श्री वेंकटेश्वर स्वामी मंदिर आंध्र प्रदेश के एलुरु जिले में शेषाचल पहाड़ी पर स्थित है। भक्त इसे प्रेम से “चिन्न तिरुपति” – छोटा तिरुपति – कहते हैं। जो भक्त तिरुमला नहीं जा पाते, वे यहीं भगवान वेंकटेश्वर के दर्शन करके अपनी मन्नतें पूरी करते हैं और कल्याण कट्टा में मुंडन कराते हैं। गोदावरी क्षेत्र के सबसे अधिक दर्शनार्थियों वाले मंदिरों में इसकी गिनती होती है।
द्वारका ऋषि और स्वयंभू मूर्ति
स्थल पुराण के अनुसार द्वारका नामक ऋषि ने यहाँ इतनी कठोर तपस्या की कि उनके चारों ओर बाँबी (वल्मीक) बन गई। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान वेंकटेश्वर स्वयं प्रकट हुए। इन्हीं ऋषि के नाम पर यह स्थान द्वारका तिरुमला कहलाया। मान्यता है कि ऋषि ने उत्तर की ओर मुख करके तप किया था, इसलिए यहाँ भगवान दक्षिणमुखी हैं – जो अधिकांश मंदिरों से अलग है।
दो प्रतिमाएँ
गर्भगृह में दो प्रतिमाएँ हैं। आगे की स्वयंभू मूर्ति केवल वक्ष तक दिखाई देती है, क्योंकि उसका निचला भाग बाँबी में है। चरणों की पूजा के लिए उसके पीछे भगवान की पूर्ण प्रतिमा स्थापित की गई, जिसका श्रेय परंपरा में श्री रामानुजाचार्य को दिया जाता है। स्वयंभू मूर्ति का अभिषेक नहीं होता – कहा जाता है कि जल डालने पर बाँबी से लाल चींटियाँ निकल आती हैं।
मंदिर का निर्माण
मंदिर द्रविड़ शैली में है, जिसमें पाँच मंज़िला राजगोपुरम और तीन छोटे गोपुरम हैं। विमान, मंडप, गोपुरम और प्राकार के निर्माण का श्रेय शासक धर्म अप्पा राव को दिया जाता है। 19वीं शताब्दी में मैलवरम की रानी चिन्नम्मा राव ने भगवान को स्वर्ण आभूषण और चाँदी के वाहन भेंट किए। परिसर में देवी पद्मावती, नांचारी और आंजनेय स्वामी के मंदिर तथा द्वारका ऋषि और अन्नमाचार्य की प्रतिमाएँ हैं।
प्रमुख उत्सव
- तिरु कल्याणोत्सव – वर्ष में दो बार: वैशाख में स्वयंभू मूर्ति के लिए और आश्वयुज में पूर्ण प्रतिमा के लिए।
- गिरि प्रदक्षिणा (जनवरी) – पहाड़ी की परिक्रमा।
- रथोत्सव और तेप्पोत्सव (नौका उत्सव)।
आसपास के दर्शन
द्वारका तिरुमला एलुरु से लगभग 42 किमी और भीमडोलु जंक्शन से लगभग 15 किमी दूर है। आसपास गुरवायगूडेम का मद्दि आंजनेय स्वामी मंदिर और जंगारेड्डीगूडेम का पारिजात गिरि वेंकटेश्वर मंदिर भी दर्शनीय हैं।
दर्शन का समय
- दर्शन: लगभग सुबह 6:00 से दोपहर 1:00 बजे तक और दोपहर 3:00 से रात 9:00 बजे तक (उत्सवों पर समय बदल सकता है)
मुख्य आकर्षण
- स्वयंभू वेंकटेश्वर – बाँबी से प्रकट, केवल वक्ष तक दिखने वाली प्रतिमा।
- पूर्ण प्रतिमा – चरण पूजा के लिए पीछे स्थापित।
- दक्षिणमुखी गर्भगृह – अधिकांश मंदिरों से अलग।
- पद्मावती, नांचारी और आंजनेय के मंदिर, द्वारका ऋषि और अन्नमाचार्य की प्रतिमाएँ।
कैसे पहुँचें
- सड़क मार्ग: एलुरु से लगभग 42 किमी, राजमहेंद्रवरम से लगभग 75 किमी; एलुरु, राजमहेंद्रवरम और विजयवाड़ा से APSRTC बसें।
- रेल मार्ग: भीमडोलु जंक्शन (लगभग 15 किमी); एक्सप्रेस ट्रेनों के लिए एलुरु।
- हवाई मार्ग: राजमहेंद्रवरम या विजयवाड़ा हवाई अड्डा।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
द्वारका तिरुमला को चिन्न तिरुपति क्यों कहते हैं?
इस स्थान का नाम द्वारका तिरुमला कैसे पड़ा?
गर्भगृह में दो मूर्तियाँ क्यों हैं?
यहाँ अभिषेक क्यों नहीं होता?
द्वारका तिरुमला में कल्याणोत्सव कब होता है?
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