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कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी

भक्तिरस – BhaktiRas

जोगुलांबा मंदिर, आलमपुर

Jogulamba Temple, Alampur

जोगुलांबा गद्वाल, तेलंगाना माँ जोगुलांबा (योगांबा), भगवान बाल ब्रह्मेश्वर निःशुल्क प्रवेश

जोगुलांबा मंदिर तेलंगाना के जोगुलांबा गद्वाल ज़िले में आलमपुर नगर में तुंगभद्रा नदी के तट पर, कृष्णा नदी के संगम के पास स्थित माँ जोगुलांबा (योगांबा) का मंदिर है। आदि शंकराचार्य से जुड़े अष्टादश महाशक्तिपीठ स्तोत्र में यह पाँचवाँ पीठ है – “अलंपुरे जोगुलांबा”। मान्यता है कि यहाँ सती के ऊपरी दाँत गिरे थे, और इसे योगिनी पीठ भी कहा जाता है। श्रीशैलम के निकट होने के कारण आलमपुर को श्रीशैलम का “पश्चिमी द्वार” भी कहा जाता है।

देवी का स्वरूप

माँ जोगुलांबा का स्वरूप उग्र है – वे शव पर बैठी हुई हैं और उनके सिर के ऊपर बिच्छू, मेंढक और छिपकली अंकित हैं। भक्त उन्हें इसी परिसर में विराजमान बाल ब्रह्मेश्वर (शिव) की शक्ति मानते हैं। देवी और बाल ब्रह्मेश्वर दोनों यहाँ के प्रधान देवता हैं।

विनाश और पुनर्निर्माण

1390 ई. में बहमनी सल्तनत के अभियानों के दौरान मंदिर परिसर को भारी क्षति पहुँची। पुजारियों ने देवी की मूल प्रतिमा को बचाकर पास के बाल ब्रह्मेश्वर मंदिर में रखा, जहाँ वह छह शताब्दियों से अधिक समय तक पूजित रही। 2005 में मूल स्थान पर नया मंदिर बनाया गया और मूल प्रतिमा को फिर से स्थापित किया गया। 2019 में भारत सरकार के पर्यटन मंत्रालय ने इसे प्रसाद (PRASAD) योजना में शामिल किया।

नवब्रह्म मंदिर

जोगुलांबा मंदिर के साथ उसी परिसर में नवब्रह्म मंदिर हैं – 7वीं–8वीं शताब्दी में बादामी चालुक्यों द्वारा बनवाए गए नौ शिव मंदिर। इनकी नक्काशी और प्राचीन स्थापत्य के कारण आलमपुर को श्रद्धालु “दक्षिण की काशी” भी कहते हैं। इतिहास और स्थापत्य में रुचि रखने वाले यात्रियों के लिए यह परिसर विशेष आकर्षण है।

प्रमुख उत्सव और यात्रा क्रम

  • शारदीय और वसंत नवरात्रि: सबसे बड़े उत्सव, दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं।
  • महाशिवरात्रि: बाल ब्रह्मेश्वर मंदिर के साथ मिलकर मनाई जाती है।
  • यात्रा क्रम: अष्टादश पीठों की यात्रा करने वाले भक्त प्रायः आलमपुर के बाद छठे पीठ श्रीशैलम (भ्रमरांबा) के दर्शन करते हैं।

दर्शन का समय

  • सुबह: लगभग 7:00 से 13:00 बजे तक
  • दोपहर/संध्या: लगभग 14:00 से 20:30 बजे तक

नवरात्रि और पर्वों पर समय बदल सकता है।

मुख्य आकर्षण

  • माँ जोगुलांबा – शव पर विराजमान उग्र रूप, सिर के ऊपर बिच्छू, मेंढक और छिपकली अंकित।
  • बाल ब्रह्मेश्वर मंदिर – जहाँ छह शताब्दियों तक देवी की मूल प्रतिमा सुरक्षित रही।
  • नवब्रह्म मंदिर – 7वीं–8वीं शताब्दी के बादामी चालुक्यकालीन नौ शिव मंदिर।
  • तुंगभद्रा नदी का घाट।

कैसे पहुँचें

  • रेल मार्ग: आलमपुर रोड स्टेशन (लगभग 9 किमी, सीमित ट्रेनें); कुर्नूल स्टेशन (लगभग 27 किमी) अधिक सुविधाजनक।
  • सड़क मार्ग: हैदराबाद–बेंगलुरु राजमार्ग से; हैदराबाद से लगभग 220 किमी, कुर्नूल से लगभग 26 किमी।
  • हवाई मार्ग: राजीव गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, हैदराबाद।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

जोगुलांबा मंदिर किस शक्तिपीठ से जुड़ा है?
यह आदि शंकराचार्य से जुड़े अष्टादश महाशक्तिपीठ स्तोत्र का पाँचवाँ पीठ है – "अलंपुरे जोगुलांबा"। इसे योगिनी पीठ भी कहते हैं और मान्यता है कि यहाँ सती के ऊपरी दाँत गिरे थे।
जोगुलांबा मंदिर का पुनर्निर्माण कब हुआ?
1390 ई. में बहमनी सल्तनत के आक्रमणों में मंदिर परिसर को भारी क्षति पहुँची। पुजारियों ने मूल प्रतिमा को बाल ब्रह्मेश्वर मंदिर में सुरक्षित रखा। 2005 में मूल स्थान पर नया मंदिर बनाकर प्रतिमा पुनः स्थापित की गई।
आलमपुर के नवब्रह्म मंदिर क्या हैं?
नवब्रह्म मंदिर 7वीं–8वीं शताब्दी में बादामी चालुक्यों द्वारा बनवाए गए नौ शिव मंदिरों का समूह है। ये जोगुलांबा मंदिर के साथ एक ही परिसर में तुंगभद्रा तट पर स्थित हैं।
जोगुलांबा देवी का स्वरूप कैसा है?
देवी का स्वरूप उग्र है – वे शव पर बैठी हैं और उनके सिर के ऊपर बिच्छू, मेंढक और छिपकली अंकित हैं। भक्त उन्हें बाल ब्रह्मेश्वर शिव की शक्ति मानते हैं।
आलमपुर कैसे पहुँचें?
आलमपुर हैदराबाद से लगभग 220 किमी और कुर्नूल से लगभग 26 किमी दूर है। कुर्नूल तक ट्रेन या बस से आकर सड़क मार्ग से आलमपुर पहुँचना सबसे सुविधाजनक है।

जोगुलांबा मंदिर, आलमपुर इन तीर्थ यात्राओं में शामिल है

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