यमुनोत्री धाम उत्तराखंड के उत्तरकाशी ज़िले में लगभग 3,293 मीटर की ऊँचाई पर स्थित माँ यमुना का मंदिर है। यह छोटा चार धाम यात्रा का पहला पड़ाव है – परंपरा के अनुसार यात्रा यमुनोत्री से शुरू होकर गंगोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ पर पूरी होती है। यमुना नदी का उद्गम मंदिर से ऊपर कालिंद पर्वत के चंपासर ग्लेशियर से होता है, इसलिए यमुना को “कालिंदी” भी कहा जाता है।
माँ यमुना की कथा
पुराणों के अनुसार यमुना सूर्यदेव और संज्ञा की पुत्री तथा मृत्यु के देवता यमराज की बहन हैं। भाई दूज (यम द्वितीया) की कथा भी यमुना और यमराज से जुड़ी है – यमुना के आग्रह पर यमराज उनके घर भोजन करने आए और वर दिया कि इस दिन जो भाई बहन के घर भोजन करेगा और यमुना में स्नान करेगा, उसे अकाल मृत्यु का भय नहीं होगा। इसीलिए यमुनोत्री के कपाट भी भाई दूज पर ही बंद होते हैं। मान्यता है कि ऋषि असित मुनि का आश्रम यहीं था, जो रोज़ गंगा और यमुना दोनों में स्नान करते थे।
मंदिर का इतिहास
यमुनोत्री का मंदिर 19वीं शताब्दी में टिहरी गढ़वाल के महाराजा प्रतापशाह ने बनवाया था। भूकंप और बाढ़ से कई बार क्षतिग्रस्त होने के बाद इसका जीर्णोद्धार हुआ; जयपुर की महारानी गुलेरिया द्वारा पुनर्निर्माण का उल्लेख भी मिलता है। गर्भगृह में काले संगमरमर की यमुना माता की मूर्ति है, साथ में माँ गंगा की श्वेत मूर्ति भी विराजमान है।
सूर्य कुंड और दिव्य शिला
मंदिर के पास गर्म पानी के कई प्राकृतिक कुंड हैं। इनमें सबसे गर्म सूर्य कुंड है, जिसका पानी इतना गर्म होता है कि श्रद्धालु कपड़े की पोटली में चावल और आलू बाँधकर इसमें डालते हैं और कुछ ही मिनटों में वह पक जाता है। इसी पके चावल को माँ यमुना का प्रसाद मानकर घर ले जाया जाता है। मंदिर में प्रवेश से पहले दिव्य शिला नामक चट्टान की पूजा की जाती है। ठंडे पानी में स्नान के लिए जमुनाबाई कुंड है, जिसका पानी गुनगुना रहता है।
कपाट खुलने-बंद होने का समय और शीतकालीन प्रवास
यमुनोत्री के कपाट हर वर्ष अक्षय तृतीया (अप्रैल-मई) पर खुलते हैं और भाई दूज (अक्टूबर-नवंबर) पर बंद होते हैं। सर्दियों में माँ यमुना की उत्सव डोली नीचे खरसाली गाँव (खुशीमठ) ले जाई जाती है, जहाँ छह महीने उनकी पूजा होती है। खरसाली जानकीचट्टी से लगभग 1 किमी दूर है।
यात्रा की तैयारी
- सड़क जानकीचट्टी तक जाती है; वहाँ से मंदिर तक लगभग 5-6 किमी की खड़ी पैदल चढ़ाई है। घोड़ा, खच्चर, पालकी (डंडी-कंडी) भी मिलते हैं।
- चार धाम यात्रा के लिए उत्तराखंड सरकार का ऑनलाइन पंजीकरण अनिवार्य है।
- चढ़ाई की शुरुआत सुबह जल्दी करें ताकि शाम से पहले जानकीचट्टी लौट सकें।
दर्शन का समय
कपाट खुले रहने की अवधि: अक्षय तृतीया (अप्रैल-मई) से भाई दूज (अक्टूबर-नवंबर) तक।
- मंदिर खुलने का समय: सुबह लगभग 6:00 बजे
- दर्शन: सुबह 6:00 से रात लगभग 8:00 बजे तक
- मंगला आरती: सुबह लगभग 6:30 बजे; संध्या आरती: शाम लगभग 6:30–7:00 बजे
मौसम ख़राब होने पर ट्रेक मार्ग अस्थायी रूप से बंद किया जा सकता है।
मुख्य आकर्षण
- सूर्य कुंड: खौलते पानी का कुंड जिसमें चावल-आलू पकाकर प्रसाद बनाया जाता है।
- दिव्य शिला: मंदिर से पहले पूजी जाने वाली पवित्र चट्टान।
- जमुनाबाई कुंड: स्नान के लिए गुनगुने पानी का कुंड।
- खरसाली गाँव: माँ यमुना का शीतकालीन निवास और प्राचीन शनि मंदिर।
- हनुमान चट्टी और बड़कोट – रास्ते के प्रमुख पड़ाव।
कैसे पहुँचें
- सड़क मार्ग: ऋषिकेश/देहरादून से बड़कोट होते हुए जानकीचट्टी (देहरादून से लगभग 175 किमी, ऋषिकेश से लगभग 210 किमी)। जानकीचट्टी से मंदिर तक 5-6 किमी पैदल।
- रेल मार्ग: निकटतम स्टेशन ऋषिकेश और देहरादून।
- हवाई मार्ग: जॉली ग्रांट हवाई अड्डा, देहरादून। यात्रा सीज़न में देहरादून से खरसाली तक हेलिकॉप्टर सेवा भी चलती है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
यमुनोत्री मंदिर तक कितना पैदल चलना पड़ता है?
यमुनोत्री के कपाट कब खुलते और बंद होते हैं?
सूर्य कुंड में चावल क्यों पकाए जाते हैं?
छोटा चार धाम यात्रा यमुनोत्री से क्यों शुरू होती है?
यमुना को यमराज की बहन क्यों कहते हैं?
यमुनोत्री धाम इन तीर्थ यात्राओं में शामिल है
अन्य प्रसिद्ध मंदिर
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चमोली, उत्तराखंड श्री बद्रीनाथ धाम भगवान विष्णु (श्री बद्रीनारायण)
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उत्तरकाशी, उत्तराखंड गंगोत्री धाम माँ गंगा (भागीरथी)
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हरिद्वार, उत्तराखंड हर की पौड़ी, हरिद्वार माँ गंगा; भगवान विष्णु के चरण-चिह्न
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चमोली, उत्तराखंड कल्पेश्वर मंदिर भगवान शिव (जटा रूप – जटाधर)
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रुद्रप्रयाग, उत्तराखंड मध्यमहेश्वर मंदिर भगवान शिव (नाभि रूप)
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चमोली, उत्तराखंड रुद्रनाथ मंदिर भगवान शिव (मुख रूप – नीलकंठ महादेव)