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कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी

भक्तिरस – BhaktiRas

श्री श्रृंगार वल्लभ स्वामी मंदिर, तोलि तिरुपति (चदलाड)

Sri Srungara Vallabha Swamy Temple, Tholi Tirupati (Chadalada)

Kakinada, आंध्र प्रदेश श्री श्रृंगार वल्लभ स्वामी (भगवान वेंकटेश्वर का स्वरूप), श्रीदेवी और भूदेवी सहित निःशुल्क प्रवेश

श्री श्रृंगार वल्लभ स्वामी मंदिर आंध्र प्रदेश के काकीनाडा जिले (पूर्व में पूर्वी गोदावरी) के पेद्दापुरम मंडल में दिविलि के पास स्थित चदलाड तिरुपति गाँव का प्राचीन वैष्णव मंदिर है। यह गाँव तोलि तिरुपति अर्थात “पहली तिरुपति” के नाम से प्रसिद्ध है। यहाँ के आराध्य श्रृंगार वल्लभ स्वामी को भगवान वेंकटेश्वर का ही एक स्वरूप माना जाता है। शनिवार के दिन यहाँ दूर-दूर से हज़ारों श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं।

स्थल पुराण – ध्रुव की कथा

स्थल कथा विष्णु पुराण और भागवत में वर्णित बालक ध्रुव से जुड़ी है। मान्यता है कि ध्रुव ने इसी वन क्षेत्र में कठोर तपस्या की थी। प्रसन्न होकर भगवान विष्णु छोटे रूप में प्रकट हुए ताकि बालक ध्रुव उन्हें देख सके। स्थानीय मान्यता के अनुसार विष्णु का यही प्रथम प्राकट्य श्रृंगार वल्लभ स्वामी के रूप में हुआ, इसलिए गाँव को तोलि तिरुपति कहा गया। कथा यह भी कहती है कि प्राकट्य के बाद देवताओं ने मंदिर बनाया और नारद मुनि ने लक्ष्मी देवी की प्रतिमा स्थापित की।

मंदिर और विग्रह

गर्भगृह में भगवान श्रीदेवी और भूदेवी के साथ खड़ी मुद्रा में विराजते हैं। “श्रृंगार” नाम उनकी सुंदर, मुस्कुराती मुद्रा के कारण पड़ा माना जाता है। तिरुमला के बालाजी की तुलना में यहाँ शंख और चक्र की स्थिति उलटी है। भक्तों का विश्वास है कि भगवान हर दर्शनार्थी को उसकी अपनी ऊँचाई के अनुसार दिखाई देते हैं। मंदिर द्रविड़ शैली का है – राजगोपुरम, स्तंभों वाला रंग मंडप और मुख मंडप, जिनके खंभों पर विष्णु व कृष्ण की लीलाएँ उकेरी गई हैं। परिसर में भगवान शिव का एक उप-मंदिर भी है।

इतिहास और शिलालेख

मुख मंडप के स्तंभों पर कई प्राचीन शिलालेख हैं। इनके आधार पर मंदिर को 12वीं शताब्दी से पहले का माना जाता है। अभिलेखों में विभिन्न राजाओं, जिनमें रेड्डी शासक भी शामिल हैं, द्वारा भूमि-दान का उल्लेख मिलता है। स्थानीय परंपरा मंदिर को हज़ारों वर्ष पुराना बताती है, पर यह आस्था की बात है, ऐतिहासिक प्रमाण की नहीं। यह भी कहा जाता है कि विजयनगर सम्राट कृष्णदेवराय ने यहाँ आकर भूदेवी की ताम्र प्रतिमा अर्पित की थी। वर्तमान में मंदिर आंध्र प्रदेश के धर्मादाय विभाग के अधीन है।

प्रमुख उत्सव

  • कल्याणोत्सव: हर वर्ष चैत्र शुद्ध एकादशी को भगवान का दिव्य विवाह।
  • धनुर्मास: विशेष पूजा-अनुष्ठान।
  • ब्रह्मोत्सव और रथोत्सव: उत्सव मूर्तियों की गाँव में शोभायात्रा।
  • कार्तिक मास: मंदिर के दक्षिण-पूर्व स्थित चौकोर कुएँ बोड्ना बावि में स्नान की परंपरा, जिसे संतान-सुख के लिए शुभ माना जाता है।

यात्रा क्रम

मंदिर सामर्लकोट रेलवे स्टेशन से लगभग 15 किमी और काकीनाडा से लगभग 31 किमी दूर, किर्लमपुडी-प्रत्तिपाडु मार्ग पर है। पूजा वैखानस आगम के अनुसार होती है। यात्री इसी क्षेत्र में अन्नवरम के सत्यनारायण स्वामी और सामर्लकोट के भीमेश्वर मंदिर के दर्शन की योजना भी बना सकते हैं।

दर्शन का समय

  • दर्शन: सुबह से संध्या तक (दोपहर में कुछ समय पट बंद रह सकते हैं)
  • शनिवार: सबसे अधिक भीड़ वाला दिन

सटीक समय स्थानीय मंदिर कार्यालय से पुष्टि कर लें।

मुख्य आकर्षण

  • श्री श्रृंगार वल्लभ स्वामी – मुस्कुराती मुद्रा में खड़े वेंकटेश्वर, श्रीदेवी और भूदेवी सहित।
  • शंख-चक्र की उलटी स्थिति – तिरुमला के बालाजी से भिन्न।
  • स्तंभों पर शिलालेख – मुख मंडप के खंभों पर प्राचीन अभिलेख।
  • परिसर का शिव मंदिर और कभी न सूखने वाला कुआँ।
  • बोड्ना बावि – मंदिर के दक्षिण-पूर्व का चौकोर कुआँ, कार्तिक मास में स्नान की परंपरा।

कैसे पहुँचें

  • रेल मार्ग: सामर्लकोट जंक्शन (लगभग 15 किमी) – हावड़ा-चेन्नई मार्ग का प्रमुख स्टेशन।
  • सड़क मार्ग: काकीनाडा से लगभग 31 किमी; किर्लमपुडी-प्रत्तिपाडु मार्ग पर दिविलि गाँव के पास।
  • हवाई मार्ग: निकटतम हवाई अड्डा राजमहेंद्रवरम (राजमुंदरी)।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

इस गाँव को 'तोलि तिरुपति' क्यों कहते हैं?
तेलुगु में 'तोलि' का अर्थ है 'पहला'। मान्यता है कि भगवान विष्णु ने श्रृंगार वल्लभ स्वामी के रूप में सबसे पहले यहीं प्रकट होकर दर्शन दिए, इसलिए इसे पहली तिरुपति कहा जाता है।
श्रृंगार वल्लभ स्वामी की प्रतिमा में क्या विशेष है?
भगवान मुस्कुराती मुद्रा में हैं और उनके शंख-चक्र की स्थिति तिरुमला के बालाजी से उलटी है। भक्तों की मान्यता है कि भगवान हर दर्शनार्थी को उसकी अपनी ऊँचाई के अनुरूप दिखाई देते हैं।
मंदिर की स्थल कथा किससे जुड़ी है?
कथा बालक ध्रुव से जुड़ी है। ध्रुव की तपस्या से प्रसन्न होकर विष्णु छोटे रूप में प्रकट हुए ताकि ध्रुव उन्हें देख सकें। मान्यता है कि यह घटना इसी स्थान पर हुई।
मंदिर का मुख्य उत्सव कौन सा है?
हर वर्ष चैत्र शुद्ध एकादशी को भगवान का कल्याणोत्सव होता है। धनुर्मास में विशेष पूजा होती है और ब्रह्मोत्सव व रथोत्सव में भगवान गाँव में भ्रमण करते हैं।
तोलि तिरुपति कैसे पहुँचें?
निकटतम बड़ा रेलवे स्टेशन सामर्लकोट (लगभग 15 किमी) है और काकीनाडा से दूरी लगभग 31 किमी है। मंदिर पेद्दापुरम मंडल में दिविलि गाँव के पास है, जहाँ सड़क मार्ग से आसानी से पहुँचा जा सकता है।

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