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कार्तिक कृष्ण अमावस्या

भक्तिरस – BhaktiRas

श्री वराह लक्ष्मी नरसिंह मंदिर, सिंहाचलम

Sri Varaha Lakshmi Narasimha Swamy Temple, Simhachalam

Visakhapatnam, आंध्र प्रदेश भगवान श्री वराह लक्ष्मी नरसिंह स्वामी, देवी सिंहवल्ली थायार (लक्ष्मी) निःशुल्क प्रवेश

श्री वराह लक्ष्मी नरसिंह स्वामी मंदिर आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम शहर के उत्तर में सिंहाचलम पहाड़ी (“सिंह का पर्वत”) पर स्थित है। यहाँ भगवान विष्णु वराह और नरसिंह के संयुक्त रूप में देवी लक्ष्मी (सिंहवल्ली थायार) के साथ विराजते हैं। विग्रह वर्ष भर चंदन लेप से ढका रहता है और शिवलिंग जैसा दिखता है; केवल अक्षय तृतीया पर लगभग 12 घंटे के लिए भगवान के निज रूप के दर्शन होते हैं। तिरुमला के बाद यह आंध्र प्रदेश के सबसे बड़े और समृद्ध मंदिरों में गिना जाता है।

स्थल पुराण

कथा के अनुसार हिरण्यकशिपु से रक्षा के बाद भक्त प्रह्लाद ने भगवान से ऐसे रूप में प्रकट होने की प्रार्थना की जिसमें वराह (हिरण्याक्ष का वध करने वाले) और नरसिंह (हिरण्यकशिपु का वध करने वाले) दोनों का समावेश हो, और उसके बाद यहाँ मंदिर बना। समय के साथ मंदिर मिट्टी में दब गया। मान्यता है कि राजा पुरूरवा ने अप्सरा उर्वशी के स्वप्न के संकेत से विग्रह को खोजकर फिर से प्रतिष्ठित किया और उस पर चंदन का लेप चढ़ाया।

इतिहास

मंदिर में लगभग 500 अभिलेख मिले हैं – अधिकतर संस्कृत और तेलुगु में, कुछ ओड़िया और तमिल में। सबसे पुराना अभिलेख 1087 ई. का है। पूर्वी गंग राजा नरसिंहदेव प्रथम ने 13वीं शताब्दी में परिसर का बड़ा भाग फिर से बनवाया और उनके पुत्र भानुदेव प्रथम के समय 1268 ई. में वर्तमान मंदिर की प्रतिष्ठा हुई। गजपति, रेड्डी और विजयनगर राजाओं ने भी मंदिर को दान दिए; सम्राट कृष्णदेवराय ने यहाँ विजय स्तंभ बनवाया और आभूषण भेंट किए। परंपरा के अनुसार 11वीं शताब्दी में रामानुजाचार्य ने यहाँ श्रीवैष्णव पूजा-पद्धति स्थापित की, और आज भी पूजा इसी परंपरा से होती है।

मंदिर और स्थापत्य

मंदिर कलिंग शैली में बना है, जिसमें चालुक्य और चोल प्रभाव भी दिखते हैं। यह असामान्य रूप से पश्चिममुखी है। तीन प्राकार, पाँच द्वार और पाँच तल का राजगोपुरम है। विमान कोणार्क की शैली की याद दिलाता है और उस पर स्वर्ण-मंडित कलश है। कल्याण मंडप में 96 नक्काशीदार स्तंभ हैं। मुख मंडप का कप्पम स्तंभ विशेष रूप से पूजनीय है – मान्यता है कि इसे आलिंगन करने से रोग दूर होते हैं और मनोकामनाएँ पूरी होती हैं।

प्रमुख उत्सव

  • चंदनोत्सव (अक्षय तृतीया, वैशाख): निज रूप दर्शन, सबसे बड़ा उत्सव।
  • कल्याणोत्सव – चैत्र मास में भगवान का दिव्य विवाह।
  • नरसिंह जयंती – वैशाख मास।
  • गिरि प्रदक्षिणा – आषाढ़ पूर्णिमा पर पहाड़ी की परिक्रमा।
  • कामदहन और डोलोत्सव (फाल्गुन), नवरात्र, कार्तिक दीपोत्सव।

दर्शन का समय

  • सुबह: लगभग 7:00 से दोपहर 4:00 बजे तक (बीच में अल्प विराम)
  • शाम: लगभग 6:00 से रात 9:00 बजे तक
  • चंदनोत्सव और उत्सवों पर समय बदलता है – देवस्थानम से पुष्टि करें।

मुख्य आकर्षण

  • वराह नरसिंह विग्रह – वर्ष भर चंदन लेप से ढका, शिवलिंग जैसा दिखता है।
  • चंदनोत्सव (अक्षय तृतीया) – लेप हटाकर निज रूप के दर्शन, लगभग 12 घंटे।
  • कप्पम स्तंभ – मुख मंडप का स्तंभ, जिसे मनोकामना और आरोग्य देने वाला माना जाता है।
  • कल्याण मंडप – 96 नक्काशीदार स्तंभ।
  • कृष्णदेवराय का विजय स्तंभ और 500 के आसपास अभिलेख।

कैसे पहुँचें

  • रेल मार्ग: सिंहाचलम रेलवे स्टेशन (पहाड़ी के नीचे) या विशाखापत्तनम जंक्शन (लगभग 15 किमी)।
  • सड़क मार्ग: विशाखापत्तनम शहर से सिटी बसें; पहाड़ी पर घाट रोड और सीढ़ियों का मार्ग।
  • हवाई मार्ग: विशाखापत्तनम हवाई अड्डा (लगभग 12 किमी)।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

सिंहाचलम के भगवान का विग्रह चंदन से क्यों ढका रहता है?
मान्यता है कि भगवान वराह नरसिंह का उग्र तेज शांत रखने के लिए विग्रह पर वर्ष भर चंदन का लेप रहता है। इस कारण विग्रह शिवलिंग जैसा दिखता है। यह लेप वर्ष में केवल एक बार अक्षय तृतीया पर हटाया जाता है।
सिंहाचलम का चंदनोत्सव कब होता है?
चंदनोत्सव वैशाख शुक्ल तृतीया (अक्षय तृतीया) को, प्रायः अप्रैल-मई में होता है। इस दिन चंदन लेप हटाकर भगवान के निज रूप के दर्शन कराए जाते हैं और फिर नया लेप चढ़ाया जाता है।
सिंहाचलम में भगवान वराह और नरसिंह दोनों रूपों में क्यों हैं?
स्थल पुराण के अनुसार हिरण्यकशिपु से रक्षा के बाद भक्त प्रह्लाद ने भगवान से वराह (जिन्होंने हिरण्याक्ष का वध किया) और नरसिंह (जिन्होंने हिरण्यकशिपु का वध किया) के संयुक्त रूप में प्रकट होने की प्रार्थना की थी।
सिंहाचलम मंदिर किसने बनवाया?
मंदिर प्राचीन है; यहाँ का सबसे पुराना अभिलेख 1087 ई. का है। पूर्वी गंग राजा नरसिंहदेव प्रथम ने 13वीं शताब्दी में मंदिर का बड़ा हिस्सा फिर से बनवाया और उनके पुत्र भानुदेव प्रथम के समय 1268 ई. में वर्तमान मंदिर की प्रतिष्ठा हुई।
विशाखापत्तनम से सिंहाचलम कितनी दूर है?
सिंहाचलम विशाखापत्तनम शहर के उत्तर में लगभग 15 किमी दूर है। शहर से सिटी बसें और टैक्सी सीधे पहाड़ी पर मंदिर तक जाती हैं।

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