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कार्तिक कृष्ण द्वादशी

भक्तिरस – BhaktiRas

अरुणाचलेश्वर मंदिर, तिरुवन्नामलई

Arunachaleswarar Temple, Tiruvannamalai

तिरुवन्नामलई, तमिलनाडु भगवान शिव (अरुणाचलेश्वर / अण्णामलैयार) – अग्नि लिंगम; देवी उण्णामुलै अम्मन निःशुल्क प्रवेश

अरुणाचलेश्वर मंदिर तमिलनाडु के तिरुवन्नामलई नगर में पवित्र अरुणाचल पर्वत की तलहटी में स्थित भगवान शिव का विशाल मंदिर है। यह पंचभूत स्थलों में अग्नि तत्व का प्रतिनिधित्व करता है और यहाँ का शिवलिंग अग्नि लिंगम कहलाता है। स्थानीय लोग शिव को अण्णामलैयार और देवी पार्वती को उण्णामुलै अम्मन कहते हैं। लगभग 10 हेक्टेयर में फैला यह मंदिर भारत के सबसे बड़े मंदिर परिसरों में से एक है, और मान्यता है कि अरुणाचल पर्वत स्वयं शिव का स्वरूप है।

अग्नि स्तंभ की कथा

शिव पुराण की कथा के अनुसार एक बार ब्रह्मा और विष्णु में विवाद हुआ कि दोनों में श्रेष्ठ कौन है। तभी उनके बीच एक अनंत अग्नि स्तंभ प्रकट हुआ। विष्णु वराह बनकर उसका आदि खोजने नीचे गए और ब्रह्मा हंस बनकर उसका अंत खोजने ऊपर गए, पर दोनों असफल रहे। तब उस ज्योति से भगवान शिव प्रकट हुए – इसे लिंगोद्भव कहते हैं। भक्तों की प्रार्थना पर वही अग्नि स्तंभ शांत होकर अरुणाचल पर्वत बन गया। इसीलिए यहाँ पर्वत की ही परिक्रमा की जाती है।

कार्तिगै दीपम

तमिल माह कार्तिगै (नवंबर-दिसंबर) की पूर्णिमा पर होने वाला कार्तिगै दीपम यहाँ का सबसे बड़ा उत्सव है। दस दिन के उत्सव के अंतिम दिन शाम को अरुणाचल पर्वत की चोटी पर विशाल कड़ाह में घी का महादीपम जलाया जाता है, जो कई दिनों तक जलता है और दूर-दूर से दिखाई देता है। यह अग्नि स्तंभ के रूप में शिव के प्रकट होने का प्रतीक है। इस दिन लाखों श्रद्धालु तिरुवन्नामलई पहुँचते हैं।

गिरिवलम – अरुणाचल की परिक्रमा

अरुणाचल पर्वत की लगभग 14 किमी की नंगे पाँव परिक्रमा को गिरिवलम कहते हैं। हर पूर्णिमा की रात हज़ारों-लाखों भक्त यह परिक्रमा करते हैं। रास्ते में आठ दिशाओं में आठ अष्ट लिंगम (इंद्र, अग्नि, यम, निरृति, वरुण, वायु, कुबेर और ईशान लिंगम) के मंदिर हैं। परिक्रमा हमेशा पर्वत को दाहिनी ओर रखते हुए की जाती है।

इतिहास, वास्तुकला और संत परंपरा

मंदिर का वर्तमान स्वरूप चोल काल (9वीं शताब्दी) से लेकर होयसल, विजयनगर और नायक शासकों के योगदान से बना। चार दिशाओं में चार विशाल गोपुरम हैं; पूर्व का राजगोपुरम लगभग 66 मीटर ऊँचा और 11 मंज़िला है, जिसका निर्माण विजयनगर सम्राट कृष्णदेव राय के समय शुरू हुआ। तिरुवन्नामलई संतों की भूमि भी है – रमण महर्षि ने यहीं अरुणाचल पर तप किया और उनका आश्रम आज भी साधकों का केंद्र है।

दर्शन का समय

  • सुबह: लगभग 5:30 से दोपहर 12:30 बजे तक
  • दोपहर विश्राम: 12:30 से 3:30 बजे तक
  • शाम: 3:30 से रात लगभग 9:30 बजे तक

पूर्णिमा और कार्तिगै दीपम पर मंदिर देर रात तक खुला रहता है और भारी भीड़ होती है।

मुख्य आकर्षण

  • गिरिवलम: अरुणाचल पर्वत की 14 किमी परिक्रमा, अष्ट लिंगम सहित।
  • कार्तिगै महादीपम – पर्वत की चोटी पर जलने वाला विशाल दीप।
  • सहस्र स्तंभ मंडप और पाताल लिंगम (जहाँ रमण महर्षि ने युवावस्था में ध्यान किया)।
  • श्री रमणाश्रम और पर्वत पर विरूपाक्ष गुफा व स्कंदाश्रम।

कैसे पहुँचें

  • रेल मार्ग: तिरुवन्नामलई रेलवे स्टेशन (लगभग 2 किमी); विल्लुपुरम और काटपाडी (वेल्लोर) बड़े जंक्शन।
  • सड़क मार्ग: चेन्नई से लगभग 190 किमी, बेंगलुरु से लगभग 200 किमी, पुडुचेरी से लगभग 105 किमी – सीधी बसें।
  • हवाई मार्ग: चेन्नई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा (लगभग 180 किमी)।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

अरुणाचलेश्वर मंदिर किस तत्व का प्रतीक है?
अरुणाचलेश्वर मंदिर पंचभूत स्थलों में अग्नि तत्व का प्रतीक है। यहाँ का शिवलिंग अग्नि लिंगम कहलाता है।
गिरिवलम क्या है और कितने किलोमीटर का है?
अरुणाचल पर्वत की नंगे पाँव परिक्रमा को गिरिवलम कहते हैं। यह लगभग 14 किमी लंबी है और विशेष रूप से पूर्णिमा की रात की जाती है।
कार्तिगै दीपम कब होता है?
कार्तिगै दीपम तमिल माह कार्तिगै (नवंबर-दिसंबर) में कृत्तिका नक्षत्र वाली पूर्णिमा पर होता है। इस दिन अरुणाचल पर्वत की चोटी पर विशाल घी का दीप जलाया जाता है।
अरुणाचल पर्वत को शिव का स्वरूप क्यों माना जाता है?
कथा के अनुसार ब्रह्मा और विष्णु के सामने शिव अनंत अग्नि स्तंभ के रूप में प्रकट हुए थे, जो बाद में शांत होकर अरुणाचल पर्वत बन गया। इसलिए पर्वत को ही शिवलिंग माना जाता है।
तिरुवन्नामलई में रमण महर्षि का आश्रम कहाँ है?
श्री रमणाश्रम अरुणाचलेश्वर मंदिर से लगभग 2 किमी दूर गिरिवलम मार्ग पर है। पर्वत पर विरूपाक्ष गुफा और स्कंदाश्रम भी रमण महर्षि से जुड़े हैं।

अरुणाचलेश्वर मंदिर, तिरुवन्नामलई इन तीर्थ यात्राओं में शामिल है

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