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कार्तिक कृष्ण द्वादशी

भक्तिरस – BhaktiRas

मध्यमहेश्वर मंदिर

Madhyamaheshwar Temple

रुद्रप्रयाग, उत्तराखंड भगवान शिव (नाभि रूप) निःशुल्क प्रवेश

मध्यमहेश्वर मंदिर (मदमहेश्वर) उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग ज़िले में लगभग 3,490 मीटर की ऊँचाई पर स्थित भगवान शिव का मंदिर है। यह पंच केदार में दूसरा केदार है, जहाँ शिव की नाभि (मध्य भाग) की पूजा होती है – इसी से इसका नाम “मध्य-महेश्वर” पड़ा। हरे-भरे बुग्यालों के बीच बसे इस मंदिर के पीछे चौखंबा पर्वत की बर्फ़ीली चोटियाँ दिखाई देती हैं।

मध्यमहेश्वर की कथा

पंच केदार की कथा के अनुसार पांडवों से बचने के लिए बैल रूप में धरती में समाते समय शिव की नाभि इस स्थान पर प्रकट हुई। गर्भगृह में नाभि के आकार का शिवलिंग है, जो काले पत्थर का है। मान्यता है कि यहाँ के जल की कुछ बूँदें भी मोक्ष देने वाली हैं। मंदिर परिसर में माता पार्वती और अर्धनारीश्वर के छोटे मंदिर भी हैं।

पूजा परंपरा

केदारनाथ की तरह यहाँ भी पूजा दक्षिण भारत के वीरशैव (जंगम) पुजारी करते हैं, जिन्हें रावल परंपरा से नियुक्त किया जाता है। मंदिर की देख-रेख श्री बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति करती है। सर्दियों में भगवान मध्यमहेश्वर की उत्सव डोली उखीमठ के ओंकारेश्वर मंदिर लाई जाती है – वही स्थान जहाँ सर्दियों में केदारनाथ जी की भी पूजा होती है।

कपाट और मेला

मध्यमहेश्वर के कपाट सामान्यतः मई में खुलते हैं और नवंबर में बंद होते हैं। कपाट बंद होने के बाद जब डोली उखीमठ पहुँचती है, तब वहाँ मदमहेश्वर मेला लगता है, जिसमें आसपास के गाँवों के लोग बड़ी संख्या में शामिल होते हैं।

रांसी से मध्यमहेश्वर ट्रेक

  • मार्ग: उखीमठ से सड़क द्वारा रांसी गाँव (लगभग 20 किमी), फिर रांसी से गौंडार, बंतोली, खटारा और नानू चट्टी होते हुए लगभग 16-18 किमी का पैदल ट्रेक।
  • ट्रेक में सामान्यतः 1-2 दिन लगते हैं; गौंडार और बंतोली में होमस्टे मिलते हैं।
  • बूढ़ा मध्यमहेश्वर: मंदिर से लगभग 2 किमी ऊपर छोटा मंदिर और ताल, जहाँ से चौखंबा, केदारनाथ और नीलकंठ चोटियों का अद्भुत दृश्य दिखता है।
  • बरसात में रास्ते में फिसलन रहती है – मज़बूत जूते और रेनकोट साथ रखें।

दर्शन का समय

कपाट खुले रहने की अवधि: लगभग मई से नवंबर तक (तिथि हर वर्ष घोषित)।

  • दर्शन: सुबह लगभग 6:00 से शाम 7:00 बजे तक
  • प्रातः पूजा और संध्या आरती वीरशैव पुजारियों द्वारा

मुख्य आकर्षण

  • नाभि आकार का शिवलिंग।
  • बूढ़ा मध्यमहेश्वर – 2 किमी ऊपर, चौखंबा का दृश्य।
  • मध्यमहेश्वर बुग्याल और ट्रेक के गाँव (गौंडार, बंतोली)।
  • ओंकारेश्वर मंदिर, उखीमठ – शीतकालीन गद्दी।

कैसे पहुँचें

  • सड़क मार्ग: ऋषिकेश से रुद्रप्रयाग होते हुए उखीमठ लगभग 180 किमी; उखीमठ से रांसी लगभग 20 किमी। रांसी से मंदिर तक 16-18 किमी पैदल।
  • रेल मार्ग: निकटतम स्टेशन ऋषिकेश।
  • हवाई मार्ग: जॉली ग्रांट हवाई अड्डा, देहरादून (लगभग 220 किमी)।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

मध्यमहेश्वर में शिव के किस अंग की पूजा होती है?
पंच केदार की कथा के अनुसार मध्यमहेश्वर में शिव की नाभि (मध्य भाग) की पूजा होती है। गर्भगृह में नाभि के आकार का शिवलिंग है।
मध्यमहेश्वर ट्रेक कितने किलोमीटर का है?
रांसी गाँव से मध्यमहेश्वर मंदिर तक लगभग 16-18 किमी का पैदल ट्रेक है, जिसमें सामान्यतः 1-2 दिन लगते हैं।
सर्दियों में मध्यमहेश्वर जी की पूजा कहाँ होती है?
कपाट बंद होने के बाद उत्सव डोली उखीमठ के ओंकारेश्वर मंदिर में लाई जाती है, जहाँ केदारनाथ जी की भी शीतकालीन पूजा होती है।
बूढ़ा मध्यमहेश्वर क्या है?
मुख्य मंदिर से लगभग 2 किमी ऊपर एक छोटा मंदिर और ताल है, जिसे बूढ़ा मध्यमहेश्वर कहते हैं। यहाँ से चौखंबा और केदारनाथ चोटियों का शानदार दृश्य दिखता है।
मध्यमहेश्वर को मदमहेश्वर क्यों कहते हैं?
स्थानीय गढ़वाली बोली में मध्यमहेश्वर को मदमहेश्वर कहा जाता है – दोनों नाम एक ही मंदिर के हैं।

मध्यमहेश्वर मंदिर इन तीर्थ यात्राओं में शामिल है

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