द्वारकाधीश मंदिर गुजरात के देवभूमि द्वारका ज़िले में गोमती नदी और अरब सागर के संगम पर स्थित भगवान श्रीकृष्ण का प्रसिद्ध मंदिर है। यहाँ श्रीकृष्ण “द्वारका के राजा” – द्वारकाधीश – के रूप में पूजे जाते हैं। यह भारत के चार धामों में पश्चिम दिशा का धाम है, सप्तपुरी की सात मोक्षदायिनी नगरियों में से एक है और 108 दिव्य देशमों में भी गिना जाता है। मंदिर को स्थानीय लोग जगत मंदिर भी कहते हैं।
द्वारका नगरी की कथा
महाभारत और श्रीमद्भागवत के अनुसार कंस वध के बाद मगधराज जरासंध ने मथुरा पर बार-बार आक्रमण किए। प्रजा की रक्षा के लिए श्रीकृष्ण यादवों को लेकर पश्चिमी समुद्र तट पर आए और विश्वकर्मा से समुद्र के बीच एक भव्य नगरी बसवाई – यही द्वारका (द्वारवती) थी। यहीं से श्रीकृष्ण ने राज्य किया। श्रीकृष्ण के देहत्याग के बाद द्वारका नगरी समुद्र में समा गई – समुद्र के भीतर हुई पुरातात्विक खोजों में भी प्राचीन बस्ती के अवशेष मिलने की बात कही जाती है।
मंदिर का इतिहास और वास्तुकला
परंपरा के अनुसार पहला मंदिर श्रीकृष्ण के प्रपौत्र वज्रनाभ ने भगवान के निवास स्थान (हरि गृह) पर बनवाया था। वर्तमान मंदिर का स्वरूप 15वीं-16वीं शताब्दी का माना जाता है। चूने-पत्थर से बना यह पाँच मंज़िला मंदिर लगभग 72 स्तंभों पर खड़ा है और इसका शिखर लगभग 78 मीटर ऊँचा है। मंदिर में प्रवेश मोक्ष द्वार से होता है और बाहर निकलने का द्वार स्वर्ग द्वार कहलाता है, जिसकी 56 सीढ़ियाँ सीधे गोमती घाट तक जाती हैं।
गर्भगृह में श्रीकृष्ण की चतुर्भुज मूर्ति काले पत्थर की है, जिसमें भगवान शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किए हुए हैं। मंदिर परिसर में बलराम, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध और देवकी माता के छोटे मंदिर भी हैं। आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित शारदा पीठ (पश्चिमाम्नाय मठ) भी मंदिर परिसर के पास ही है।
ध्वजा – दिन में पाँच बार बदलता झंडा
द्वारकाधीश मंदिर की सबसे अनोखी परंपरा इसके शिखर पर लहराती ध्वजा है। लगभग 52 गज लंबा यह रंगीन झंडा दिन में कई बार बदला जाता है और इस पर सूर्य और चंद्रमा के चिह्न बने होते हैं। भक्त अपनी मन्नत पूरी होने पर ध्वजा चढ़ाने की बुकिंग पहले से कराते हैं; ध्वजा चढ़ाने की प्रतीक्षा सूची कई बार महीनों लंबी होती है।
प्रमुख उत्सव
- जन्माष्टमी: सबसे बड़ा उत्सव – मध्यरात्रि को जन्म आरती के दर्शन के लिए देशभर से भक्त आते हैं।
- होली व फूलडोल: होली पर रंगों और फूलों का उत्सव।
- अन्नकूट: दीपावली के अगले दिन भगवान को छप्पन भोग अर्पित किए जाते हैं।
- तुलसी विवाह और शरद पूर्णिमा पर विशेष श्रृंगार।
दर्शन का समय
- मंगला आरती: सुबह लगभग 6:30 बजे
- सुबह के दर्शन: लगभग 7:00 से दोपहर 1:00 बजे तक (बीच में श्रृंगार व भोग के समय पट कुछ देर बंद रहते हैं)
- दोपहर विश्राम: 1:00 से 5:00 बजे तक
- संध्या दर्शन: शाम 5:00 से रात लगभग 9:30 बजे तक
- शयन आरती: रात लगभग 8:30–9:00 बजे
जन्माष्टमी और बड़े पर्वों पर समय बदल जाता है।
मुख्य आकर्षण
- गोमती घाट: स्वर्ग द्वार की 56 सीढ़ियाँ उतरकर गोमती-समुद्र संगम पर स्नान।
- बेट द्वारका: ओखा से नाव या सुदर्शन सेतु से पहुँचने वाला द्वीप, जहाँ श्रीकृष्ण का निवास माना जाता है (लगभग 30 किमी)।
- नागेश्वर ज्योतिर्लिंग: लगभग 17 किमी दूर, 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक।
- रुक्मिणी देवी मंदिर: नगर से लगभग 2 किमी दूर।
- शारदा पीठ और भड़केश्वर महादेव (समुद्र में चट्टान पर बना शिव मंदिर)।
कैसे पहुँचें
- रेल मार्ग: द्वारका रेलवे स्टेशन मंदिर से लगभग 2 किमी; अहमदाबाद, राजकोट और जामनगर से सीधी ट्रेनें।
- हवाई मार्ग: निकटतम हवाई अड्डे पोरबंदर (लगभग 100 किमी) और जामनगर (लगभग 130 किमी)।
- सड़क मार्ग: जामनगर, पोरबंदर और राजकोट से राज्य परिवहन की बसें और टैक्सियाँ।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
द्वारकाधीश मंदिर में किसकी पूजा होती है?
द्वारकाधीश मंदिर की ध्वजा कितनी बार बदली जाती है?
द्वारका से बेट द्वारका कैसे जाएँ?
द्वारकाधीश मंदिर चार धाम में क्यों गिना जाता है?
द्वारका जाने का सबसे अच्छा समय कौन सा है?
श्री द्वारकाधीश मंदिर, द्वारका इन तीर्थ यात्राओं में शामिल है
अन्य प्रसिद्ध मंदिर
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बनासकांठा, गुजरात अंबाजी मंदिर, बनासकांठा माँ अंबा (श्री वीसा यंत्र); भैरव – बटुक
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वेरावल, गुजरात
सोमनाथ ज्योतिर्लिंग
भगवान शिव
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द्वारका, गुजरात नागेश्वर ज्योतिर्लिंग शिव
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वाराणसी, उत्तर प्रदेश विशालाक्षी मंदिर, वाराणसी माँ विशालाक्षी; भैरव – काल भैरव
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जयपुर, राजस्थान
श्री गोविंद देव जी मंदिर
श्री राधा कृष्णा
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नाथद्वारा, राजस्थान
श्री नाथजी मंदिर
कृष्ण