मुख्य सामग्री पर जाएँ

कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी

भक्तिरस – BhaktiRas

द्राक्षाराम – श्री भीमेश्वर स्वामी मंदिर, द्राक्षारामम

Draksharama – Sri Bhimeswara Swamy Temple, Draksharamam

कोनसीमा, आंध्र प्रदेश भगवान भीमेश्वर स्वामी, देवी माणिक्यांबा निःशुल्क प्रवेश

द्राक्षाराम – श्री भीमेश्वर स्वामी मंदिर – आंध्र प्रदेश के डॉ. बी.आर. आंबेडकर कोनसीमा ज़िले के द्राक्षारामम गाँव में स्थित भगवान शिव का प्रसिद्ध धाम है। यह पंचाराम क्षेत्रों में से एक है, और यहीं की देवी माणिक्यांबा अष्टादश महाशक्तिपीठों में गिनी जाती हैं – इस तरह एक ही परिसर में शिव का पंचाराम और देवी का शक्तिपीठ दोनों हैं। श्रीशैलम और श्रीकालहस्ती के साथ द्राक्षाराम को उन तीन लिंगों में भी गिना जाता है जिनसे आंध्र का प्राचीन नाम “त्रिलिंग देश” जोड़ा जाता है। श्रद्धालु इसे दक्षिण काशी भी कहते हैं।

स्थल पुराण: पंचाराम और दक्ष यज्ञ

पंचाराम कथा के अनुसार कार्तिकेय ने तारकासुर का वध करने के लिए उसके शिवलिंग को आग्नेयास्त्र से तोड़ा, जिसके पाँच टुकड़े पाँच स्थानों पर गिरे। द्राक्षाराम का टुकड़ा सूर्यदेव द्वारा प्रतिष्ठित माना जाता है। इसी भूमि को प्रजापति दक्ष के यज्ञ का स्थान भी माना जाता है, जहाँ सती ने देह त्याग किया था – इसलिए गाँव के पुराने नाम दक्षवाटिका और दक्षतपोवन बताए जाते हैं। मान्यता है कि यहाँ श्रीराम ने भी शिव की आराधना की थी।

माणिक्यांबा देवी – अष्टादश महाशक्तिपीठ

आदि शंकराचार्य से जोड़े जाने वाले अष्टादश शक्तिपीठ स्तोत्र में “माणिक्या दक्षवाटिके” कहकर इस पीठ का उल्लेख है; स्तोत्र के क्रम में यह बारहवाँ पीठ आता है। प्रचलित मान्यता के अनुसार यहाँ सती का बायाँ कपोल (गाल) गिरा था और देवी माणिक्यांबा के रूप में प्रकट हुईं। देवी का सन्निधि मुख्य मंदिर के पिछले भाग में बाईं ओर है। शिव और शक्ति दोनों के धाम होने के कारण भक्त भीमेश्वर के साथ माणिक्यांबा के दर्शन अवश्य करते हैं।

मंदिर और भीमेश्वर लिंग

गर्भगृह में लगभग 2.6 मीटर ऊँचा स्फटिक जैसा लिंग है, जिसके ऊपरी भाग पर काली धारियाँ हैं। लोककथा इन धारियों को किरात रूप में अर्जुन से युद्ध करते शिव के व्याघ्रचर्म के निशान बताती है। गर्भगृह दो मंज़िला है – भक्त सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपरी तल से लिंग के ऊपरी भाग के दर्शन करते हैं। मंदिर के दो प्राकार हैं; भीतरी प्राकार में दो मंज़िला स्तंभयुक्त बरामदा है। मूर्तिकला में पूर्वी चालुक्य शैली स्पष्ट है, और परंपरा इसका निर्माण चालुक्य राजा भीम से जोड़ती है। दीवारों पर अनेक शिलालेख हैं।

मंदिर के पास सप्तगोदावरी कुंड है। कथा है कि सप्तर्षि गोदावरी का जल अभिषेक के लिए ला रहे थे; वह जल इसी कुंड में ठहरा, और आज भी इसी से अभिषेक होता है। गाँव की आठों दिशाओं में अष्ट सोमेश्वर लिंग भी प्रतिष्ठित हैं।

प्रमुख उत्सव

  • महाशिवरात्रि: सप्तगोदावरी स्नान और विशाल मेला।
  • कार्तिक मास: पंचाराम यात्रा का मुख्य समय, दीपदान और अभिषेक।
  • शरद नवरात्रि: माणिक्यांबा देवी की विशेष पूजा।

आसपास के दर्शन

द्राक्षाराम से सामर्लकोट का कुमाराराम (भीमेश्वर) लगभग एक घंटे की दूरी पर है, और दोनों मंदिरों की बनावट बहुत मिलती-जुलती है। पश्चिम गोदावरी में सोमाराम (भीमवरम) और क्षीराराम (पालकोल्लु) तथा कृष्णा तट पर अमराराम (अमरावती) के साथ पंचाराम यात्रा पूरी होती है। राजमुंदरी में गोदावरी स्नान भी इस यात्रा के साथ जोड़ा जा सकता है।

दर्शन का समय

  • सुबह: लगभग 6:00 से दोपहर 12:00 बजे तक
  • शाम: लगभग 4:00 से रात 8:00 बजे तक

महाशिवरात्रि, कार्तिक मास और नवरात्रि में समय बदल सकता है।

मुख्य आकर्षण

  • भीमेश्वर स्फटिक लिंग – लगभग 2.6 मीटर ऊँचा, ऊपरी भाग पर काली धारियाँ; ऊपरी तल से भी दर्शन।
  • माणिक्यांबा देवी – अष्टादश महाशक्तिपीठों में से एक, मंदिर के पिछले भाग में सन्निधि।
  • सप्तगोदावरी कुंड – पवित्र सरोवर, जिसके जल से अभिषेक होता है।
  • दो प्राकार और गोपुरम – चालुक्य काल की मूर्तिकला और शिलालेख।
  • गाँव के चारों ओर अष्ट सोमेश्वर मंदिर।

कैसे पहुँचें

  • सड़क मार्ग: रामचंद्रपुरम से लगभग 6 किमी, काकीनाडा से लगभग 30 किमी और राजमहेंद्रवरम (राजमुंदरी) से लगभग 50 किमी।
  • रेल मार्ग: निकटतम बड़े स्टेशन काकीनाडा, सामर्लकोट जंक्शन और राजमुंदरी।
  • हवाई मार्ग: राजमुंदरी हवाई अड्डा, मधुरपुडी (लगभग 50 किमी)।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

द्राक्षाराम में माणिक्यांबा देवी का शक्तिपीठ क्यों है?
प्रचलित मान्यता के अनुसार यहाँ सती का बायाँ कपोल (गाल) गिरा था, और यहाँ देवी माणिक्यांबा के रूप में पूजी जाती हैं। आदि शंकराचार्य से जोड़े जाने वाले अष्टादश शक्तिपीठ स्तोत्र में 'माणिक्या दक्षवाटिके' कहकर इस पीठ का उल्लेख है।
द्राक्षाराम का भीमेश्वर लिंग कैसा है?
भीमेश्वर स्वामी का लिंग लगभग 2.6 मीटर ऊँचा स्फटिक जैसा लिंग बताया जाता है, जिसके ऊपरी भाग पर काली धारियाँ हैं। गर्भगृह दो मंज़िला है, इसलिए भक्त सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपरी तल से लिंग के ऊपरी भाग के दर्शन भी करते हैं।
द्राक्षारामम नाम कैसे पड़ा?
परंपरा के अनुसार प्रजापति दक्ष ने अपना यज्ञ यहीं किया था, इसलिए स्थान को दक्षारामम या दक्षवाटिका कहा गया, जो बाद में द्राक्षारामम हो गया।
द्राक्षाराम का लिंग किसने स्थापित किया?
पंचाराम परंपरा के अनुसार द्राक्षाराम का लिंग सूर्यदेव ने स्थापित किया था। ऐतिहासिक रूप से मंदिर को पूर्वी चालुक्य राजा भीम से जोड़ा जाता है।
काकीनाडा से द्राक्षारामम कितनी दूर है?
काकीनाडा से द्राक्षारामम लगभग 30 किमी और राजमुंदरी से लगभग 50 किमी है। रामचंद्रपुरम पास का कस्बा है, जहाँ से ऑटो और बसें मिलती हैं।

द्राक्षाराम – श्री भीमेश्वर स्वामी मंदिर, द्राक्षारामम इन तीर्थ यात्राओं में शामिल है

दर्शन की जानकारी साझा करें

WhatsApp Facebook