जगद्रक्षक पेरुमाल मंदिर तंजावुर ज़िले में तिरुवैयारु–कुंभकोणम मार्ग पर स्थित है। दिव्य प्रबंधम में इस स्थान को तिरुक्कूडलूर कहा गया है, और स्थानीय लोग इसे आडुतुरै पेरुमाल कोविल कहते हैं। यह 108 दिव्य देशमों में से एक है। यहाँ भगवान विष्णु जगद्रक्षक – “जगत की रक्षा करने वाले” – अथवा वैयम कात्त पेरुमाल के रूप में और देवी लक्ष्मी पद्मासनी (पुष्पवल्ली) थायार के रूप में पूजी जाती हैं।
स्थल पुराण
स्थल पुराण के अनुसार असुर हिरण्याक्ष भूदेवी को पाताल ले गया था। भगवान विष्णु ने वराह रूप धारण कर धरती को चीरा और भूदेवी को वापस लाए। उनके दर्शन के लिए सभी देवता और ऋषि यहाँ एकत्र हुए – तमिल में इस “कूडल” (एकत्र होने) से ही गाँव का नाम कूडलूर पड़ा। मान्यता है कि गर्भगृह में विग्रह के पास का खुला भाग धरती का केंद्र है। तिरुमंगै आऴ्वार ने इस गाँव को “पुगुन्दान ऊर” कहा है।
एक अन्य कथा भक्त राजा अम्बरीष से जुड़ी है, जिनकी रक्षा भगवान के सुदर्शन चक्र ने दुर्वासा ऋषि के क्रोध से की थी। माना जाता है कि यह मंदिर अम्बरीष ने बनवाया, इसलिए भगवान को अम्बरीष वरदर भी कहते हैं। एक कथा के अनुसार कावेरी नदी ने भी यहाँ भगवान की आराधना कर स्वयं को पवित्र किया।
मंदिर और विग्रह
गर्भगृह में भगवान खड़ी मुद्रा में दर्शन देते हैं और गर्भगृह के ऊपर शुद्ध सत्त्व विमानम है। थायार की अलग सन्निधि है। परिसर में रामानुज, आऴ्वारों, आण्डाल और गरुड़ की सन्निधियाँ हैं। मदुरै की रानी मंगम्माल ने मंदिर के अम्बरीष रथ का जीर्णोद्धार कराया था, और मंदिर में उनकी प्रतिमा भी है। मंदिर का निर्माण चोल काल का माना जाता है, बाद में विजयनगर और मदुरै नायकों ने इसमें योगदान दिया।
आऴ्वार और दिव्य प्रबंधम
नालायिर दिव्य प्रबंधम में तिरुमंगै आऴ्वार ने इस दिव्य देशम की स्तुति की है। चोल नाडु के दिव्य देशमों की यात्रा करने वाले भक्त इसे कण्डियूर और कपिस्थलम के बीच के पड़ाव के रूप में देखते हैं।
यात्रा सुझाव
यह मंदिर गाँव में है, इसलिए दोपहर में बंद रहने के समय का ध्यान रखें। एक ही यात्रा में तिरुक्कण्डियूर, तिरुक्कूडलूर, कपिस्थलम और कुंभकोणम के दिव्य देशमों के दर्शन किए जा सकते हैं।
दर्शन का समय
- सुबह: लगभग 7:30 से दोपहर 12:00 बजे तक
- शाम: लगभग 4:30 से रात 8:00 बजे तक
मुख्य आकर्षण
- जगद्रक्षक पेरुमाल – खड़ी मुद्रा में; अम्बरीष वरदर और वैयम कात्त पेरुमाल नामों से भी प्रसिद्ध।
- पद्मासनी (पुष्पवल्ली) थायार की अलग सन्निधि।
- शुद्ध सत्त्व विमानम।
- रानी मंगम्माल की प्रतिमा – जिन्होंने मंदिर के अम्बरीष रथ का जीर्णोद्धार कराया।
- रामानुज, आऴ्वार, आण्डाल और गरुड़ की सन्निधियाँ।
कैसे पहुँचें
- सड़क मार्ग: तिरुवैयारु–कुंभकोणम मार्ग पर, तिरुवैयारु से लगभग 12 किमी और कुंभकोणम से लगभग 20 किमी; अय्यम्पेट्टै भी पास है।
- रेल मार्ग: पापनाशम या अय्यम्पेट्टै छोटे स्टेशन; तंजावुर और कुंभकोणम बड़े स्टेशन हैं।
- हवाई मार्ग: तिरुचिरापल्ली अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा (लगभग 75 किमी)।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
इस स्थान का नाम तिरुक्कूडलूर क्यों है?
वराह अवतार से इस मंदिर का क्या संबंध है?
राजा अम्बरीष की क्या कथा है?
किस आऴ्वार ने तिरुक्कूडलूर की स्तुति की?
इसे आडुतुरै पेरुमाल कोविल क्यों कहते हैं?
जगद्रक्षक पेरुमाल मंदिर, तिरुक्कूडलूर (आडुतुरै) इन तीर्थ यात्राओं में शामिल है
अन्य प्रसिद्ध मंदिर
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