनट का अंतर हो सकता है। कुछ पंचांगों में तिथि को लेकर एक दिन का अंतर संभव है। विवाह, गृह प्रवेश जैसे महत्वपूर्ण कार्यों के लिए स्थानीय पंडित से मुहूर्त की पुष्टि करें।
लोहड़ी पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू और दिल्ली का प्रमुख लोक पर्व है, जो मकर संक्रांति से एक दिन पहले की शाम मनाया जाता है। यह सर्दियों की सबसे लंबी रातों के बीतने, रबी की फसल (गेहूँ, सरसों) के लहलहाने और गन्ने की कटाई की खुशी का त्योहार है। शाम को घर के बाहर या मोहल्ले में अलाव जलाया जाता है, परिवार और पड़ोसी उसके चारों ओर इकट्ठे होकर तिल, गुड़, रेवड़ी, मूंगफली और पॉपकॉर्न अग्नि को अर्पित करते हैं, गीत गाते हैं और भांगड़ा-गिद्दा करते हैं। साल 2027 में लोहड़ी गुरुवार, 14 जनवरी की शाम मनाई जाएगी।
लोहड़ी 2027 कब है – 13 या 14 जनवरी?
लोहड़ी हमेशा मकर संक्रांति (पंजाब में माघी) से पहली शाम को मनाई जाती है, यानी पौष महीने की आख़िरी रात। ज़्यादातर सालों में यह 13 जनवरी को पड़ती है, पर जब मकर संक्रांति 15 जनवरी को होती है, तब लोहड़ी 14 जनवरी को होती है।
साल 2027 में सूर्य 14 जनवरी को रात 08:58 पर मकर राशि में प्रवेश करेगा, इसलिए मकर संक्रांति और माघी 15 जनवरी को है। इसी कारण लोहड़ी 14 जनवरी (गुरुवार) की शाम मनाई जाएगी – संयोग से उसी रात सूर्य उत्तरायण की ओर कदम रखेगा। कुछ कैलेंडर हर साल 13 जनवरी ही लिख देते हैं, इसलिए अपने गुरुद्वारे या स्थानीय पंचांग से भी पुष्टि कर लें।
लोहड़ी क्यों मनाई जाती है
- फसल का उत्सव: पंजाब के किसानों के लिए यह रबी की फसल की अच्छी बढ़त और गन्ने की कटाई का जश्न है। नए गन्ने, गुड़ और मक्के से बनी चीज़ें अग्नि को अर्पित की जाती हैं।
- सर्दी की विदाई: लोहड़ी के बाद दिन बड़े होने लगते हैं। अलाव की आग सूर्य और गर्मी के लौटने का स्वागत है।
- अग्नि और सूर्य की पूजा: अग्नि देव को नई फसल का पहला भाग अर्पित करके परिवार की खुशहाली और अच्छी फसल की कामना की जाती है। सूर्य देव के बारे में भी पढ़ें।
- सामूहिक खुशी: पूरा मोहल्ला एक अलाव के चारों ओर इकट्ठा होता है – यह मेल-जोल और भाईचारे का पर्व है।
लोहड़ी नाम कैसे पड़ा
“लोहड़ी” शब्द की उत्पत्ति को लेकर कई मान्यताएँ हैं। एक मत के अनुसार यह “तिल” और “रोड़ी” (गुड़) से मिलकर बने “तिलोड़ी” से निकला, जो समय के साथ लोहड़ी बन गया। दूसरे मत के अनुसार यह “लोह” से बना है – पंजाबी में लोह उस बड़े तवे को कहते हैं जिस पर सामूहिक रोटियाँ बनती हैं। कुछ लोग इसे संत कबीर की पत्नी “लोई” से भी जोड़ते हैं, जिनके नाम पर पंजाब के ग्रामीण इलाकों में यह पर्व मनाया जाता था। नाम कोई भी हो, मूल भावना एक है – तिल, गुड़ और आग के साथ सर्दी का उत्सव।
दुल्ला भट्टी की कहानी
लोहड़ी के गीतों में बार-बार एक नाम आता है – दुल्ला भट्टी। लोक कथाओं के अनुसार मुग़ल बादशाह अकबर के समय पंजाब में दुल्ला भट्टी नाम का एक वीर था, जिसे लोग “पंजाब का रॉबिन हुड” कहते थे। वह अमीरों और अत्याचारियों से धन लेकर गरीबों में बाँटता था। उस समय लड़कियों को ज़बरदस्ती उठाकर बेच दिया जाता था। दुल्ला भट्टी ने ऐसी कई लड़कियों को छुड़ाया और अपने ख़र्चे पर उनकी शादी करवाई।
कहानी के अनुसार उसने सुंदरी और मुंदरी नाम की दो बहनों को बचाया और जंगल में अलाव जलाकर उनका विवाह करवाया। उसके पास शगुन देने को कुछ नहीं था, तो उसने एक सेर शक्कर दी। इसी याद में लोहड़ी पर बच्चे घर-घर जाकर “सुंदर मुंदरिए हो…” गीत गाते हैं, जिसमें दुल्ला भट्टी का गुणगान होता है, और बदले में उन्हें रेवड़ी, मूंगफली, गुड़ और पैसे मिलते हैं।
लोहड़ी पूजा की विधि
- शाम को सूर्यास्त के बाद घर के आँगन या मोहल्ले के खुले स्थान पर सूखी लकड़ी और उपलों से अलाव तैयार करें।
- परिवार के बड़े दीपक या माचिस से अग्नि प्रज्वलित करें और अग्नि देव को प्रणाम करें।
- अलाव में जल अर्पित करें और फिर तिल, गुड़, रेवड़ी, मूंगफली, पॉपकॉर्न और मक्के के दाने डालें।
- परिवार के सभी सदस्य अलाव की परिक्रमा (आमतौर पर सात या ग्यारह) करें और सुख-समृद्धि की कामना करें।
- बड़ों का आशीर्वाद लें, एक-दूसरे को लोहड़ी की बधाई दें और प्रसाद बाँटें।
- इसके बाद ढोल की थाप पर भांगड़ा और गिद्दा, लोकगीत और साथ में भोजन – मक्के की रोटी, सरसों का साग और गुड़ की खीर।
पहली लोहड़ी का विशेष महत्व
जिस घर में नई बहू आई हो या बच्चे का जन्म हुआ हो, वहाँ पहली लोहड़ी बहुत धूमधाम से मनाई जाती है। रिश्तेदारों और दोस्तों को बुलाया जाता है, नवविवाहित जोड़ा या शिशु की माँ बच्चे को गोद में लेकर अलाव की परिक्रमा करते हैं और सब उन्हें आशीर्वाद व उपहार देते हैं। पहले यह रस्म केवल बेटे के जन्म पर होती थी, पर अब पंजाब और पूरे देश में बेटियों की पहली लोहड़ी भी उतने ही उत्साह से मनाई जाती है – “धीयाँ दी लोहड़ी” एक सुंदर बदलाव है।
लोहड़ी के पारंपरिक पकवान
- रेवड़ी और गजक – तिल और गुड़ से बनी, सर्दी में गर्माहट देने वाली मिठाइयाँ।
- मूंगफली और पॉपकॉर्न – अलाव में अर्पित करके प्रसाद रूप में खाई जाती हैं।
- मक्के की रोटी और सरसों का साग – पंजाब का सबसे प्रसिद्ध सर्दियों का भोजन।
- गुड़ और गन्ने की खीर (रौ दी खीर) – गन्ने के रस में पकाए चावल, जो अगले दिन माघी पर खाई जाती है।
- तिल के लड्डू और पिन्नी – देसी घी और गुड़ से बनी।
लोकगीत, ढोल और नाच
लोहड़ी की शाम ढोल के बिना अधूरी है। अलाव के चारों ओर पुरुष भांगड़ा और महिलाएँ गिद्दा करती हैं, और बोलियाँ गाई जाती हैं – छोटे-छोटे तुकबंदी वाले गीत, जिनमें फसल, परिवार, नई बहू और हँसी-मज़ाक की बातें होती हैं। बच्चे दिन में ही टोलियाँ बनाकर घर-घर लोहड़ी माँगने निकलते हैं। जो घर उन्हें रेवड़ी-मूंगफली देता है, उसे वे खुशहाली की दुआएँ देते हैं। यह परंपरा मोहल्ले के हर घर को त्योहार से जोड़ देती है।
शहरों में लोहड़ी कैसे मनाएँ
फ़्लैट या छोटे घरों में अलाव जलाना संभव न हो, तो सोसाइटी के खुले मैदान में सामूहिक अलाव का आयोजन करें, या घर में दीपक और हवन कुंड में छोटी अग्नि जलाकर तिल-गुड़ अर्पित करें। बच्चों को दुल्ला भट्टी की कहानी सुनाएँ, ताकि वे जानें कि यह त्योहार केवल मिठाई का नहीं, बल्कि बेटियों के सम्मान और ज़रूरतमंदों की मदद का भी संदेश देता है।
लोहड़ी के अगले दिन – माघी
लोहड़ी के अगले दिन पंजाब में माघी मनाई जाती है, जो मकर संक्रांति ही है। इस दिन सुबह पवित्र सरोवर या नदी में स्नान, दान और गुरुद्वारों में अरदास होती है। मुक्तसर साहिब में “माघी मेला” लगता है, जो चालीस मुक्तों (शहीद सिखों) की याद में है। बाकी भारत में इसी दिन उत्तरायण, खिचड़ी और पोंगल मनाए जाते हैं।
सुरक्षा और पर्यावरण का ध्यान रखें
- अलाव खुले स्थान पर, घर, गाड़ियों और बिजली के तारों से दूर जलाएँ।
- बच्चों को आग के पास अकेला न छोड़ें; सिंथेटिक और ढीले कपड़े पहनकर आग के बहुत पास न जाएँ।
- टायर, प्लास्टिक या कचरा न जलाएँ – केवल सूखी लकड़ी और उपले इस्तेमाल करें।
- अलाव बुझाने के लिए पास में पानी या रेत रखें, और जाने से पहले आग पूरी तरह बुझा दें।
निष्कर्ष
लोहड़ी 2027 – 14 जनवरी की शाम – नई फसल, लंबी सर्द रातों की विदाई और परिवार-पड़ोस की खुशियों का पर्व है। अलाव में तिल-गुड़ अर्पित करें, दुल्ला भट्टी के गीत गाएँ, बेटियों और बहुओं की पहली लोहड़ी धूमधाम से मनाएँ और अगली सुबह मकर संक्रांति के स्नान-दान के साथ नए मौसम का स्वागत करें।
पूजा सामग्री
तैयारी करते हुए टिक करते जाएँ
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