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कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी

भक्तिरस – BhaktiRas

कैला देवी मंदिर, करौली

Kaila Devi Temple, Karauli

करौली, राजस्थान माँ कैला देवी (महालक्ष्मी / योगमाया स्वरूप) और चामुंडा देवी निःशुल्क प्रवेश

कैला देवी मंदिर राजस्थान के करौली ज़िले में, करौली शहर से लगभग 23 किमी दूर अरावली की त्रिकूट पहाड़ियों के बीच कालीसिल नदी के किनारे स्थित है। यहाँ माँ कैला देवी को महालक्ष्मी और योगमाया का स्वरूप मानकर पूजा जाता है। कैला देवी करौली के चंद्रवंशी जादौन राजवंश की कुलदेवी हैं, और चैत्र मास में लगने वाला इनका लक्खी मेला उत्तर भारत के सबसे बड़े देवी मेलों में गिना जाता है।

देवी के आगमन की कथा

लोक मान्यता के अनुसार एक योगी देवी की प्रतिमा को बैलगाड़ी में लेकर नगरकोट की ओर से आ रहे थे। इस वन-पहाड़ी पर पहुँचकर बैल आगे नहीं बढ़े, तो प्रतिमा यहीं स्थापित कर दी गई। इस कथा से संत केदारगिरि का नाम भी जुड़ा है। एक अन्य परंपरा कैला देवी को वही योगमाया मानती है, जिन्होंने कंस के कारागार में जन्म लिया था। कुछ स्थानीय कथाएँ देवी के यहाँ प्रकट होकर एक असुर के संहार की बात भी कहती हैं।

मंदिर और विग्रह

गर्भगृह में दो प्रतिमाएँ विराजती हैं – बड़ी प्रतिमा माँ कैला देवी की, जिनका मुख थोड़ा झुका हुआ है, और दूसरी चामुंडा देवी की। मंदिर का निर्माण 18वीं शताब्दी में करौली के महाराजा गोपाल सिंह के समय से जोड़ा जाता है; माना जाता है कि चामुंडा देवी की प्रतिमा भी वे ही गागरोन किले से लाए थे। बाद के महाराजाओं ने कुंड, सड़कें और संगमरमर का काम करवाया। प्रांगण में एक छोटा भैरव मंदिर है, और देवी के ठीक सामने हनुमान जी का मंदिर है, जिन्हें यहाँ लांगुरिया कहा जाता है।

लक्खी मेला और लांगुरिया गीत

हर वर्ष चैत्र मास (मार्च-अप्रैल) में चैत्र नवरात्रि के आसपास लगभग पखवाड़े भर का मेला लगता है। लाखों श्रद्धालु आने के कारण इसे लक्खी मेला कहा जाता है। राजस्थान के साथ उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा और दिल्ली से भी पदयात्री आते हैं। श्रद्धालु कालीसिल नदी में स्नान करके दर्शन को जाते हैं और रास्ते भर लांगुरिया के लोकगीत गाते और नाचते चलते हैं। यह परंपरा इस मेले की सबसे बड़ी पहचान है।

आसपास के दर्शन

  • मदन मोहन जी मंदिर, करौली – करौली शहर में।
  • श्री महावीरजी – प्रसिद्ध जैन तीर्थ।
  • मेहंदीपुर बालाजी – पड़ोसी दौसा ज़िले में।

दर्शन का समय

  • दर्शन: सुबह लगभग 5:00 से रात लगभग 9:00 बजे तक (बीच में भोग के समय कुछ देर पट बंद रहते हैं)
  • आरती: सुबह मंगला आरती और संध्या आरती

चैत्र नवरात्रि के लक्खी मेले में भारी भीड़ के कारण समय और व्यवस्था बदल जाती है।

मुख्य आकर्षण

  • माँ कैला देवी – थोड़ा झुका हुआ मुख, साथ में चामुंडा देवी की प्रतिमा।
  • लांगुरिया (हनुमान) मंदिर – देवी के ठीक सामने।
  • भैरव मंदिर – मंदिर प्रांगण में।
  • कालीसिल नदी – जिसमें स्नान कर श्रद्धालु दर्शन को जाते हैं।
  • चैत्र का लक्खी मेला और लांगुरिया गीत।

कैसे पहुँचें

  • सड़क मार्ग: करौली शहर से लगभग 23 किमी; हिंडौन सिटी, गंगापुर सिटी और श्री महावीरजी से बसें मिलती हैं। मेले में विशेष बसें चलती हैं।
  • रेल मार्ग: गंगापुर सिटी (लगभग 34 किमी) निकटतम बड़ा स्टेशन; हिंडौन सिटी भी विकल्प है।
  • हवाई मार्ग: जयपुर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा (लगभग 170 किमी)।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

कैला देवी मंदिर कहाँ है?
कैला देवी मंदिर राजस्थान के करौली ज़िले के कैला देवी गाँव में, करौली शहर से लगभग 23 किमी दूर, अरावली की त्रिकूट पहाड़ियों में कालीसिल नदी के किनारे स्थित है।
कैला देवी किसकी कुलदेवी हैं?
कैला देवी करौली के चंद्रवंशी जादौन (यदुवंशी) राजवंश की कुलदेवी मानी जाती हैं। मंदिर के निर्माण और विस्तार में करौली के कई महाराजाओं का योगदान रहा है।
कैला देवी का लक्खी मेला कब लगता है?
कैला देवी का प्रसिद्ध लक्खी मेला हर वर्ष चैत्र मास (मार्च-अप्रैल) में चैत्र नवरात्रि के आसपास लगभग पखवाड़े भर चलता है। इसमें राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा और दिल्ली से लाखों श्रद्धालु आते हैं।
लांगुरिया कौन हैं?
देवी के सामने स्थित हनुमान जी के मंदिर को स्थानीय लोग लांगुरिया कहते हैं। लांगुरिया को देवी का भक्त माना जाता है और मेले में श्रद्धालु लांगुरिया के लोकगीत गाते हुए दर्शन को आते हैं।
मंदिर में कौन-कौन सी प्रतिमाएँ हैं?
गर्भगृह में दो प्रतिमाएँ हैं – बड़ी प्रतिमा माँ कैला देवी की है, जिनका मुख थोड़ा झुका हुआ है, और दूसरी चामुंडा देवी की। मान्यता है कि चामुंडा की प्रतिमा गागरोन किले से लाई गई थी।

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