शृंखला देवी आदि शंकराचार्य से जुड़े अष्टादश महाशक्तिपीठ स्तोत्र (“लंकायां शंकरी देवी…”) में तीसरे स्थान पर आने वाली देवी हैं – स्तोत्र में कहा गया है “प्रद्युम्ने शृंखला देवी”। प्रचलित मत इस प्रद्युम्न को पश्चिम बंगाल के हुगली ज़िले का पांडुआ मानता है, किंतु यहाँ आज कोई मंदिर शेष नहीं है और स्थान की पहचान को लेकर अलग-अलग मत हैं। इसलिए यह अठारह पीठों में सबसे कम ज्ञात और सबसे अधिक विवादित पीठ माना जाता है।
स्तोत्र में शृंखला देवी
अष्टादश शक्तिपीठ स्तोत्र में लंका की शंकरी और कांची की कामाक्षी के बाद प्रद्युम्न की शृंखला देवी का नाम आता है, फिर क्रौंचपट्टण (मैसूरु) की चामुंडेश्वरी का। कुछ सूचियों में इस पीठ को सती के उदर (पेट) से जोड़ा जाता है, पर यह संबंध परंपरा पर आधारित है। “शृंखला” का अर्थ है ज़ंजीर या बंधन – भक्त देवी को सांसारिक बंधनों से मुक्त करने वाली मानते हैं।
पांडुआ और मीनार
हुगली ज़िले के पांडुआ में लगभग 38 मीटर ऊँची एक प्राचीन मीनार और बड़ी मस्जिद के अवशेष हैं, जो भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा संरक्षित राष्ट्रीय महत्व के स्मारक हैं। स्थानीय मान्यता और कुछ लेखकों के अनुसार इसी स्थान पर पहले शृंखला देवी का मंदिर था, जो मध्यकाल में नष्ट हो गया। इस दावे के पक्ष में कोई पुरातात्विक प्रमाण प्रकाशित नहीं है, इसलिए इसे लोक-परंपरा के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
स्थान को लेकर मत
- पांडुआ (हुगली, पश्चिम बंगाल): सबसे प्रचलित मत, जिसे अधिकांश अष्टादश पीठ सूचियाँ अपनाती हैं।
- गंगासागर: कुछ परंपराएँ देवी की उपस्थिति गंगासागर क्षेत्र में मानती हैं।
- शृंगेरी (कर्नाटक): एक कथा के अनुसार ऋषि ऋष्यशृंग देवी को शृंगेरी ले गए।
- गुजरात: कुछ विद्वान “प्रद्युम्न” नाम के आधार पर इसे गुजरात में कहीं मानते हैं, पर कोई निश्चित स्थल नहीं बताया जाता।
इनमें से किसी भी मत की पुष्टि शिलालेख या उत्खनन से नहीं हुई है। 51 शक्तिपीठों की प्रचलित सूचियों में पांडुआ का कोई पीठ नहीं गिना जाता।
यात्रा क्रम
पांडुआ हावड़ा–बर्धमान रेल मार्ग पर स्थित है, इसलिए कोलकाता से एक दिन में यहाँ आकर लौटा जा सकता है। यहाँ पूजा की कोई नियमित व्यवस्था नहीं है; श्रद्धालु इसे ऐतिहासिक स्थल के रूप में देखते हैं और देवी का स्मरण करते हैं। अष्टादश पीठों की यात्रा करने वाले भक्त प्रायः बंगाल यात्रा के दौरान इसे भी अपनी सूची में जोड़ते हैं।
दर्शन का समय
पांडुआ में शृंखला देवी का कोई सक्रिय मंदिर या नियमित पूजा नहीं है। मीनार परिसर ASI का संरक्षित स्मारक है, जिसे सामान्यतः दिन के समय (लगभग सूर्योदय से सूर्यास्त) देखा जा सकता है।
मुख्य आकर्षण
- पांडुआ मीनार – लगभग 38 मीटर ऊँची मध्यकालीन मीनार, जिसके स्थान पर पहले देवी मंदिर होने की लोक-मान्यता है।
- बड़ी मस्जिद के अवशेष – ASI द्वारा संरक्षित राष्ट्रीय महत्व का स्मारक।
- अष्टादश शक्तिपीठ स्तोत्र से जुड़ा ऐतिहासिक-धार्मिक स्थल।
कैसे पहुँचें
- रेल मार्ग: पांडुआ स्टेशन, हावड़ा–बर्धमान मेन लाइन पर; हावड़ा से लोकल ट्रेनें।
- सड़क मार्ग: जी.टी. रोड (राज्य राजमार्ग 13) पांडुआ से होकर गुज़रता है।
- हवाई मार्ग: नेताजी सुभाष चंद्र बोस अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, कोलकाता।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
शृंखला देवी शक्तिपीठ कहाँ है?
क्या पांडुआ में शृंखला देवी का मंदिर है?
शृंखला देवी के स्थान को लेकर और कौन से मत हैं?
अष्टादश शक्तिपीठों में शृंखला देवी का कौन सा स्थान है?
पांडुआ कैसे पहुँचें?
शृंखला देवी शक्तिपीठ (प्रद्युम्न), पांडुआ इन तीर्थ यात्राओं में शामिल है
अन्य प्रसिद्ध मंदिर
-
कोलकाता, पश्चिम बंगाल कालीघाट काली मंदिर, कोलकाता माँ काली (कालिका); भैरव – नकुलेश्वर
-
बीरभूम, पश्चिम बंगाल बक्रेश्वर (वक्रेश्वर) शक्तिपीठ, बीरभूम पश्चिम बंगाल माँ महिषमर्दिनी; भैरव – वक्रनाथ (बक्रेश्वर शिव)
-
बीरभूम, पश्चिम बंगाल कंकालीतला शक्तिपीठ, बोलपुर बीरभूम माँ कंकाली (देवगर्भा); भैरव – रुरु
-
पूर्व मेदिनीपुर, पश्चिम बंगाल बर्गभीमा मंदिर (विभाष शक्तिपीठ), तमलुक माँ बर्गभीमा (कपालिनी / भीमरूपा); भैरव – सर्वानंद
-
मुर्शिदाबाद, पश्चिम बंगाल किरीटेश्वरी शक्तिपीठ, मुर्शिदाबाद माँ किरीटेश्वरी (विमला); भैरव – संवर्त
-
बीरभूम, पश्चिम बंगाल नलातेश्वरी शक्तिपीठ, नलहाटी बीरभूम माँ नलातेश्वरी (कालिका); भैरव – योगेश