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कार्तिक कृष्ण द्वादशी

भक्तिरस – BhaktiRas

हर की पौड़ी, हरिद्वार

Har Ki Pauri, Haridwar

हरिद्वार, उत्तराखंड माँ गंगा; भगवान विष्णु के चरण-चिह्न निःशुल्क प्रवेश

हर की पौड़ी उत्तराखंड के हरिद्वार में गंगा नदी पर बना सबसे पवित्र घाट है। “हर की पौड़ी” का अर्थ है – हरि (भगवान विष्णु) के चरण; मान्यता है कि यहाँ के एक पत्थर पर भगवान विष्णु के चरण-चिह्न हैं। घाट का सबसे पवित्र भाग ब्रह्मकुंड कहलाता है। पहाड़ों से निकलकर गंगा यहीं मैदानों में प्रवेश करती है। हरिद्वार को शास्त्रों में मायापुरी कहा गया है और यह सप्तपुरी की सात मोक्षदायिनी नगरियों में से एक है।

ब्रह्मकुंड और अमृत की कथा

समुद्र मंथन से निकले अमृत कलश को लेकर जब गरुड़ आकाश मार्ग से जा रहे थे, तब अमृत की बूँदें चार स्थानों पर गिरीं – हरिद्वार, प्रयागराज, उज्जैन और नासिक। हरिद्वार में ये बूँदें ब्रह्मकुंड में गिरी मानी जाती हैं। यही कारण है कि हर 12 वर्ष में यहाँ कुंभ मेला और 6 वर्ष में अर्धकुंभ लगता है, और ब्रह्मकुंड में स्नान को सबसे पुण्यदायी माना जाता है।

इतिहास

लोक परंपरा के अनुसार राजा विक्रमादित्य ने अपने भाई भर्तृहरि की स्मृति में यह घाट बनवाया था, जिन्होंने यहीं गंगा तट पर तपस्या की थी। समय-समय पर घाट का विस्तार होता रहा; 20वीं शताब्दी में बड़े पैमाने पर इसका पुनर्निर्माण हुआ और कुंभ मेलों के लिए नए घाट जोड़े गए। घाट के सामने का घंटाघर (क्लॉक टावर) अब हरिद्वार की पहचान बन चुका है।

गंगा आरती

हर की पौड़ी की संध्या गंगा आरती विश्व प्रसिद्ध है। सूर्यास्त के समय पुजारी बड़े-बड़े पीतल के दीपों से माँ गंगा की आरती करते हैं, घंटे-शंख बजते हैं और हज़ारों श्रद्धालु पत्तों के दोनों में दीप और फूल गंगा में प्रवाहित करते हैं। आरती का प्रबंधन श्री गंगा सभा करती है। अच्छी जगह के लिए आरती से लगभग 45 मिनट पहले घाट पर पहुँच जाएँ।

हर की पौड़ी पर होने वाले संस्कार

  • अस्थि विसर्जन: देशभर से लोग दिवंगत परिजनों की अस्थियाँ यहाँ गंगा में प्रवाहित करते हैं।
  • पितृ कर्म और श्राद्ध: पितृ पक्ष में तर्पण और पिंडदान।
  • मुंडन और जनेऊ संस्कार।
  • वंशावली (पंडा बहियाँ): हरिद्वार के तीर्थ पुरोहितों के पास सदियों पुरानी वंशावलियाँ रहती हैं, जिनमें परिवारों की कई पीढ़ियों का रिकॉर्ड दर्ज होता है।

सुरक्षा: ब्रह्मकुंड में गंगा का बहाव तेज़ है। स्नान करते समय घाट पर लगी ज़ंजीरों को पकड़कर रखें और बच्चों पर ध्यान दें।

दर्शन का समय

  • घाट: 24 घंटे खुला
  • प्रातः गंगा आरती: सूर्योदय के समय (लगभग 5:30–6:30 बजे, मौसम के अनुसार)
  • संध्या गंगा आरती: सूर्यास्त के समय – गर्मियों में लगभग 6:30–7:00 बजे, सर्दियों में लगभग 5:30–6:00 बजे

कुंभ, कांवड़ यात्रा और बड़े स्नान पर्वों पर घाट पर प्रवेश के विशेष नियम लागू होते हैं।

मुख्य आकर्षण

  • ब्रह्मकुंड: हर की पौड़ी का सबसे पवित्र स्नान स्थल।
  • संध्या गंगा आरती और दीपदान।
  • मनसा देवी और चंडी देवी मंदिर – पहाड़ियों पर, रोपवे से पहुँचें।
  • माया देवी मंदिर: हरिद्वार की अधिष्ठात्री देवी, जिनके नाम पर नगर मायापुरी कहलाता है।
  • दक्ष प्रजापति मंदिर (कनखल) और ऋषिकेश (लगभग 25 किमी)।

कैसे पहुँचें

  • रेल मार्ग: हरिद्वार जंक्शन घाट से लगभग 2-3 किमी; दिल्ली, मुंबई, कोलकाता से सीधी ट्रेनें।
  • सड़क मार्ग: दिल्ली से लगभग 220 किमी; देहरादून और ऋषिकेश से नियमित बसें। घाट के पास वाहनों की सीमा है, इसलिए पार्किंग से पैदल या ई-रिक्शा से जाएँ।
  • हवाई मार्ग: जॉली ग्रांट हवाई अड्डा, देहरादून (लगभग 35 किमी)।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

हर की पौड़ी पर गंगा आरती का समय क्या है?
संध्या गंगा आरती सूर्यास्त के समय होती है – गर्मियों में लगभग 6:30–7:00 बजे और सर्दियों में लगभग 5:30–6:00 बजे। सुबह सूर्योदय के समय भी आरती होती है।
हर की पौड़ी का नाम कैसे पड़ा?
हर की पौड़ी का अर्थ है हरि (भगवान विष्णु) के चरण। मान्यता है कि घाट के एक पत्थर पर भगवान विष्णु के चरण-चिह्न हैं।
ब्रह्मकुंड क्यों पवित्र माना जाता है?
मान्यता है कि समुद्र मंथन के अमृत कलश की बूँदें हरिद्वार में ब्रह्मकुंड में गिरी थीं। इसी कारण यहाँ कुंभ मेला लगता है और ब्रह्मकुंड में स्नान को अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है।
हरिद्वार में कुंभ मेला कब लगता है?
हरिद्वार में हर 12 वर्ष में कुंभ और 6 वर्ष में अर्धकुंभ लगता है, जब बृहस्पति कुंभ राशि में और सूर्य मेष राशि में होते हैं।
हरिद्वार को मायापुरी क्यों कहते हैं?
हरिद्वार की अधिष्ठात्री देवी माया देवी हैं, इसलिए सप्तपुरी के श्लोक में हरिद्वार को "माया" या मायापुरी कहा गया है।

हर की पौड़ी, हरिद्वार इन तीर्थ यात्राओं में शामिल है

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