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कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी

भक्तिरस – BhaktiRas

बहुचरा माता मंदिर, बेचराजी

Bahuchara Mata Temple, Becharaji

Mehsana, गुजरात माँ बहुचरा (बहुचर माता), मुर्गे पर सवार निःशुल्क प्रवेश

बहुचरा माता मंदिर गुजरात के मेहसाणा ज़िले के बेचराजी (बहुचराजी) नगर में स्थित माँ बहुचरा का प्रसिद्ध मंदिर है। नगर का नाम ही देवी के नाम से पड़ा है। अंबाजी और पावागढ़ के साथ बेचराजी को गुजरात के प्रमुख शक्ति स्थलों में गिना जाता है, और कुछ परंपराएँ इसे शक्तिपीठ भी मानती हैं। गुजरात की अनेक जातियों की यह कुलदेवी हैं, और हर वर्ष लाखों श्रद्धालु यहाँ दर्शन के लिए आते हैं।

बहुचरा माता की कथा

लोककथा के अनुसार बहुचरा, चारण बापलदान देथा की पुत्री थीं। अपनी बहनों के साथ यात्रा करते समय शंखलपुर के पास बापैया नामक एक लुटेरे ने उनके काफ़िले पर आक्रमण किया। देवी और उनकी बहनों ने आत्मबलिदान दिया और लुटेरे को शाप दिया। कथा है कि पश्चाताप करके उसने वराखड़ी वृक्ष के नीचे देवी का स्थान बनाया। एक और लोककथा के अनुसार अज्ञातवास के समय अर्जुन ने यहाँ शमी वृक्ष में अपने शस्त्र छिपाए थे। इसी परंपरा के कारण किन्नर समुदाय बहुचरा माता को अपनी आराध्य देवी मानता है।

मंदिर परिसर और इतिहास

मंदिर परिसर में तीन स्थान हैं। आद्यस्थान मूल स्थान है, जहाँ एक फैले हुए वराखड़ी वृक्ष के पास देवी के प्रकट होने की मान्यता है। मध्यस्थान में चाँदी के द्वार के पीछे देवी की उकेरी हुई पट्टिका है। मुख्य मंदिर में देवी की प्रतिमा के स्थान पर स्फटिक के बाला यंत्र की पूजा होती है। मंदिर का सबसे पुराना ज्ञात उल्लेख 1280 ई. के एक शिलालेख में मिलता है। मान्यता है कि बड़ौदा के गायकवाड़ शासक के छोटे भाई मानाजीराव गायकवाड़ ने रोग से मुक्ति मिलने पर 18वीं शताब्दी में मुख्य मंदिर बनवाया। मंदिर पर पत्थर की नक्काशी और भित्ति चित्र देखने लायक हैं।

मुंडन संस्कार और परंपराएँ

बेचराजी में बच्चों का पहला मुंडन (चौल क्रिया) करवाने की पुरानी परंपरा है – मंदिर के पीछे मानसरोवर कुंड के पास बड़ी संख्या में मुंडन होते हैं। देवी का वाहन मुर्गा है, इसलिए भक्त मुर्गे को पवित्र मानते हैं। भक्त कवि वल्लभ भट्ट का रचा “आनंद नो गरबो” यहाँ विशेष श्रद्धा से गाया जाता है।

प्रमुख उत्सव

  • चैत्री पूनम: चैत्र पूर्णिमा का सबसे बड़ा मेला, जिसमें दूर-दूर से पदयात्री आते हैं।
  • नवरात्रि: गरबा, विशेष श्रृंगार और भारी भीड़।
  • दशहरा: शमी वृक्ष की पूजा।
  • हर पूनम पर भी विशेष दर्शन होते हैं।

आसपास के दर्शन

बेचराजी से मोढेरा का सूर्य मंदिर पास ही है, इसलिए यात्री प्रायः दोनों स्थान एक ही दिन में देखते हैं। मेहसाणा होते हुए पाटन की रानी की वाव और सिद्धपुर भी जाया जा सकता है।

दर्शन का समय

  • दर्शन: सुबह लगभग 5:30 से रात लगभग 9:00–10:00 बजे तक
  • आरती: सुबह और संध्या को

पूनम और नवरात्रि के दिनों में भीड़ अधिक रहती है, समय में बदलाव संभव है।

मुख्य आकर्षण

  • मुख्य मंदिर – स्फटिक का बाला यंत्र, जिसकी पूजा होती है।
  • आद्यस्थान – वराखड़ी वृक्ष वाला मूल स्थान, जहाँ देवी के प्रकट होने की मान्यता है।
  • मध्यस्थान – चाँदी के द्वार के पीछे देवी की उकेरी हुई पट्टिका।
  • मानसरोवर कुंड – जहाँ बच्चों का मुंडन (चौल) संस्कार होता है।
  • मोढेरा सूर्य मंदिर पास ही।

कैसे पहुँचें

  • सड़क मार्ग: मेहसाणा से लगभग 35 किमी; अहमदाबाद, मेहसाणा, चाणस्मा और विरमगाम से एसटी बसें।
  • रेल मार्ग: बेचराजी में छोटा स्टेशन है; बड़ा स्टेशन मेहसाणा जंक्शन।
  • हवाई मार्ग: सरदार वल्लभभाई पटेल अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, अहमदाबाद (लगभग 100 किमी)।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

बहुचरा माता का वाहन क्या है?
बहुचरा माता को मुर्गे पर सवार दिखाया जाता है। देवी चतुर्भुजा हैं – हाथों में तलवार, ग्रंथ और त्रिशूल तथा एक हाथ अभय मुद्रा में।
बेचराजी मंदिर परिसर में कितने मंदिर हैं?
परिसर में तीन मुख्य स्थान हैं – आद्यस्थान (वराखड़ी वृक्ष वाला मूल स्थान), मध्यस्थान और मुख्य मंदिर, जहाँ स्फटिक के बाला यंत्र की पूजा होती है।
बेचराजी का मुख्य मंदिर किसने बनवाया?
मान्यता है कि बड़ौदा के गायकवाड़ शासक के छोटे भाई मानाजीराव गायकवाड़ ने देवी की कृपा से रोग ठीक होने पर 18वीं शताब्दी (लगभग 1779 ई.) में मुख्य मंदिर बनवाया।
बेचराजी में मुंडन संस्कार क्यों होता है?
गुजरात की कई जातियाँ बहुचरा माता को कुलदेवी मानती हैं और बच्चों का पहला मुंडन (चौल क्रिया) यहीं मानसरोवर कुंड के पास करवाती हैं।
बेचराजी का मुख्य मेला कब लगता है?
सबसे बड़ा मेला चैत्र मास की पूर्णिमा (चैत्री पूनम) को लगता है। नवरात्रि और हर पूनम पर भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं।

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