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कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी

भक्तिरस – BhaktiRas

तनोट माता मंदिर, जैसलमेर

Tanot Mata Temple, Jaisalmer

जैसलमेर, राजस्थान माँ आवड़ (तनोट माता / तनोट राय), हिंगलाज माता का अवतार मानी जाती हैं निःशुल्क प्रवेश

तनोट माता मंदिर राजस्थान के जैसलमेर ज़िले में, जैसलमेर शहर से लगभग 120 किमी दूर थार मरुस्थल में भारत-पाकिस्तान सीमा के पास स्थित है। यहाँ देवी आवड़ की तनोट माता या तनोट राय के रूप में पूजा होती है। 1965 और 1971 के युद्धों से जुड़ी आस्था के कारण यह मंदिर सीमा पर तैनात जवानों और देश भर के श्रद्धालुओं के लिए विशेष है, और इसकी देखरेख सीमा सुरक्षा बल (BSF) करता है।

माँ आवड़ की कथा

चारण परंपरा के अनुसार तनोट माता चारण मामड़जी की पुत्री देवी आवड़ हैं। कहा जाता है कि संतानहीन मामड़जी ने हिंगलाज माता की कई बार यात्रा की, जिसके बाद उनके घर सात पुत्रियों और एक पुत्र का जन्म हुआ – आवड़ उन्हीं में से थीं। चारण साहित्य में आवड़ को हिंगलाज माता का अवतार और युद्ध की देवी माना गया है, और यह भी मान्यता है कि वे ही आगे चलकर करणी माता के रूप में प्रकट हुईं।

मंदिर का इतिहास

परंपरा के अनुसार भाटी राजपूत राजा तनु राव ने 9वीं शताब्दी में यह मंदिर बनवाकर देवी की प्रतिमा स्थापित की। तभी से भाटी राजपूत और जैसलमेर के लोग माँ तनोट की पूजा करते आए हैं।

1965 और 1971 के युद्ध

1965 के युद्ध में पाकिस्तानी सेना ने इस क्षेत्र पर हज़ारों गोले दागे, पर मंदिर के आसपास गिरे अधिकांश गोले या तो निशाने से चूक गए या फटे नहीं। श्रद्धालु इसे माँ का चमत्कार मानते हैं। इसके बाद BSF ने मंदिर का प्रबंधन संभाला, और आज भी पूजा-आरती BSF के जवान करते हैं। 1971 में लोंगेवाला की लड़ाई में भारत की जीत की स्मृति में मंदिर परिसर में विजय स्तंभ बनाया गया, और स्थानीय लोककथाएँ इस जीत को भी माँ तनोट की कृपा से जोड़ती हैं। यह प्रसंग 1997 की फ़िल्म बॉर्डर में भी दिखाया गया था।

दर्शन और आसपास

  • युद्ध संग्रहालय – मंदिर पर गिरे पर न फटे गोले यहाँ रखे हैं।
  • विजय दिवस (16 दिसंबर) – 1971 की जीत की याद में विशेष आयोजन।
  • नवरात्रि में श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ जाती है।
  • लोंगेवाला युद्ध स्मारक – जैसलमेर ज़िले में, सीमा पर्यटन का प्रमुख स्थल।

दर्शन का समय

  • दर्शन: दिन में सुबह से शाम तक
  • आरती: सुबह और संध्या आरती, जिसे BSF के जवान करते हैं

मंदिर सीमा क्षेत्र में है; BSF के नियमों का पालन करें और अंधेरा होने से पहले जैसलमेर लौटने की योजना बनाएँ।

मुख्य आकर्षण

  • माँ तनोट राय – मुख्य प्रतिमा।
  • युद्ध संग्रहालय – मंदिर पर गिरे पर न फटे पाकिस्तानी गोले।
  • विजय स्तंभ – 1971 के लोंगेवाला युद्ध की स्मृति में।
  • थार मरुस्थल के रेत के टीले।

कैसे पहुँचें

  • सड़क मार्ग: जैसलमेर शहर से लगभग 120 किमी (लगभग 2-2.5 घंटे); टैक्सी या निजी वाहन सबसे सुविधाजनक।
  • रेल मार्ग: जैसलमेर रेलवे स्टेशन – जोधपुर, जयपुर और दिल्ली से ट्रेनें।
  • हवाई मार्ग: जैसलमेर हवाई अड्डा (मौसमी उड़ानें); बड़ा हवाई अड्डा जोधपुर।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

तनोट माता कौन हैं?
तनोट माता चारण मामड़जी की पुत्री देवी आवड़ हैं, जिन्हें चारण साहित्य में हिंगलाज माता का अवतार और युद्ध की देवी माना गया है। चारण परंपरा के अनुसार हिंगलाज माता ने तनोट माता के रूप में और फिर करणी माता के रूप में अवतार लिया।
तनोट माता मंदिर जैसलमेर से कितनी दूर है?
तनोट माता मंदिर जैसलमेर शहर से लगभग 120 किमी दूर, भारत-पाकिस्तान सीमा के पास है। सड़क से लगभग दो से ढाई घंटे लगते हैं।
1965 के युद्ध में तनोट मंदिर के साथ क्या हुआ?
1965 के भारत-पाक युद्ध में पाकिस्तानी सेना ने इस क्षेत्र पर हज़ारों गोले दागे, पर मंदिर के आसपास गिरे अधिकांश गोले या तो निशाने से चूक गए या फटे नहीं। श्रद्धालु इसे माँ तनोट का चमत्कार मानते हैं। न फटे कुछ गोले आज भी मंदिर के संग्रहालय में रखे हैं।
तनोट माता मंदिर का प्रबंधन कौन करता है?
युद्ध के बाद से मंदिर का प्रबंधन और देखरेख सीमा सुरक्षा बल (BSF) करता है। पूजा-आरती भी BSF के जवान ही करते हैं।
तनोट मंदिर में विजय स्तंभ किसकी याद में है?
मंदिर परिसर का विजय स्तंभ 1971 के युद्ध में लोंगेवाला की लड़ाई में भारत की जीत की स्मृति में बनाया गया। हर वर्ष 16 दिसंबर को विजय दिवस पर यहाँ विशेष आयोजन होता है।

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