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कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी

भक्तिरस – BhaktiRas

कंकाली देवी मंदिर, तिगवाँ (कटनी)

Kankali Devi Temple, Tigawa (Katni)

Murwara, मध्य प्रदेश कंकाली देवी (चामुंडा); मंदिर मूलतः भगवान विष्णु (नरसिंह) को समर्पित माना जाता है निःशुल्क प्रवेश

कंकाली देवी मंदिर मध्य प्रदेश के कटनी जिले की बहोरीबंद तहसील में स्थित गाँव तिगवाँ (तिगवा) का गुप्त कालीन मंदिर है। इसे सामान्यतः लगभग 400–425 ईस्वी का माना जाता है, और यह भारत के सबसे प्राचीन बचे हुए हिंदू मंदिरों में गिना जाता है। मंदिर का नाम यहाँ के चामुंडा फलक से पड़ा, जिसे स्थानीय लोग कंकाली देवी कहते हैं, जबकि विद्वान मानते हैं कि मंदिर मूलतः भगवान विष्णु को समर्पित था।

इतिहास

19वीं सदी में पुरातत्ववेत्ता अलेक्ज़ेंडर कनिंघम ने तिगवाँ का सर्वेक्षण किया। उनके विवरण के अनुसार यहाँ कभी अनेक मंदिर थे, जिनमें से अधिकांश बाद में नष्ट हो गए। कनिंघम ने बचे हुए मंदिर को गुप्त काल का माना और इसे प्रारंभिक हिंदू मंदिर स्थापत्य का महत्वपूर्ण उदाहरण बताया। आज यह मंदिर पुरातत्व विभाग के संरक्षण में है।

मंदिर और विग्रह

मंदिर का चौकोर गर्भगृह सपाट पत्थर की छत वाला है – शिखर वाले मंदिरों से पहले का रूप। आगे चार भारी स्तंभों का मुखमंडप है, जिनके शीर्ष पर बैठे सिंह और वृक्ष बने हैं। गर्भगृह के द्वार पर नदी देवियाँ गंगा (मकर पर) और यमुना (कच्छप पर) अंकित हैं। गर्भगृह में नरसिंह की प्रतिमा है, और मुखमंडप में शेषशायी विष्णु तथा चामुंडा (कंकाली देवी) के फलक हैं। कनिंघम के अनुसार शैव और शाक्त फलक बाद में, संभवतः 8वीं सदी के आसपास जोड़े गए।

स्थापत्य का महत्व

मंदिर की योजना साँची के मंदिर क्रमांक 17 से लगभग मिलती है, इसलिए दोनों को साथ रखकर गुप्त कालीन मंदिरों का अध्ययन किया जाता है।

यात्रा क्रम

तिगवाँ बहोरीबंद से लगभग 4–5 किमी उत्तर, कटनी से लगभग 50 किमी और जबलपुर से लगभग 70 किमी दूर है। यहाँ सुविधाएँ सीमित हैं, इसलिए कटनी या जबलपुर से दिन भर की यात्रा के रूप में आना सुविधाजनक रहता है।

दर्शन का समय

  • स्मारक: सामान्यतः सूर्योदय से सूर्यास्त तक

यह ASI द्वारा संरक्षित प्राचीन स्मारक है; दिन के उजाले में जाना ठीक रहता है।

मुख्य आकर्षण

  • गुप्त कालीन गर्भगृह – सपाट पत्थर की छत, भारत के सबसे प्राचीन बचे हुए मंदिरों में।
  • द्वार पर गंगा और यमुना – मकर और कच्छप पर खड़ी नदी देवियाँ।
  • सिंह-शीर्ष वाले स्तंभ – मुखमंडप के चार भारी स्तंभ।
  • शेषशायी विष्णु और चामुंडा (कंकाली देवी) के फलक।
  • गर्भगृह में नरसिंह की प्रतिमा।

कैसे पहुँचें

  • सड़क मार्ग: बहोरीबंद से लगभग 4–5 किमी उत्तर; कटनी से लगभग 50 किमी और जबलपुर से लगभग 70 किमी।
  • रेल मार्ग: कटनी जंक्शन, फिर सड़क से।
  • हवाई मार्ग: डुमना हवाई अड्डा, जबलपुर।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

तिगवाँ का कंकाली देवी मंदिर कितना पुराना है?
यह मंदिर गुप्त काल का है और सामान्यतः लगभग 400–425 ईस्वी का माना जाता है। कुछ विद्वान इसे 5वीं सदी के उत्तरार्ध का बताते हैं। यह भारत के सबसे प्राचीन बचे हुए हिंदू मंदिरों में गिना जाता है।
मंदिर का नाम कंकाली देवी क्यों पड़ा?
मंदिर के मुखमंडप में देवी चामुंडा का एक फलक है, जिसे स्थानीय लोग कंकाली देवी कहते हैं। इसी से मंदिर का नाम पड़ा, जबकि माना जाता है कि मंदिर मूलतः भगवान विष्णु को समर्पित था।
तिगवाँ मंदिर की स्थापत्य विशेषता क्या है?
इसका चौकोर गर्भगृह सपाट पत्थर की छत वाला है और आगे चार भारी स्तंभों का मुखमंडप है, जिनके शीर्ष पर सिंह बने हैं। यह योजना साँची के मंदिर क्रमांक 17 से लगभग मिलती है और प्रारंभिक हिंदू मंदिर स्थापत्य को समझने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
तिगवाँ कहाँ है?
तिगवाँ मध्य प्रदेश के कटनी जिले की बहोरीबंद तहसील में एक गाँव है, जो बहोरीबंद से लगभग 4–5 किमी दूर है।
क्या यह मंदिर संरक्षित है?
हाँ, कंकाली देवी मंदिर भारतीय पुरातत्व विभाग के संरक्षण में है। 19वीं सदी में अलेक्ज़ेंडर कनिंघम ने यहाँ के मंदिरों का सर्वेक्षण किया था।

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