श्री तुलजा भवानी मंदिर महाराष्ट्र के धाराशिव (पूर्व नाम उस्मानाबाद) जिले के तुलजापुर नगर में बालाघाट पर्वतमाला की यमुनाचल पहाड़ी पर स्थित है। यहाँ माँ दुर्गा के रूप तुलजा भवानी विराजती हैं, जिन्हें अंबाबाई और अंबा भवानी भी कहा जाता है। वे महाराष्ट्र की कुलस्वामिनी और छत्रपति शिवाजी महाराज की कुलदेवी मानी जाती हैं। मंदिर को 51 शक्तिपीठों में गिना जाता है और यह सोलापुर से लगभग 45 किमी उत्तर-पूर्व में है।
इतिहास
महाराष्ट्र पर्यटन विभाग और अन्य स्रोतों के अनुसार यह मंदिर 12वीं शताब्दी में कदंब वंश के महामंडलेश्वर मारदेव के समय बना। मंदिर हेमाडपंती शैली में है। मंदिर परंपरा के अनुसार शिवाजी महाराज अपने अभियानों से पहले यहाँ आशीर्वाद लेने आते थे, और लोक-विश्वास है कि देवी ने उन्हें वह तलवार दी जो भवानी तलवार के नाम से प्रसिद्ध है। मंदिर के दो प्रवेशद्वार शिवाजी महाराज के माता-पिता शहाजी और जिजाबाई के नाम पर हैं।
मंदिर और विग्रह
गर्भगृह में लगभग तीन फुट ऊँची ग्रेनाइट की अष्टभुजा प्रतिमा है, जिसमें देवी महिषासुर का शीश धारण किए हैं। देवी को स्वयंभू माना जाता है। तुलजा भवानी की विशेषता यह है कि यहाँ की मूल प्रतिमा चल मूर्ति है – अलग उत्सव मूर्ति नहीं है, इसलिए वर्ष में कुछ अवसरों पर स्वयं मूल प्रतिमा को उसके स्थान से उठाकर प्रदक्षिणा और विश्राम कराया जाता है। प्रतिदिन देवी का अभिषेक, वस्त्र-अलंकार और नैवेद्य होता है।
मंचकी निद्रा और नवरात्रि
शारदीय नवरात्रि से पहले देवी को चाँदी के पलंग पर मंचकी निद्रा (विश्राम) के लिए लिटाया जाता है। यह निद्रा घटस्थापना के दिन समाप्त होती है और देवी फिर सिंहासन पर विराजती हैं। निद्रा के दिनों में भी दर्शन होते हैं, पर अन्य अनुष्ठान नहीं होते।
- शारदीय नवरात्रि: सबसे बड़ा उत्सव – कल्लोळ तीर्थ से जलकलश यात्रा, गोंधल और भारी भीड़।
- दशहरा पर भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं।
- दीपावली, होली और गणेश चतुर्थी भी मनाए जाते हैं।
यात्रा क्रम
तुलजापुर प्रायः पंढरपुर के विठ्ठल मंदिर और अक्कलकोट के स्वामी समर्थ मठ की यात्रा के साथ जोड़ा जाता है। मंदिर का प्रबंधन जिलाधिकारी की अध्यक्षता वाला मंदिर संस्थान करता है, और तीर्थ क्षेत्र के विस्तार के लिए बड़ी विकास योजना पर काम चल रहा है।
दर्शन का समय
- दर्शन: भोर से रात तक, लगभग सुबह 5:00 से रात 9:30 बजे तक
- पूजा: दिन में अभिषेक, वस्त्र-अलंकार और नैवेद्य की नियमित पूजा
नवरात्रि और मंचकी निद्रा के दिनों में पूजा-क्रम बदलता है; यात्रा से पहले मंदिर संस्थान से समय की पुष्टि कर लें।
मुख्य आकर्षण
- माँ तुलजा भवानी – अष्टभुजा, महिषासुर का शीश लिए ग्रेनाइट की स्वयंभू मानी जाने वाली प्रतिमा।
- शहाजी और जिजाऊ महाद्वार – शिवाजी महाराज के माता-पिता के नाम पर प्रवेशद्वार।
- कल्लोळ तीर्थ – मंदिर परिसर का पवित्र कुंड।
- शारदीय नवरात्रि और दशहरे का उत्सव।
- पंढरपुर और अक्कलकोट की यात्रा से जोड़ा जा सकता है।
कैसे पहुँचें
- रेल मार्ग: सोलापुर जंक्शन (लगभग 45 किमी) या धाराशिव (उस्मानाबाद) स्टेशन (लगभग 25 किमी)।
- सड़क मार्ग: सोलापुर से लगभग 45 किमी, धाराशिव से लगभग 22 किमी; एसटी बसें और टैक्सी उपलब्ध।
- हवाई मार्ग: पुणे (लगभग 280 किमी) या हैदराबाद (लगभग 300 किमी) के बड़े हवाई अड्डे।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
तुलजा भवानी किसकी कुलदेवी हैं?
भवानी तलवार की कथा क्या है?
मंचकी निद्रा क्या है?
क्या तुलजा भवानी शक्तिपीठ है?
सोलापुर से तुलजापुर कितनी दूर है?
अन्य प्रसिद्ध मंदिर
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Solapur, महाराष्ट्र श्री स्वामी समर्थ महाराज वटवृक्ष मंदिर, अक्कलकोट श्री स्वामी समर्थ महाराज (दत्तात्रेय परंपरा के संत, दत्त अवतार माने जाते हैं)
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रायगढ़, महाराष्ट्र एलिफेंटा गुफाएँ (घारापुरी) – शिव गुफा मंदिर, मुंबई के पास भगवान शिव – गर्भगृह में शिवलिंग; सदाशिव (त्रिमूर्ति) स्वरूप
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Beed, महाराष्ट्र खंडोबा मंदिर, बीड श्री खंडोबा (मल्हारी मार्तंड, शिव स्वरूप) और म्हालसा
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Jalgaon, महाराष्ट्र पद्मालय गणेश मंदिर, जलगाँव श्री गणेश – दो स्वयंभू प्रतिमाएँ, आमोद और प्रमोद
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पुणे, महाराष्ट्र तुलशीबाग राम मंदिर, पुणे श्रीराम, सीता और लक्ष्मण; परिसर में हनुमान, गणेश, विट्ठल-रुक्मिणी, दत्तात्रेय, शिव
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Ambarnath, महाराष्ट्र अंबरेश्वर शिव मंदिर, अंबरनाथ भगवान शिव (अंबरेश्वर)