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कार्तिक कृष्ण द्वादशी

भक्तिरस – BhaktiRas

गंगोत्री धाम

Gangotri Dham

उत्तरकाशी, उत्तराखंड माँ गंगा (भागीरथी) निःशुल्क प्रवेश

गंगोत्री धाम उत्तराखंड के उत्तरकाशी ज़िले में भागीरथी नदी के तट पर लगभग 3,100 मीटर की ऊँचाई पर स्थित माँ गंगा का मंदिर है। यह छोटा चार धाम यात्रा का दूसरा पड़ाव है। यहीं राजा भगीरथ ने तपस्या करके गंगा को पृथ्वी पर उतारा था, इसलिए यहाँ गंगा को भागीरथी कहा जाता है। गंगा का वास्तविक उद्गम मंदिर से लगभग 19 किमी ऊपर गौमुख हिमनद (गंगोत्री ग्लेशियर) है।

गंगा अवतरण की कथा

अयोध्या के राजा सगर के साठ हज़ार पुत्र कपिल मुनि के क्रोध से भस्म हो गए थे। उनकी मुक्ति के लिए सगर के वंशज राजा भगीरथ ने गंगोत्री में एक शिला पर बैठकर हज़ारों वर्ष तपस्या की। प्रसन्न होकर गंगा पृथ्वी पर आने को तैयार हुईं, पर उनके वेग को सँभालने के लिए भगवान शिव ने उन्हें अपनी जटाओं में धारण किया। मंदिर के पास वह भगीरथ शिला आज भी पूजी जाती है, जिस पर बैठकर भगीरथ ने तप किया था।

मंदिर का इतिहास

गंगोत्री का वर्तमान मंदिर 18वीं शताब्दी के अंत / 19वीं शताब्दी की शुरुआत में गोरखा सेनापति अमर सिंह थापा ने बनवाया था। सफ़ेद ग्रेनाइट से बने इस लगभग 20 फ़ीट ऊँचे मंदिर का बाद में जयपुर राजघराने ने जीर्णोद्धार कराया। गर्भगृह में माँ गंगा की मूर्ति के साथ यमुना, सरस्वती, लक्ष्मी, अन्नपूर्णा, भगीरथ और आदि शंकराचार्य की मूर्तियाँ हैं। मंदिर की पूजा परंपरागत रूप से पास के मुखबा गाँव के सेमवाल पुजारी करते हैं।

कपाट खुलने-बंद होने का समय

गंगोत्री के कपाट हर वर्ष अक्षय तृतीया पर खुलते हैं और दीपावली के अगले दिन अन्नकूट (गोवर्धन पूजा) पर बंद होते हैं। सर्दियों में माँ गंगा की उत्सव डोली लगभग 25 किमी नीचे मुखबा गाँव ले जाई जाती है, जहाँ छह महीने उनकी पूजा होती है। गंगा दशहरा (ज्येष्ठ शुक्ल दशमी) पर यहाँ विशेष उत्सव होता है।

गौमुख ट्रेक

गंगा के उद्गम गौमुख तक गंगोत्री से लगभग 18-19 किमी का पैदल ट्रेक है, जो चीड़बासा और भोजबासा होकर जाता है। यह क्षेत्र गंगोत्री राष्ट्रीय उद्यान में आता है, इसलिए ट्रेक के लिए वन विभाग का परमिट ज़रूरी है और प्रतिदिन सीमित संख्या में ही यात्रियों को अनुमति मिलती है। गौमुख से आगे तपोवन (शिवलिंग पर्वत के नीचे) तक भी अनुभवी ट्रेकर जाते हैं।

यात्रा की तैयारी

  • गंगोत्री मंदिर तक सड़क जाती है – पार्किंग से मंदिर कुछ ही मिनट की पैदल दूरी पर है।
  • चार धाम यात्रा के लिए उत्तराखंड सरकार का ऑनलाइन पंजीकरण अनिवार्य है।
  • उत्तरकाशी से गंगोत्री का रास्ता संकरा और पहाड़ी है; मानसून में भूस्खलन की जानकारी लेकर ही निकलें।
  • ऊँचाई पर साँस फूलना सामान्य है – एक रात उत्तरकाशी या हर्षिल में रुककर आगे बढ़ना बेहतर है।

दर्शन का समय

कपाट खुले रहने की अवधि: अक्षय तृतीया (अप्रैल-मई) से दीपावली के बाद अन्नकूट (अक्टूबर-नवंबर) तक।

  • सुबह के दर्शन: लगभग 6:15 से दोपहर 2:00 बजे तक
  • दोपहर विश्राम: लगभग 2:00 से 3:00 बजे तक
  • शाम के दर्शन: 3:00 से रात लगभग 9:30 बजे तक
  • संध्या गंगा आरती: शाम लगभग 7:00–7:45 बजे

मुख्य आकर्षण

  • भगीरथ शिला: मंदिर के पास वह शिला जहाँ राजा भगीरथ ने तपस्या की।
  • गौमुख: गंगा का उद्गम, लगभग 19 किमी ट्रेक (परमिट आवश्यक)।
  • जलमग्न शिवलिंग: सर्दियों में जब भागीरथी का पानी कम होता है, तब नदी में दिखने वाला प्राकृतिक शिवलिंग।
  • सूर्य कुंड व गौरी कुंड: मंदिर के पास भागीरथी के झरने।
  • हर्षिल घाटी और मुखबा गाँव – रास्ते में सुंदर पड़ाव।

कैसे पहुँचें

  • सड़क मार्ग: ऋषिकेश से उत्तरकाशी होते हुए लगभग 250 किमी; उत्तरकाशी से गंगोत्री लगभग 100 किमी। मंदिर तक सड़क जाती है।
  • रेल मार्ग: निकटतम स्टेशन ऋषिकेश और देहरादून।
  • हवाई मार्ग: जॉली ग्रांट हवाई अड्डा, देहरादून (लगभग 250 किमी)। यात्रा सीज़न में हर्षिल तक हेलिकॉप्टर सेवा।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

गंगोत्री के कपाट कब खुलते और बंद होते हैं?
गंगोत्री के कपाट अक्षय तृतीया पर खुलते हैं और दीपावली के अगले दिन अन्नकूट (गोवर्धन पूजा) पर बंद होते हैं। सर्दियों में माँ गंगा की पूजा मुखबा गाँव में होती है।
गंगा का उद्गम कहाँ है?
गंगा (भागीरथी) का उद्गम गंगोत्री मंदिर से लगभग 18-19 किमी ऊपर गौमुख है, जो गंगोत्री ग्लेशियर का मुहाना है। वहाँ जाने के लिए वन विभाग का परमिट ज़रूरी है।
क्या गंगोत्री मंदिर तक गाड़ी जाती है?
हाँ, गंगोत्री मंदिर तक पक्की सड़क है। पार्किंग से मंदिर कुछ ही मिनट की पैदल दूरी पर है, इसलिए यमुनोत्री और केदारनाथ की तुलना में यहाँ पहुँचना आसान है।
यहाँ गंगा को भागीरथी क्यों कहते हैं?
राजा भगीरथ की तपस्या से गंगा पृथ्वी पर आईं, इसलिए गंगोत्री से देवप्रयाग तक गंगा को भागीरथी कहा जाता है। देवप्रयाग में अलकनंदा से मिलने के बाद यह गंगा कहलाती है।
गंगोत्री यात्रा का सबसे अच्छा समय कौन सा है?
मई-जून और सितंबर-अक्टूबर सबसे अच्छे महीने हैं। जुलाई-अगस्त में मानसून के कारण उत्तरकाशी-गंगोत्री मार्ग पर भूस्खलन की संभावना रहती है।

गंगोत्री धाम इन तीर्थ यात्राओं में शामिल है

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