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कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी

भक्तिरस – BhaktiRas

बिरजा देवी मंदिर, जाजपुर

Biraja Temple, Jajpur

जाजपुर, ओडिशा माँ बिरजा (गिरिजा / विरजा) – द्विभुजा महिषासुरमर्दिनी दुर्गा निःशुल्क प्रवेश

बिरजा देवी मंदिर ओडिशा के जाजपुर नगर में स्थित माँ बिरजा (गिरिजा या विरजा) का प्राचीन मंदिर है। आदि शंकराचार्य से जुड़े अष्टादश शक्तिपीठ स्तोत्र में “ओढ्याणे गिरिजा” कहा गया है – इस क्रम में यह अष्टादश महाशक्तिपीठों में ग्यारहवाँ पीठ है। जाजपुर को प्राचीन काल से विरजा क्षेत्र कहा जाता है, और यहाँ का नाभि गया पितृ कर्म के लिए प्रसिद्ध है। वर्तमान मंदिर लगभग 11वीं शताब्दी का माना जाता है।

शक्तिपीठ की मान्यता

तंत्र चूड़ामणि के अनुसार उत्कल देश के विरजा क्षेत्र में सती की नाभि गिरी थी। ओड्डियान (ओढ्याण) पीठ को भी वैतरणी नदी के आसपास के इसी क्षेत्र से जोड़ा जाता है। अष्टादश स्तोत्र की “गिरिजा” को यहीं की माँ बिरजा माना जाता है।

स्थान को लेकर मत

51 शक्तिपीठों की सूची में उत्कल का पीठ “बिरजा” नाम से आता है। आम तौर पर इसे जाजपुर का बिरजा मंदिर माना जाता है, जबकि एक मत पुरी के जगन्नाथ मंदिर परिसर में स्थित विमला मंदिर को यह पीठ मानता है। ओडिशा के श्रद्धालु दोनों देवियों को समान श्रद्धा से पूजते हैं।

मंदिर, विग्रह और नाभि गया

गर्भगृह में माँ बिरजा दो भुजाओं वाली महिषासुरमर्दिनी के रूप में विराजती हैं – एक हाथ से महिष पर भाला चलाती हुई और दूसरे से उसकी पूँछ खींचती हुई। देवी का एक चरण सिंह पर और दूसरा महिष पर है, और मुकुट में गणेश, अर्धचंद्र और शिवलिंग अंकित हैं। परिसर के भीतर नाभि गया नाम का कुआँ है – कथा के अनुसार गयासुर का सिर गया में, नाभि जाजपुर में और चरण पीठापुरम में थे। यहाँ श्रद्धालु पितरों के लिए पिंडदान और तर्पण करते हैं।

प्रमुख उत्सव

  • शारदीय दुर्गा पूजा: सोलह दिनों का मुख्य उत्सव; नवरात्रि को यहाँ अपराजिता पूजा के रूप में मनाया जाता है।
  • रथ यात्रा: दुर्गा पूजा के समय देवी का रथ निकलता है, जिसके ध्वज पर सिंह अंकित होता है।
  • महाविषुव संक्रांति, रज पर्व और प्रथमाष्टमी पर भी विशेष पूजा।

यात्रा क्रम

जाजपुर भुवनेश्वर से लगभग 125 किमी उत्तर में है, और कटक से बस द्वारा लगभग दो-ढाई घंटे लगते हैं। ओडिशा की तीर्थयात्रा में श्रद्धालु बिरजा के साथ पुरी के जगन्नाथ और विमला मंदिर तथा भुवनेश्वर के मंदिरों के दर्शन भी जोड़ते हैं।

दर्शन का समय

  • दर्शन: सामान्यतः सुबह लगभग 6:00 से दोपहर 1:00 और शाम लगभग 4:00 से रात 9:00 बजे तक

दुर्गा पूजा और विशेष पर्वों पर समय बदल सकता है।

मुख्य आकर्षण

  • माँ बिरजा – दो भुजाओं वाली महिषासुरमर्दिनी, एक हाथ से भाला और दूसरे से महिष की पूँछ पकड़े हुए।
  • नाभि गया – परिसर के भीतर का कुआँ, जहाँ पिंडदान और तर्पण होते हैं।
  • मंदिर परिसर के अनेक छोटे शिवलिंग और देवालय।
  • वैतरणी नदी – जाजपुर का पवित्र नदी-तट।

कैसे पहुँचें

  • रेल मार्ग: जाजपुर-क्योंझर रोड स्टेशन (लगभग 30 किमी); कटक भी सुविधाजनक बड़ा स्टेशन है।
  • सड़क मार्ग: कटक से बस द्वारा लगभग 2 से 2.5 घंटे; भुवनेश्वर से लगभग 125 किमी उत्तर में।
  • हवाई मार्ग: बीजू पटनायक अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, भुवनेश्वर।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

बिरजा देवी अष्टादश शक्तिपीठों में किस स्थान पर हैं?
आदि शंकराचार्य से जुड़े अष्टादश शक्तिपीठ स्तोत्र में "ओढ्याणे गिरिजा" कहा गया है। इस क्रम में जाजपुर की बिरजा (गिरिजा) देवी ग्यारहवें स्थान पर हैं।
बिरजा शक्तिपीठ में सती का कौन सा अंग गिरा था?
तंत्र चूड़ामणि के अनुसार उत्कल (विरजा क्षेत्र) में सती की नाभि गिरी थी। इस उत्कल पीठ को आम तौर पर जाजपुर का बिरजा मंदिर माना जाता है, जबकि एक मत पुरी के विमला मंदिर को यह पीठ मानता है।
नाभि गया क्या है?
नाभि गया बिरजा मंदिर परिसर के भीतर एक कुआँ है। गयासुर की कथा में उसकी नाभि का स्थान जाजपुर माना जाता है, इसलिए यहाँ पितरों के लिए पिंडदान और तर्पण किए जाते हैं।
बिरजा देवी की प्रतिमा कैसी है?
माँ बिरजा दो भुजाओं वाली महिषासुरमर्दिनी हैं – एक हाथ से महिष पर भाला चलाती हैं और दूसरे से उसकी पूँछ पकड़े हैं। उनका एक चरण सिंह पर और दूसरा महिष पर है, और मुकुट में गणेश, चंद्रमा और शिवलिंग अंकित हैं।
बिरजा मंदिर का मुख्य उत्सव कौन सा है?
मुख्य उत्सव शारदीय दुर्गा पूजा है, जो यहाँ सोलह दिनों तक मनाई जाती है। इसी समय देवी की रथ यात्रा भी निकलती है, जिसके ध्वज पर सिंह अंकित होता है।

बिरजा देवी मंदिर, जाजपुर इन तीर्थ यात्राओं में शामिल है

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