श्री जगन्नाथ मंदिर ओडिशा के पुरी नगर में बंगाल की खाड़ी के तट पर स्थित भगवान जगन्नाथ (श्रीकृष्ण), उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा का धाम है। यह चार धामों में पूर्व दिशा का धाम है और 108 दिव्य देशमों में भी शामिल है। विश्व प्रसिद्ध रथ यात्रा, लकड़ी की अनोखी मूर्तियाँ और मंदिर की रसोई में बनने वाला महाप्रसाद इसे भारत के सबसे विशिष्ट मंदिरों में से एक बनाते हैं। पुरी को इसी कारण “जगन्नाथ पुरी” या “श्रीक्षेत्र” भी कहा जाता है।
जगन्नाथ जी की कथा
स्कंद पुराण की कथा के अनुसार मालवा के राजा इंद्रद्युम्न को स्वप्न में भगवान नील माधव के दर्शन हुए। भगवान ने आदेश दिया कि समुद्र में बहकर आने वाले दारु (लकड़ी के लट्ठे) से उनकी मूर्ति बनाई जाए। एक वृद्ध शिल्पी – जिन्हें स्वयं विश्वकर्मा माना जाता है – ने शर्त रखी कि मूर्तियाँ बनने तक कोई द्वार नहीं खोलेगा। रानी की अधीरता से समय से पहले द्वार खुल गया और शिल्पी अंतर्धान हो गए। मूर्तियाँ अधूरी रह गईं – बिना हाथ-पैर के पूर्ण रूप में न होने के बावजूद भगवान ने इसी रूप में पूजे जाने की इच्छा प्रकट की। आज भी जगन्नाथ जी इसी स्वरूप में विराजमान हैं।
मंदिर का इतिहास
वर्तमान मंदिर का निर्माण 12वीं शताब्दी में पूर्वी गंग वंश के राजा अनंतवर्मन चोडगंग देव ने शुरू कराया और उनके उत्तराधिकारी अनंगभीम देव के समय यह पूरा हुआ। कलिंग शैली में बना मुख्य मंदिर (विमान) लगभग 65 मीटर ऊँचा है और इसके शिखर पर अष्टधातु का नीलचक्र लगा है। मंदिर परिसर लगभग 10 एकड़ में फैला है, जिसमें 30 से अधिक छोटे-बड़े मंदिर हैं।
नवकलेवर – मूर्तियों का नया शरीर
भगवान जगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा और सुदर्शन की मूर्तियाँ नीम की पवित्र लकड़ी (दारु ब्रह्म) से बनती हैं। जिस वर्ष आषाढ़ मास दो बार (अधिक मास) आता है – लगभग 12 से 19 वर्षों में – तब नवकलेवर उत्सव में नई मूर्तियाँ बनाई जाती हैं और पुरानी मूर्तियों से “ब्रह्म पदार्थ” गोपनीय विधि से नई मूर्तियों में स्थानांतरित किया जाता है। पिछला नवकलेवर 2015 में हुआ था।
रथ यात्रा और महाप्रसाद
हर वर्ष आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को तीनों देवता विशाल लकड़ी के रथों – नंदीघोष (जगन्नाथ), तालध्वज (बलभद्र) और दर्पदलन (सुभद्रा) – पर सवार होकर लगभग 3 किमी दूर गुंडिचा मंदिर जाते हैं। लाखों भक्त रथ की रस्सियाँ खींचते हैं। नौ दिन बाद “बहुड़ा यात्रा” में भगवान लौटते हैं।
मंदिर की रसोई को दुनिया की सबसे बड़ी मंदिर रसोइयों में गिना जाता है। यहाँ मिट्टी के बर्तनों में, लकड़ी की आग पर एक के ऊपर एक रखकर भोग पकाया जाता है। भगवान को चढ़ने के बाद यह भोग माता विमला को अर्पित होता है और फिर महाप्रसाद बनता है, जो मंदिर के आनंद बाज़ार में मिलता है।
ध्यान दें: जगन्नाथ मंदिर में केवल हिंदू धर्मावलंबियों को प्रवेश की अनुमति है। अन्य श्रद्धालु पास के रघुनंदन पुस्तकालय की छत से मंदिर के दर्शन कर सकते हैं।
दर्शन का समय
- मंदिर खुलना (द्वारफिटा व मंगल आरती): सुबह लगभग 5:00 बजे
- सामान्य दर्शन: सुबह से रात लगभग 10–11 बजे तक, बीच-बीच में भोग और श्रृंगार के समय कुछ देर पट बंद रहते हैं
- सहनमेला (सबके लिए निकट दर्शन): सुबह की आरती के बाद कुछ समय
- बड़सिंहार (शयन): रात लगभग 11 बजे के बाद
रथ यात्रा, स्नान पूर्णिमा और अनासर काल (रथ यात्रा से पहले के 15 दिन, जब मूर्तियों के दर्शन नहीं होते) में समय बदल जाता है।
मुख्य आकर्षण
- आनंद बाज़ार: मंदिर परिसर का बाज़ार जहाँ महाप्रसाद मिलता है।
- नीलचक्र और पतितपावन ध्वज: शिखर का अष्टधातु चक्र और रोज़ बदला जाने वाला ध्वज।
- गुंडिचा मंदिर: रथ यात्रा का गंतव्य, लगभग 3 किमी।
- स्वर्गद्वार समुद्र तट और गोवर्धन मठ (शंकराचार्य का पूर्वाम्नाय पीठ)।
- कोणार्क सूर्य मंदिर (लगभग 35 किमी) और चिल्का झील आसपास के प्रमुख स्थल।
कैसे पहुँचें
- रेल मार्ग: पुरी रेलवे स्टेशन मंदिर से लगभग 3 किमी; देश के बड़े शहरों से सीधी ट्रेनें।
- हवाई मार्ग: बीजू पटनायक अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, भुवनेश्वर (लगभग 60 किमी)।
- सड़क मार्ग: भुवनेश्वर और कटक से नियमित बसें व टैक्सी; ग्रैंड रोड मंदिर के सिंहद्वार तक जाती है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
जगन्नाथ पुरी में किन देवताओं की पूजा होती है?
जगन्नाथ रथ यात्रा कब निकलती है?
जगन्नाथ जी की मूर्ति अधूरी क्यों है?
क्या जगन्नाथ मंदिर में सभी जा सकते हैं?
नवकलेवर क्या है?
श्री जगन्नाथ मंदिर, पुरी इन तीर्थ यात्राओं में शामिल है
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