कन्याकुमारी भगवती अम्मन मंदिर भारत के सबसे दक्षिणी छोर पर, तमिलनाडु के कन्याकुमारी नगर में समुद्र तट पर स्थित देवी कन्याकुमारी का प्राचीन मंदिर है। यहाँ बंगाल की खाड़ी, अरब सागर और हिंद महासागर का संगम होता है। तंत्र चूड़ामणि के अनुसार यह कन्याश्रम शक्तिपीठ है, जहाँ सती की पीठ (पृष्ठ भाग) गिरी थी। यहाँ की शक्ति श्रवणी और भैरव निमिष हैं। देवी यहाँ कुमारी कन्या के रूप में पूजी जाती हैं, जो पार्वती का ही स्वरूप हैं।
कन्या देवी की तपस्या की कथा
पौराणिक कथा के अनुसार असुर बाणासुर को वरदान था कि उसका वध केवल एक कुमारी कन्या ही कर सकती है। देवताओं की प्रार्थना पर देवी ने कन्या रूप में जन्म लिया और शुचिंद्रम के भगवान शिव (थाणुमालयन) से विवाह के लिए समुद्र तट पर तपस्या करने लगीं। विवाह आधी रात के मुहूर्त में तय हुआ, पर विवाह होने पर बाणासुर का वध न हो पाता। इसलिए नारद मुनि ने मुर्गे की बाँग से भोर होने का भ्रम पैदा किया और शिव जी रास्ते से ही लौट गए। विवाह के लिए बना भोजन – चावल और अनाज – रेत में बदल गया; तट की रंग-बिरंगी रेत को लोग उसी की निशानी मानते हैं। बाद में देवी ने बाणासुर का वध किया और सदा के लिए कन्या रूप में यहीं विराजमान हो गईं।
हीरे की नथ और पूर्वी द्वार
गर्भगृह में देवी हाथ में जपमाला लिए तपस्यारत खड़ी कन्या के रूप में हैं। देवी की हीरे की नथ बहुत प्रसिद्ध है। मान्यता है कि उसकी चमक को समुद्र में जहाज़ वाले प्रकाशस्तंभ समझ लेते थे और चट्टानों से टकरा जाते थे, इसलिए समुद्र की ओर खुलने वाला पूर्वी द्वार साल में केवल कुछ विशेष अवसरों पर खोला जाता है; सामान्य दिनों में प्रवेश उत्तरी द्वार से होता है। परंपरा के अनुसार यहाँ देवी की स्थापना भगवान परशुराम ने की थी।
प्रमुख उत्सव
- नवरात्रि: दस दिनों का उत्सव, जिसमें विजयादशमी पर बाणासुर वध की झाँकी निकलती है।
- वैशाख उत्सव: दस दिनों का वार्षिक उत्सव, जिसमें देवी की शोभा यात्रा निकलती है।
- कलाभम उत्सव (कर्किडकम मास) – देवी पर चंदन का लेप।
आसपास के दर्शन
मंदिर के ठीक सामने समुद्र में विवेकानंद शिला स्मारक है – जहाँ स्वामी विवेकानंद ने 1892 में ध्यान किया था – और पास ही संत कवि तिरुवल्लुवर की 133 फ़ीट ऊँची प्रतिमा है। दोनों तक नाव से जाया जाता है। लगभग 13 किमी दूर शुचिंद्रम का थाणुमालयन मंदिर है, जहाँ ब्रह्मा, विष्णु और महेश एक ही लिंग में पूजे जाते हैं – वह भी 51 शक्तिपीठों की सूची में “शुचि पीठ” के रूप में आता है।
दर्शन का समय
- सुबह: लगभग 4:30 से दोपहर 12:30 बजे तक
- शाम: लगभग 4:00 से रात 8:30 बजे तक
पुरुषों को गर्भगृह के पास कमीज़ और बनियान उतारकर दर्शन करने होते हैं। पारंपरिक वस्त्र (धोती/साड़ी) पहनना अच्छा रहता है।
मुख्य आकर्षण
- देवी कन्याकुमारी – हाथ में माला लिए तपस्यारत कन्या रूप, हीरे की नथ।
- त्रिवेणी संगम – बंगाल की खाड़ी, अरब सागर और हिंद महासागर का मिलन।
- विवेकानंद शिला स्मारक और तिरुवल्लुवर प्रतिमा।
- समुद्र तट से सूर्योदय और सूर्यास्त।
- शुचिंद्रम थाणुमालयन मंदिर (लगभग 13 किमी)।
कैसे पहुँचें
- रेल मार्ग: कन्याकुमारी रेलवे स्टेशन (लगभग 1 किमी) – दिल्ली, मुंबई, चेन्नई आदि से सीधी ट्रेनें।
- सड़क मार्ग: नागरकोइल से लगभग 20 किमी, तिरुवनंतपुरम से लगभग 90 किमी।
- हवाई मार्ग: तिरुवनंतपुरम अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा (लगभग 90 किमी)।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
कन्याकुमारी शक्तिपीठ में सती का कौन सा अंग गिरा था?
कन्याकुमारी देवी का विवाह क्यों नहीं हुआ?
कन्याकुमारी मंदिर में पुरुषों के लिए क्या नियम है?
कन्याकुमारी मंदिर का पूर्वी द्वार क्यों बंद रहता है?
कन्याकुमारी मंदिर के पास क्या देखें?
कन्याकुमारी भगवती अम्मन मंदिर, कन्याकुमारी तमिलनाडु इन तीर्थ यात्राओं में शामिल है
अन्य प्रसिद्ध मंदिर
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