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कार्तिक कृष्ण अमावस्या

भक्तिरस – BhaktiRas

मयूरेश्वर (मोरेश्वर) गणपति मंदिर, मोरगाँव

Mayureshwar (Moreshwar) Ganpati Temple, Morgaon

पुणे, महाराष्ट्र श्री मयूरेश्वर (मोरेश्वर) गणपति, सिद्धि-बुद्धि सहित निःशुल्क प्रवेश

श्री मयूरेश्वर (मोरेश्वर) मंदिर महाराष्ट्र के पुणे जिले के मोरगाँव में कऱ्हा नदी के किनारे स्थित गणपति का प्रसिद्ध मंदिर है। यह अष्टविनायक में पहला स्थान है – परंपरा के अनुसार अष्टविनायक यात्रा यहीं से शुरू होती है और आठों मंदिरों के दर्शन के बाद दोबारा मोरगाँव आकर ही पूरी मानी जाती है। गणेश पुराण में मोरगाँव को गणेश के तीन सबसे महत्वपूर्ण स्थानों में गिना गया है।

सिंधु असुर और मोर वाहन की कथा

कथा के अनुसार सिंधु नामक असुर ने अमृत पीकर देवताओं को त्रस्त कर दिया था। उसके संहार के लिए गणेश शिव-पार्वती के पुत्र रूप में प्रकट हुए। उन्होंने सिंधु और उसके सेनापति कमलासुर को पराजित किया और मोर को अपना वाहन बनाया। इसी से वे मयूरेश्वर – “मोर के स्वामी” – कहलाए और इस गाँव का नाम मोरगाँव (“मोरों का गाँव”) पड़ा। मान्यता है कि कऱ्हा नदी ब्रह्मा द्वारा गिराए गए जल से बनी।

मंदिर और विग्रह

गर्भगृह में बैठी मुद्रा में स्वयंभू माने जाने वाले मयूरेश्वर विराजमान हैं – सूंड बाईं ओर मुड़ी हुई, पूरा विग्रह सिंदूर से लेपित और ऊपर नाग का फन। नेत्रों और नाभि में हीरे जड़े बताए जाते हैं। दोनों ओर सिद्धि और बुद्धि की प्रतिमाएँ हैं। मंदिर पत्थर की ऊँची प्राचीर से घिरा है जिसके चारों कोनों पर मीनारें हैं, और चार द्वार चार युगों के गणेश रूपों से जुड़े हैं। मंदिर के सामने बड़ा नंदी और गणेश का वाहन मूषक है – गणपति मंदिर के सामने नंदी होना यहाँ की अनोखी बात है।

मोरया गोसावी और पेशवा

गणपति के महान भक्त संत मोरया गोसावी इस मंदिर से जुड़े हैं, और इसी परंपरा से “गणपति बाप्पा मोरया” का जयघोष जोड़ा जाता है। 18वीं शताब्दी में गणेश को कुलदेवता मानने वाले पेशवाओं ने मंदिर को संरक्षण दिया। आज मंदिर का प्रबंधन चिंचवड देवस्थान ट्रस्ट करता है, जो सिद्धटेक और थेऊर के मंदिर भी संभालता है।

प्रमुख उत्सव

  • गणेश चतुर्थी (भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी) – चिंचवड से पालकी मोरगाँव आती है।
  • गणेश जयंती (माघ शुक्ल चतुर्थी) पर भी पालकी और विशेष पूजा।
  • विजयादशमी पर उत्सव।

यात्रा क्रम

अष्टविनायक का पारंपरिक क्रम है – मोरगाँव, सिद्धटेक, पाली, महड, थेऊर, लेण्याद्रि, ओझर और रांजणगाँव, और अंत में फिर मोरगाँव। मोरगाँव से कुछ ही दूरी पर जेजुरी का खंडोबा मंदिर है, जहाँ अधिकांश यात्री रुकते हैं।

दर्शन का समय

  • दर्शन: सुबह लगभग 5:00 से रात 10:00 बजे तक
  • पूजा: प्रतिदिन सुबह, दोपहर और रात

गणेश चतुर्थी और माघी गणेश जयंती पर भारी भीड़ रहती है।

मुख्य आकर्षण

  • श्री मयूरेश्वर का स्वयंभू, सिंदूर लेपित विग्रह – सूंड बाईं ओर।
  • मंदिर के सामने नंदी और मूषक की प्रतिमाएँ।
  • चार कोनों पर मीनारों वाली पत्थर की प्राचीर और चार युगों के प्रतीक चार द्वार।
  • पवित्र कऱ्हा नदी।
  • जेजुरी का खंडोबा मंदिर पास में।

कैसे पहुँचें

  • रेल मार्ग: जेजुरी रेलवे स्टेशन (लगभग 15–17 किमी) सबसे निकट है; पुणे जंक्शन बड़ा स्टेशन है।
  • सड़क मार्ग: पुणे से लगभग 65 किमी, जेजुरी होकर; पुणे से बसें और टैक्सी मिलती हैं।
  • हवाई मार्ग: पुणे हवाई अड्डा सबसे निकट है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

अष्टविनायक यात्रा मोरगाँव से ही क्यों शुरू होती है?
परंपरा के अनुसार अष्टविनायक यात्रा मोरगाँव के मयूरेश्वर से शुरू होती है और आठों मंदिरों के दर्शन के बाद फिर मोरगाँव आकर ही पूरी मानी जाती है। गणेश पुराण में मोरगाँव को गणेश के सबसे महत्वपूर्ण तीन स्थानों में गिना गया है।
गणपति को मयूरेश्वर क्यों कहते हैं?
कथा के अनुसार गणेश ने यहाँ सिंधु नामक असुर का वध किया और मोर को अपना वाहन बनाया। इसीलिए वे मयूरेश्वर (मोरेश्वर) कहलाए और गाँव का नाम मोरगाँव पड़ा।
गणपति मंदिर के सामने नंदी क्यों है?
सामान्यतः नंदी शिव मंदिरों के सामने होते हैं, पर मोरगाँव में मंदिर के सामने बड़ा नंदी विराजमान है। इसके साथ गणेश के वाहन मूषक की प्रतिमा भी है। यह इस मंदिर की विशेष पहचान है।
मयूरेश्वर का विग्रह कैसा है?
विग्रह स्वयंभू माना जाता है – बैठी मुद्रा में, सूंड बाईं ओर मुड़ी हुई, सिंदूर से लेपित। नेत्रों और नाभि में हीरे जड़े बताए जाते हैं और ऊपर नाग का फन है। साथ में सिद्धि-बुद्धि विराजमान हैं।
पुणे से मोरगाँव कैसे पहुँचें?
मोरगाँव पुणे से लगभग 65 किमी दूर है। सड़क मार्ग से जेजुरी होकर पहुँचा जाता है। सबसे निकट रेलवे स्टेशन जेजुरी है, जो लगभग 15–17 किमी दूर है।

मयूरेश्वर (मोरेश्वर) गणपति मंदिर, मोरगाँव इन तीर्थ यात्राओं में शामिल है

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