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कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी

भक्तिरस – BhaktiRas

कालिका माता मंदिर, चित्तौड़गढ़ किला

Kalika Mata Temple, Chittorgarh Fort

Chittorgarh, राजस्थान माँ कालिका (भद्रकाली स्वरूप) – चित्तौड़ेश्वरी निःशुल्क प्रवेश

कालिका माता मंदिर राजस्थान के ऐतिहासिक चित्तौड़गढ़ किले के भीतर स्थित माँ कालिका का प्राचीन मंदिर है। देवी को भद्रकाली का स्वरूप माना जाता है और किले की रक्षक होने के कारण उन्हें चित्तौड़ेश्वरी भी कहा जाता है। इस मंदिर की विशेषता यह है कि यह मूल रूप से 8वीं शताब्दी का सूर्य मंदिर था, जो बाद में देवी की उपासना का केंद्र बना।

सूर्य मंदिर से कालिका मंदिर तक

चित्तौड़ पर हुए आक्रमण में यह सूर्य मंदिर क्षतिग्रस्त हो गया था। प्रचलित इतिहास के अनुसार 14वीं शताब्दी में इसे माँ कालिका के मंदिर के रूप में फिर से स्थापित किया गया, और राणा कुंभा के समय भी इसका पुनर्निर्माण हुआ। मूल निर्माणकर्ता और पुनर्स्थापना करने वाले शासक के नाम को लेकर स्रोतों में अलग-अलग मत हैं। मंदिर का निचला भाग प्राचीन है, जबकि ऊपरी भाग अपेक्षाकृत बाद का है।

मंदिर और पूजा परंपरा

मान्यता है कि 14वीं शताब्दी में महाराणा लक्ष्मण सिंह ने यहाँ अखंड ज्योति प्रज्वलित की थी। माँ कालिका कई राजपूत कुलों और परिवारों की कुलदेवी व इष्टदेवी के रूप में पूजी जाती हैं। मंदिर की पूजा व्यवस्था में श्री निरंजनी अखाड़े के संतों की परंपरा रही है और वर्तमान प्रबंधन राजस्थान देवस्थान विभाग के पास है।

प्रमुख उत्सव

  • चैत्र और शारदीय नवरात्रि: विशेष पूजा और श्रद्धालुओं की भारी भीड़।
  • प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु और किला देखने आए पर्यटक दर्शन करते हैं।

आसपास के दर्शन

किले में कालिका माता मंदिर के साथ मीरा बाई मंदिर, कुंभ श्याम मंदिर, विजय स्तंभ, कीर्ति स्तंभ और पद्मिनी महल देखे जा सकते हैं। पूरा किला ठीक से देखने के लिए आधा दिन या उससे अधिक समय रखें।

दर्शन का समय

  • दर्शन: सुबह लगभग 6:00 से शाम लगभग 7:00 बजे तक

किला सूर्यास्त के आसपास बंद होने लगता है, इसलिए दिन में जाएँ। नवरात्रि में समय और भीड़ दोनों बढ़ जाते हैं।

मुख्य आकर्षण

  • माँ कालिका का गर्भगृह और अखंड ज्योति।
  • प्राचीन सूर्य मंदिर की नक्काशी के अवशेष।
  • पास ही पद्मिनी महल।
  • किले में विजय स्तंभ, कीर्ति स्तंभ और मीरा बाई मंदिर।

कैसे पहुँचें

  • रेल मार्ग: चित्तौड़गढ़ जंक्शन – किले तक ऑटो या टैक्सी।
  • सड़क मार्ग: उदयपुर से लगभग 115 किमी; किले के भीतर वाहन से घूमा जा सकता है।
  • हवाई मार्ग: महाराणा प्रताप हवाई अड्डा, डबोक, उदयपुर (लगभग 90 किमी)।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

कालिका माता मंदिर चित्तौड़गढ़ पहले किसका मंदिर था?
यह मंदिर मूल रूप से 8वीं शताब्दी का सूर्य मंदिर था। चित्तौड़ पर आक्रमण में क्षति के बाद इसे देवी कालिका के मंदिर के रूप में पुनः स्थापित किया गया।
कालिका माता को चित्तौड़ेश्वरी क्यों कहते हैं?
किले की रक्षक देवी मानी जाने के कारण माँ कालिका को चित्तौड़ेश्वरी भी कहा जाता है। उन्हें भद्रकाली का स्वरूप माना जाता है।
कालिका माता मंदिर में अखंड ज्योति कब से जल रही है?
मान्यता है कि 14वीं शताब्दी में महाराणा लक्ष्मण सिंह ने यहाँ अखंड ज्योति प्रज्वलित की थी।
कालिका माता मंदिर किले में कहाँ है?
मंदिर चित्तौड़गढ़ किले के भीतर, पद्मिनी महल के पास है। किले के भीतर वाहन या पैदल यहाँ पहुँचा जा सकता है।
कालिका माता मंदिर में मुख्य उत्सव कौन सा है?
चैत्र और शारदीय नवरात्रि यहाँ के मुख्य उत्सव हैं, जब किले में दूर-दूर से श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं।

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