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कार्तिक कृष्ण द्वादशी

भक्तिरस – BhaktiRas

विशालाक्षी मंदिर, वाराणसी

Vishalakshi Temple, Varanasi

वाराणसी, उत्तर प्रदेश माँ विशालाक्षी; भैरव – काल भैरव निःशुल्क प्रवेश

विशालाक्षी मंदिर उत्तर प्रदेश के वाराणसी (काशी) में मीर घाट के पास, काशी विश्वनाथ मंदिर से कुछ ही दूरी पर स्थित माँ विशालाक्षी का शक्तिपीठ है। तंत्र चूड़ामणि के अनुसार यहाँ मणिकर्णिका क्षेत्र में सती के कर्णकुंडल (कान का आभूषण) गिरे थे – इसीलिए पास का घाट मणिकर्णिका कहलाता है। “विशालाक्षी” का अर्थ है – बड़ी-बड़ी आँखों वाली देवी। काशी में भगवान विश्वनाथ के साथ माँ विशालाक्षी को शक्ति रूप में पूजा जाता है।

शक्तिपीठ की कथा

दक्ष यज्ञ में सती के देह-त्याग के बाद जब भगवान शिव उनके शरीर को लेकर तांडव कर रहे थे, तब भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र से कटकर सती के कानों के मणिजड़ित कुंडल काशी में गिरे। यहाँ की शक्ति विशालाक्षी (कुछ परंपराओं में मणिकर्णी) और भैरव काल भैरव हैं – वही काल भैरव जिन्हें “काशी का कोतवाल” कहा जाता है। मान्यता है कि काशी में मृत्यु होने पर शिव तारक मंत्र देते हैं और माँ विशालाक्षी जीव को मोक्ष की राह दिखाती हैं।

दो मूर्तियाँ और दक्षिण भारतीय परंपरा

गर्भगृह में माँ विशालाक्षी की दो मूर्तियाँ हैं – पीछे छोटी प्राचीन मूर्ति, जिसे आदि विशालाक्षी कहते हैं, और आगे बड़ी मूर्ति। मंदिर का संबंध दक्षिण भारत से गहरा है: इसका जीर्णोद्धार तमिल नाट्टुकोट्टई चेट्टियार समुदाय ने कराया था, इसलिए मंदिर की बनावट और पूजा पद्धति में दक्षिण भारतीय झलक दिखती है। कांचीपुरम की कामाक्षी, मदुरै की मीनाक्षी और काशी की विशालाक्षी को देवी के तीन प्रमुख स्थान माना जाता है।

पूजा और उत्सव

  • नवरात्रि: नवदुर्गा यात्रा में भक्त काशी के नौ देवी मंदिरों के साथ विशालाक्षी के दर्शन करते हैं।
  • मंगलवार और शुक्रवार: देवी पूजा के विशेष दिन – विवाहित महिलाएँ सौभाग्य के लिए माँ विशालाक्षी की पूजा करती हैं।
  • मान्यता है कि यहाँ पूजा करने से संतान सुख और वैवाहिक जीवन में सौभाग्य मिलता है; अविवाहित कन्याएँ अच्छे वर के लिए प्रार्थना करती हैं।

काशी में आसपास के दर्शन

विशालाक्षी मंदिर तक गोदौलिया चौराहे से संकरी गलियों से होकर पैदल पहुँचा जाता है। एक ही यात्रा में काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग, माँ अन्नपूर्णा मंदिर, काल भैरव मंदिर, मणिकर्णिका घाट और दशाश्वमेध घाट की गंगा आरती के दर्शन किए जा सकते हैं।

दर्शन का समय

  • सुबह: लगभग 4:30 से 11:00 बजे तक
  • दोपहर-रात: लगभग 12:00 से रात 10:00 बजे तक
  • आरती: सुबह मंगला आरती और रात शयन आरती

नवरात्रि में भीड़ अधिक होती है और समय बढ़ सकता है।

मुख्य आकर्षण

  • आदि विशालाक्षी और मुख्य मूर्ति – गर्भगृह में दोनों।
  • मणिकर्णिका घाट – कुंडल गिरने का क्षेत्र।
  • काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग – कुछ मिनट पैदल।
  • अन्नपूर्णा मंदिर और काल भैरव मंदिर।
  • दशाश्वमेध घाट की संध्या गंगा आरती।

कैसे पहुँचें

  • रेल मार्ग: वाराणसी जंक्शन (कैंट) लगभग 5 किमी; बनारस स्टेशन लगभग 7 किमी।
  • हवाई मार्ग: लाल बहादुर शास्त्री अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, बाबतपुर (लगभग 25 किमी)।
  • सड़क मार्ग: गोदौलिया चौराहे तक ऑटो/ई-रिक्शा, फिर गलियों से पैदल (लगभग 500 मीटर)।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

विशालाक्षी शक्तिपीठ में सती का कौन सा अंग गिरा था?
तंत्र चूड़ामणि के अनुसार वाराणसी के मणिकर्णिका क्षेत्र में सती के कर्णकुंडल (कान के आभूषण) गिरे थे। यहाँ की शक्ति विशालाक्षी और भैरव काल भैरव हैं।
विशालाक्षी नाम का अर्थ क्या है?
विशालाक्षी का अर्थ है बड़ी-बड़ी आँखों वाली देवी। काशी में वे भगवान विश्वनाथ की शक्ति मानी जाती हैं।
काशी विश्वनाथ से विशालाक्षी मंदिर कितनी दूर है?
विशालाक्षी मंदिर काशी विश्वनाथ मंदिर से कुछ ही मिनट की पैदल दूरी पर मीर घाट के पास है।
विशालाक्षी मंदिर का दर्शन समय क्या है?
मंदिर सुबह लगभग 4:30 से 11:00 बजे और दोपहर 12:00 से रात 10:00 बजे तक खुला रहता है।
मणिकर्णिका घाट का नाम कैसे पड़ा?
मान्यता है कि यहाँ सती के मणिजड़ित कर्णकुंडल गिरे थे, इसलिए इस घाट का नाम मणिकर्णिका पड़ा। एक अन्य कथा में यहाँ शिव-पार्वती के कुंडल गिरने का उल्लेख है।

विशालाक्षी मंदिर, वाराणसी इन तीर्थ यात्राओं में शामिल है

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