मालिनीथान अरुणाचल प्रदेश के लोअर सियांग ज़िले में लिकाबाली के पास, सियांग पहाड़ियों की तलहटी में लगभग 21 मीटर ऊँची पहाड़ी पर स्थित एक प्राचीन मंदिर का पुरातात्विक स्थल है। ब्रह्मपुत्र के उत्तरी तट के इस क्षेत्र में, असम की सीमा के पास, यहाँ पूर्णतः पत्थर से बने मंदिर के अवशेष और सुंदर मूर्तियाँ मिली हैं। ‘मालिनीथान’ का अर्थ है ‘मालिनी का स्थान’, और आज भी यह श्रद्धालुओं के लिए पूजा और मेलों का केंद्र है।
कृष्ण-रुक्मिणी और मालिनी की कथा
16वीं शताब्दी में श्रीमंत शंकरदेव ने इस क्षेत्र को महाभारत-पुराणों के विदर्भ राजा भीष्मक से जोड़ा। कथा के अनुसार श्रीकृष्ण रुक्मिणी का हरण करके द्वारका जाते समय यहाँ रुके, जहाँ तपस्या कर रहे शिव और पार्वती ने उनका सत्कार किया। इस कथा में पार्वती (दुर्गा) को ‘मालिनी’ कहा गया और इसी से स्थान का नाम मालिनीथान पड़ा।
इतिहास और उत्खनन
माना जाता है कि मंदिर का निर्माण चुटिया राजाओं ने 13वीं-14वीं शताब्दी में करवाया; अधिकतर पुरातत्वविद इसे 13वीं शताब्दी का मानते हैं। मंदिर पूर्णतः पत्थर का (अश्ममय) था। पत्थरों पर मिले शिल्पियों के चिह्न और लोहे की कीलें सदिया क्षेत्र के ताम्रेश्वरी मंदिर से मिलती-जुलती हैं, जिससे दोनों के एक ही शिल्पियों द्वारा बनाए जाने का अनुमान है। उत्खनन में लगभग 8 फुट ऊँचा, बारीक नक्काशी वाला चबूतरा, टूटे स्तंभ और पट्टिकाएँ मिलीं; बाद के उत्खनन में आसपास और भी मंदिर-आधार मिले, जिससे लगता है कि यहाँ मंदिरों का एक समूह था।
मूर्तियाँ और उपासना
यहाँ मिली ग्रेनाइट मूर्तियों में ऐरावत पर इंद्र, मयूर पर कार्तिकेय, रथ पर सूर्य, मूषक पर गणेश और एक विशाल नंदी प्रमुख हैं। अवशेषों के कोनों पर हाथियों पर खड़े चार सिंहों की मूर्तियाँ हैं। मिथुन मूर्तियाँ यहाँ तांत्रिक उपासना की ओर संकेत करती हैं। विद्वानों के अनुसार यहाँ की अधिष्ठात्री देवी की उपासना में स्थानीय जनजातीय परंपराएँ भी जुड़ी रहीं और देउरी पुजारी पूजा करते थे।
प्रमुख उत्सव
- मकर संक्रांति: हज़ारों श्रद्धालु पास की आकाशी गंगा में स्नान करके मालिनीथान में पूजा करते हैं।
- मालिनी मेला: लोअर सियांग का पाँच दिवसीय वार्षिक मेला।
- बासंती पूजा के समय भी पास में बड़ा मेला लगता है।
दर्शन का समय
- दर्शन: दिन के उजाले में, लगभग सुबह 6:00 से शाम 5:00 बजे तक
मकर संक्रांति और मालिनी मेले के दिनों में भारी भीड़ रहती है; समय स्थानीय रूप से बदल सकता है।
मुख्य आकर्षण
- मंदिर का चबूतरा – लगभग 8 फुट ऊँचा, फूल-पत्तियों की बारीक नक्काशी वाला।
- ग्रेनाइट मूर्तियाँ – ऐरावत पर इंद्र, मयूर पर कार्तिकेय, रथ पर सूर्य, मूषक पर गणेश और विशाल नंदी।
- हाथियों पर सिंह – अवशेषों के कोनों पर चार मूर्तियाँ।
- आकाशी गंगा – पास का पवित्र स्नान स्थल।
- पहाड़ी से ब्रह्मपुत्र के मैदानों का दृश्य।
कैसे पहुँचें
- सड़क मार्ग: स्थल लिकाबाली (लोअर सियांग ज़िला मुख्यालय) के पास असम सीमा पर है; असम के सिलापथार और उत्तर लखीमपुर से सड़क मार्ग।
- रेल मार्ग: असम की ओर सिलापथार क्षेत्र के स्टेशन।
- हवाई मार्ग: लीलाबाड़ी हवाई अड्डा (उत्तर लखीमपुर, असम) और डिब्रूगढ़।
- परमिट: अरुणाचल प्रदेश के बाहर के भारतीय यात्रियों को इनर लाइन परमिट (ILP) की आवश्यकता होती है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
मालिनीथान नाम कैसे पड़ा?
मालिनीथान मंदिर कितना पुराना है?
मालिनीथान में कौन सी मूर्तियाँ मिली हैं?
मालिनीथान किस ज़िले में है?
मालिनीथान में कौन से पर्व मनाए जाते हैं?
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