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कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी

भक्तिरस – BhaktiRas

माँ मुंडेश्वरी मंदिर, कैमूर

Maa Mundeshwari Temple, Kaimur

कैमूर, बिहार माँ मुंडेश्वरी (महिषासुरमर्दिनी रूप) और भगवान शिव (चतुर्मुख शिवलिंग) निःशुल्क प्रवेश

माँ मुंडेश्वरी मंदिर बिहार के कैमूर जिले में रामगढ़ गाँव के पास पवरा (मुंडेश्वरी) पहाड़ी पर स्थित एक अत्यंत प्राचीन पत्थर का मंदिर है। यहाँ माँ मुंडेश्वरी के साथ भगवान शिव की पूजा होती है। इसे भारत के उन सबसे पुराने मंदिरों में गिना जाता है, जहाँ आज तक निरंतर पूजा होती आ रही है। यह स्मारक 1915 से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित है। यहाँ की रक्तहीन बलि की परंपरा इसे और विशेष बनाती है।

इतिहास और तिथि

मंदिर की तिथि को लेकर अलग-अलग मत हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की पट्टिका पर 635 ई. लिखा है, जबकि बिहार राज्य धार्मिक न्यास पर्षद और कुछ विद्वान इसे 108 ई. का मानते हैं। इतिहासकार यहाँ के स्थापत्य और मूर्तियों को सामान्यतः 6ठी–7वीं शताब्दी का मानते हैं। यहाँ मिले एक शिलालेख में स्थानीय शासक महाराज उदयसेन का उल्लेख है। ब्रिटिश काल में फ्रांसिस बुकानन जैसे यात्रियों ने भी इस स्थल का वर्णन किया था।

मंदिर और विग्रह

यह मंदिर दुर्लभ अष्टकोणीय योजना पर बना है और बिहार में नागर शैली के सबसे प्रारंभिक उदाहरणों में गिना जाता है। इसका मूल शिखर नष्ट हो चुका है, बाद में ऊपर छत डाली गई। गर्भगृह के मध्य में चतुर्मुख शिवलिंग है (स्थानीय स्रोत इसे पंचमुखी भी कहते हैं), और एक आले में दस भुजाओं वाली, महिष पर आरूढ़ माँ मुंडेश्वरी विराजती हैं, जिन्हें महिषासुरमर्दिनी का रूप माना जाता है। परिसर में गणेश, सूर्य और विष्णु की प्राचीन प्रतिमाएँ भी हैं।

रक्तहीन बलि की परंपरा

मुंडेश्वरी मंदिर में बलि तो दी जाती है, पर पशु का वध नहीं होता। मन्नत पूरी होने पर भक्त बकरा लेकर आते हैं। पुजारी मंत्र पढ़कर उस पर अक्षत और फूल डालते हैं; बकरा कुछ क्षण के लिए अचेत-सा हो जाता है और दोबारा अक्षत डालने पर उठ खड़ा होता है। इसके बाद उसे छोड़ दिया जाता है। भक्त इसे देवी की कृपा मानते हैं।

प्रमुख उत्सव

  • चैत्र और शारदीय नवरात्रि: सबसे बड़ा मेला, हज़ारों श्रद्धालु।
  • रामनवमी और महाशिवरात्रि पर विशेष पूजा।

यात्रा क्रम

निकटतम रेलवे स्टेशन मोहनिया–भभुआ रोड है, जहाँ से सड़क द्वारा पहाड़ी तक पहुँचा जाता है। वाराणसी यहाँ से सबसे निकट बड़ा शहर है, इसलिए कई यात्री काशी यात्रा के साथ मुंडेश्वरी दर्शन जोड़ते हैं। रोहतास जिले के सासाराम में माँ ताराचंडी मंदिर भी इसी क्षेत्र की यात्रा में शामिल किया जा सकता है।

दर्शन का समय

  • दर्शन: सुबह लगभग 6:00 से शाम लगभग 7:00 बजे तक

पहाड़ी पर स्थित होने के कारण दिन के समय जाना सुविधाजनक है; नवरात्रि में भीड़ अधिक रहती है।

मुख्य आकर्षण

  • माँ मुंडेश्वरी – दस भुजाओं वाली, महिष पर आरूढ़ देवी।
  • चतुर्मुख शिवलिंग – गर्भगृह के मध्य में।
  • अष्टकोणीय पत्थर का मंदिर – बिहार में नागर शैली का प्रारंभिक उदाहरण।
  • गणेश, सूर्य और विष्णु की प्राचीन प्रतिमाएँ।
  • प्राचीन शिलालेख और बिखरे हुए स्थापत्य अवशेष।

कैसे पहुँचें

  • रेल मार्ग: मोहनिया–भभुआ रोड स्टेशन (सड़क से लगभग 22 किमी)।
  • सड़क मार्ग: भभुआ से पहाड़ी तक सड़क; पटना, गया या वाराणसी से सड़क मार्ग।
  • हवाई मार्ग: लाल बहादुर शास्त्री हवाई अड्डा, वाराणसी (लगभग 100 किमी)।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

मुंडेश्वरी मंदिर कितना पुराना है?
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की पट्टिका पर 635 ई. की तिथि है, जबकि बिहार राज्य धार्मिक न्यास पर्षद 108 ई. का दावा करता है। इतिहासकार यहाँ के स्थापत्य और मूर्तियों को 6ठी–7वीं शताब्दी का मानते हैं। इसे भारत के सबसे पुराने जीवित (जहाँ आज भी पूजा होती है) मंदिरों में गिना जाता है।
मुंडेश्वरी मंदिर की रक्तहीन बलि क्या है?
मन्नत पूरी होने पर भक्त बकरा लेकर आते हैं। पुजारी मंत्र पढ़कर उस पर अक्षत और फूल डालते हैं, बकरा कुछ क्षण के लिए अचेत-सा हो जाता है और फिर अक्षत डालने पर उठ खड़ा होता है। उसे मारा नहीं जाता, बल्कि छोड़ दिया जाता है।
मुंडेश्वरी मंदिर में किन देवताओं की पूजा होती है?
मुख्य देवी माँ मुंडेश्वरी हैं, जो दस भुजाओं के साथ महिष पर आरूढ़ महिषासुरमर्दिनी रूप में हैं। गर्भगृह के मध्य में चतुर्मुख शिवलिंग है, और गणेश, सूर्य तथा विष्णु की प्रतिमाएँ भी हैं।
मुंडेश्वरी मंदिर कहाँ है?
यह बिहार के कैमूर जिले में भगवानपुर प्रखंड के रामगढ़ गाँव के पास पवरा पहाड़ी पर, लगभग 600 फीट की ऊँचाई पर स्थित है।
मुंडेश्वरी मंदिर में मेला कब लगता है?
चैत्र और शारदीय नवरात्रि, रामनवमी और महाशिवरात्रि पर यहाँ बड़ा मेला लगता है और हज़ारों श्रद्धालु दर्शन करने आते हैं।

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