श्रीकृष्ण जन्मभूमि उत्तर प्रदेश के मथुरा नगर में वह पवित्र स्थान है जहाँ मान्यता के अनुसार कंस के कारागार में भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था। मथुरा सप्तपुरी की सात मोक्षदायिनी नगरियों में से एक है और ब्रज-चौरासी कोस परिक्रमा का केंद्र भी। जन्मभूमि परिसर में गर्भगृह (कारागार), केशवदेव मंदिर और भव्य भागवत भवन – ये तीन मुख्य दर्शन स्थल हैं।
श्रीकृष्ण जन्म की कथा
श्रीमद्भागवत के अनुसार मथुरा के अत्याचारी राजा कंस को आकाशवाणी से पता चला कि उसकी बहन देवकी की आठवीं संतान उसका वध करेगी। कंस ने देवकी और वसुदेव को कारागार में डाल दिया और उनकी छह संतानों को मार डाला। भाद्रपद कृष्ण अष्टमी की आधी रात, रोहिणी नक्षत्र में, कारागार में ही आठवीं संतान के रूप में श्रीकृष्ण का जन्म हुआ। पहरेदार सो गए, बेड़ियाँ खुल गईं और वसुदेव उफनती यमुना पार करके शिशु को गोकुल में नंद-यशोदा के घर छोड़ आए। इसी रात की स्मृति में जन्माष्टमी मनाई जाती है।
जन्मभूमि परिसर के दर्शन स्थल
- गर्भगृह (श्रीकृष्ण जन्मस्थान): कारागार के रूप में बना वह कक्ष जहाँ जन्म का स्थान माना जाता है। यहाँ पत्थर का एक चबूतरा है, जिसके दर्शन के लिए भक्त झुककर प्रवेश करते हैं।
- केशवदेव मंदिर: भगवान केशव (श्रीकृष्ण) का प्राचीन परंपरा वाला मंदिर।
- भागवत भवन: 20वीं शताब्दी में बना विशाल मंदिर, जिसमें राधा-कृष्ण, बलराम-रेवती, जगन्नाथ जी, राम दरबार और दुर्गा माता के विग्रह हैं; दीवारों पर श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक ताम्रपत्रों पर अंकित हैं।
इतिहास
परंपरा के अनुसार श्रीकृष्ण के प्रपौत्र वज्रनाभ ने यहाँ पहला मंदिर बनवाया। इतिहास में इस स्थान पर कई बार भव्य मंदिर बने और आक्रमणों में नष्ट हुए – गुप्त काल, फिर 11वीं शताब्दी और बाद में ओरछा के राजा वीर सिंह देव बुंदेला द्वारा बनवाया गया भव्य केशवदेव मंदिर इनमें प्रमुख हैं। वर्तमान परिसर का विकास 1950 के दशक में बने श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट और श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान के प्रयासों से हुआ, जिसमें पंडित मदन मोहन मालवीय और जुगल किशोर बिड़ला की प्रमुख भूमिका रही।
जन्माष्टमी और प्रमुख उत्सव
जन्माष्टमी पर मध्यरात्रि 12 बजे गर्भगृह में भगवान का जन्माभिषेक होता है और पूरा मथुरा “नंद के आनंद भयो” के जयकारों से गूँज उठता है। अगले दिन नंदोत्सव मनाया जाता है। होली के समय ब्रज के बरसाना, नंदगाँव और वृंदावन के साथ मथुरा में भी रंगोत्सव की धूम रहती है।
सुरक्षा नियम: परिसर में कड़ी सुरक्षा रहती है। मोबाइल, कैमरा, बैग, पेन और इलेक्ट्रॉनिक सामान ले जाना मना है; इन्हें प्रवेश द्वार के पास जमा करना होता है।
दर्शन का समय
- गर्मी (अप्रैल-सितंबर): सुबह लगभग 5:00 से दोपहर 12:00 बजे, शाम 4:00 से रात 9:30 बजे तक
- सर्दी (अक्टूबर-मार्च): सुबह लगभग 5:30 से दोपहर 12:00 बजे, शाम 3:00 से रात 8:30 बजे तक
- मंगला आरती: सुबह मंदिर खुलने पर; शयन आरती: रात बंद होने से पहले
जन्माष्टमी पर मंदिर मध्यरात्रि के बाद तक खुला रहता है।
मुख्य आकर्षण
- गर्भगृह: श्रीकृष्ण के जन्म का कारागार स्वरूप कक्ष।
- भागवत भवन: ताम्रपत्रों पर अंकित गीता और भव्य विग्रह।
- विश्राम घाट: कंस वध के बाद श्रीकृष्ण ने यहीं विश्राम किया – शाम की यमुना आरती प्रसिद्ध है (लगभग 2 किमी)।
- द्वारकाधीश मंदिर (मथुरा) और पोतरा कुंड।
- वृंदावन (लगभग 12 किमी), गोकुल और गोवर्धन – ब्रज के प्रमुख तीर्थ।
कैसे पहुँचें
- रेल मार्ग: मथुरा जंक्शन (लगभग 3 किमी) – दिल्ली, आगरा, मुंबई, कोलकाता से सीधी ट्रेनें।
- सड़क मार्ग: दिल्ली से यमुना एक्सप्रेसवे द्वारा लगभग 180 किमी; आगरा से लगभग 60 किमी।
- हवाई मार्ग: निकटतम हवाई अड्डे आगरा (लगभग 60 किमी) और दिल्ली (लगभग 180 किमी)।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
श्रीकृष्ण जन्मभूमि में दर्शन का समय क्या है?
क्या जन्मभूमि में मोबाइल ले जा सकते हैं?
मथुरा से वृंदावन कितनी दूर है?
मथुरा को सप्तपुरी में क्यों गिना जाता है?
जन्माष्टमी पर मथुरा में क्या होता है?
श्रीकृष्ण जन्मभूमि, मथुरा इन तीर्थ यात्राओं में शामिल है
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