ज्वाला जी मंदिर (ज्वालामुखी देवी) हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा ज़िले के ज्वालामुखी कस्बे में स्थित 51 शक्तिपीठों में से एक है। तंत्र चूड़ामणि के अनुसार यहाँ सती की जिह्वा (जीभ) गिरी थी। इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ कोई मूर्ति नहीं है – चट्टानों की दरारों से निकलने वाली प्राकृतिक ज्वालाओं की ही देवी के रूप में पूजा होती है। ये ज्योतियाँ सदियों से बिना किसी ईंधन के लगातार जल रही हैं।
नौ ज्योतियाँ – देवी के नौ रूप
मंदिर के गर्भगृह में अलग-अलग स्थानों पर नौ ज्योतियाँ जलती हैं, जिन्हें देवी के नौ रूप माना जाता है – महाकाली, अन्नपूर्णा, चंडी, हिंगलाज, विंध्यवासिनी, महालक्ष्मी, सरस्वती, अंबिका और अंजी देवी। इनमें सबसे बड़ी ज्योति चाँदी के आले में जलती है, जिसे महाकाली का रूप माना जाता है। यहाँ की शक्ति सिद्धिदा (अंबिका) और भैरव उन्मत्त भैरव हैं। वैज्ञानिक रूप से ये ज्वालाएँ ज़मीन से निकलने वाली प्राकृतिक गैस से जलती मानी जाती हैं, पर भक्तों के लिए यह देवी का साक्षात तेज है।
अकबर और सोने का छत्र
लोककथा के अनुसार मुग़ल बादशाह अकबर ने ज्वाला को बुझाने के लिए उस पर पानी की धारा डलवाई और लोहे के तवे रखवाए, पर ज्वाला नहीं बुझी। देवी की शक्ति मानकर अकबर ने सोने का छत्र चढ़ाया, लेकिन वह छत्र किसी अज्ञात धातु में बदल गया – मान्यता है कि देवी ने अहंकार से चढ़ाया चढ़ावा स्वीकार नहीं किया। यह छत्र आज भी मंदिर में रखा है। ध्यानु भगत की कथा भी इसी प्रसंग से जुड़ी है, जिनकी भक्ति की परीक्षा अकबर ने ली थी।
इतिहास और वास्तुकला
मंदिर का प्राचीन स्वरूप कांगड़ा के कटोच राजाओं से जुड़ा माना जाता है। 19वीं शताब्दी में महाराजा रणजीत सिंह ने मंदिर के गुंबद पर सोना चढ़वाया और उनके पुत्र खड़क सिंह ने चाँदी के द्वार भेंट किए। मंदिर इंडो-सिख शैली में बना है – सुनहरा गुंबद और सामने चाँदी की परत वाले दरवाज़े। मंदिर के पास गोरख डिब्बी नामक कुंड है, जिसमें पानी खौलता दिखता है पर छूने पर ठंडा होता है; मान्यता है कि गुरु गोरखनाथ यहाँ तप करते थे।
प्रमुख उत्सव
- चैत्र और शारदीय नवरात्रि: सबसे बड़ा मेला, देशभर से श्रद्धालु आते हैं।
- मंदिर में दिन भर में पाँच आरतियाँ होती हैं – मंगल, पंचोपचार, भोग, संध्या और शयन आरती।
- भक्त देवी को रबड़ी, मिश्री, दूध और नारियल का भोग चढ़ाते हैं।
कांगड़ा क्षेत्र में ज्वाला जी के साथ चामुंडा देवी, ब्रजेश्वरी देवी (कांगड़ा), चिंतपूर्णी और नैना देवी के दर्शन की परंपरा है, जिसे “हिमाचल की देवी यात्रा” कहा जाता है।
दर्शन का समय
- गर्मी: सुबह लगभग 5:00 से रात 10:00 बजे तक
- सर्दी: सुबह लगभग 6:00 से रात 9:00 बजे तक
- पाँच आरतियाँ: मंगल आरती (सुबह), पंचोपचार, भोग आरती (दोपहर), संध्या आरती और शयन आरती (रात)
नवरात्रि में दर्शन का समय बढ़ा दिया जाता है।
मुख्य आकर्षण
- नौ प्राकृतिक ज्योतियाँ – गर्भगृह में।
- अकबर का छत्र – मंदिर में रखा।
- गोरख डिब्बी – खौलता दिखने वाला ठंडा कुंड।
- नागिनी माता और टेढ़ा मंदिर – पास के छोटे मंदिर।
- कांगड़ा किला, ब्रजेश्वरी देवी (लगभग 30 किमी) और चामुंडा देवी।
कैसे पहुँचें
- सड़क मार्ग: कांगड़ा से लगभग 30 किमी, धर्मशाला से लगभग 55 किमी; चंडीगढ़ और दिल्ली से सीधी बसें।
- रेल मार्ग: पठानकोट-जोगिंदरनगर नैरो गेज पर ज्वालामुखी रोड स्टेशन (लगभग 20 किमी); बड़ा स्टेशन ऊना (लगभग 75 किमी)।
- हवाई मार्ग: गग्गल हवाई अड्डा, कांगड़ा (लगभग 45 किमी)।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
ज्वाला जी मंदिर में कितनी ज्योतियाँ जलती हैं?
ज्वाला जी शक्तिपीठ में सती का कौन सा अंग गिरा था?
क्या ज्वाला जी मंदिर में मूर्ति है?
अकबर का छत्र क्या है?
ज्वाला जी मंदिर कैसे पहुँचें?
ज्वाला जी मंदिर (ज्वालामुखी देवी), कांगड़ा इन तीर्थ यात्राओं में शामिल है
अन्य प्रसिद्ध मंदिर
-
जयपुर, राजस्थान
मंदिर श्री बृज निधि जी
श्री कृष्ण एवं राधा
-
वाराणसी, उत्तर प्रदेश विशालाक्षी मंदिर, वाराणसी माँ विशालाक्षी; भैरव – काल भैरव
-
जयपुर, राजस्थान
झारखण्ड महादेव मंदिर
शिव
-
जयपुर, राजस्थान
श्री गोविंद देव जी मंदिर
श्री राधा कृष्णा
-
नाथद्वारा, राजस्थान
श्री नाथजी मंदिर
कृष्ण
-
जयपुर, राजस्थान
आनंद कृष्ण बिहारी जी मंदिर
कृष्ण