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कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी

भक्तिरस – BhaktiRas

श्री सारंगपाणि मंदिर, कुंभकोणम

Sri Sarangapani Temple, Kumbakonam

कुंभकोणम, तमिलनाडु भगवान श्री सारंगपाणि (आरावमुदन), देवी कोमलवल्ली थायार निःशुल्क प्रवेश

श्री सारंगपाणि मंदिर तमिलनाडु के मंदिरों के नगर कुंभकोणम में स्थित भगवान विष्णु का सबसे बड़ा मंदिर है। यहाँ भगवान सारंगपाणि – हाथ में शार्ङ्ग धनुष धारण करने वाले – के रूप में अधलेटी (उत्थान शयन) मुद्रा में विराजते हैं। भक्त उन्हें प्रेम से आरावमुदन – “कभी तृप्त न करने वाला अमृत” – कहते हैं। यह 108 दिव्य देशमों में से एक है, और श्रीरंगम व तिरुमला के बाद इसे सबसे प्रमुख दिव्य देशमों में गिना जाता है। देवी लक्ष्मी यहाँ कोमलवल्ली थायार के नाम से पूजी जाती हैं।

हेम ऋषि और कोमलवल्ली

स्थल पुराण के अनुसार हेम ऋषि ने देवी लक्ष्मी को पुत्री रूप में पाने के लिए यहाँ के सरोवर पोत्रामरै कुलम के तट पर तपस्या की। देवी कमल के फूल से प्रकट हुईं और कोमलवल्ली कहलाईं। भगवान विष्णु वैकुंठ से रथ पर सवार होकर आए और देवी से विवाह किया। इसी कथा की स्मृति में मंदिर का गर्भगृह रथ के आकार में बना है – उसके दोनों ओर पत्थर के घोड़े, हाथी और पहिए उकेरे गए हैं, जो चोल स्थापत्य का अद्भुत उदाहरण है।

नाथमुनि और दिव्य प्रबंधम

श्री वैष्णव परंपरा के इतिहास में इस मंदिर का विशेष स्थान है। कथा है कि 10वीं शताब्दी में आचार्य नाथमुनि ने इसी मंदिर में कुछ भक्तों को नम्माऴ्वार का “आरावमुदे” पाशुरम गाते सुना। उन्हें पता चला कि ऐसे हज़ार से अधिक पाशुरम थे, जो समय के साथ खो गए थे। उनकी खोज में नाथमुनि ने आलवार संतों के 4,000 पाशुरमों को फिर से संकलित किया, जिन्हें आज नालायिर दिव्य प्रबंधम कहा जाता है – और जिनमें 108 दिव्य देशमों की स्तुति है।

राजगोपुरम और परिसर

मंदिर का 11 मंज़िला राजगोपुरम कुंभकोणम का सबसे ऊँचा गोपुरम है, जिस पर नृत्य मुद्राओं और पौराणिक कथाओं की सुंदर मूर्तियाँ हैं। गर्भगृह तक पहुँचने के लिए “उत्तरायण वासल” और “दक्षिणायन वासल” नाम के दो द्वार हैं, जो वर्ष के छह-छह महीने खुलते हैं। कुंभकोणम हर 12 वर्ष में होने वाले महामहम उत्सव के लिए प्रसिद्ध है, जिसे दक्षिण भारत का कुंभ कहा जाता है।

प्रमुख उत्सव

  • चित्रै रथोत्सव (अप्रैल-मई): तमिलनाडु के बड़े रथों में से एक की शोभा यात्रा।
  • वैकुंठ एकादशी पर विशेष पूजा।
  • महामहम – हर 12 वर्ष में (पिछली बार 2016 में)।

दर्शन का समय

  • सुबह: लगभग 7:00 से दोपहर 12:00 बजे तक
  • शाम: लगभग 4:00 से रात 9:00 बजे तक

मुख्य आकर्षण

  • भगवान सारंगपाणि – शयन मुद्रा में (उत्थान शयन), हाथ में शार्ङ्ग धनुष।
  • रथ के आकार का गर्भगृह – पत्थर के घोड़े और हाथी।
  • राजगोपुरम – 11 मंज़िला, कुंभकोणम में सबसे ऊँचा।
  • पोत्रामरै कुलम – मंदिर सरोवर।
  • महामहम कुलम और कुंभकोणम के अन्य मंदिर।

कैसे पहुँचें

  • रेल मार्ग: कुंभकोणम रेलवे स्टेशन (लगभग 2 किमी) – चेन्नई, त्रिची और तंजावुर से ट्रेनें।
  • सड़क मार्ग: तंजावुर से लगभग 40 किमी, त्रिची से लगभग 90 किमी।
  • हवाई मार्ग: तिरुचिरापल्ली अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा (लगभग 90 किमी)।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

सारंगपाणि नाम का क्या अर्थ है?
सारंगपाणि का अर्थ है 'हाथ में शार्ङ्ग (सारंग) धनुष धारण करने वाले'। शार्ङ्ग भगवान विष्णु का दिव्य धनुष है।
सारंगपाणि मंदिर का गर्भगृह रथ जैसा क्यों है?
मान्यता है कि भगवान वैकुंठ से रथ पर सवार होकर यहाँ आए थे। इसलिए गर्भगृह को रथ के आकार में बनाया गया है, जिसके दोनों ओर पत्थर के घोड़े और हाथी उकेरे गए हैं।
नाथमुनि का सारंगपाणि मंदिर से क्या संबंध है?
कथा के अनुसार 10वीं शताब्दी के आचार्य नाथमुनि ने इसी मंदिर में कुछ भक्तों को 'आरावमुदे' पाशुरम गाते सुना। उसकी खोज में उन्होंने आलवार संतों के 4,000 पाशुरमों – नालायिर दिव्य प्रबंधम – को फिर से संकलित किया।
कुंभकोणम में महामहम कब होता है?
महामहम उत्सव हर 12 वर्ष में कुंभकोणम के महामहम कुलम (सरोवर) में होता है, जिसे दक्षिण भारत का कुंभ कहा जाता है। सारंगपाणि मंदिर इस उत्सव के प्रमुख मंदिरों में से है।
तंजावुर से कुंभकोणम कितनी दूर है?
तंजावुर से कुंभकोणम लगभग 40 किमी दूर है। बस या ट्रेन से लगभग 1 घंटा लगता है।

श्री सारंगपाणि मंदिर, कुंभकोणम इन तीर्थ यात्राओं में शामिल है

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