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कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी

भक्तिरस – BhaktiRas

कालीघाट काली मंदिर, कोलकाता

Kalighat Kali Temple, Kolkata

कोलकाता, पश्चिम बंगाल माँ काली (कालिका); भैरव – नकुलेश्वर निःशुल्क प्रवेश

कालीघाट काली मंदिर पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में आदि गंगा (हुगली की पुरानी धारा) के किनारे स्थित माँ काली का प्रसिद्ध मंदिर है। यह 51 शक्तिपीठों में से एक है – तंत्र चूड़ामणि के अनुसार यहाँ सती के दाएँ पैर की उँगलियाँ गिरी थीं। माना जाता है कि “कोलकाता” नाम भी “कालीघाट” या “कालिक्षेत्र” से ही निकला है। बंगाल में माँ काली की भक्ति का यह सबसे बड़ा केंद्र है।

माँ काली का स्वरूप

गर्भगृह में माँ काली की मूर्ति कसौटी (काले) पत्थर की है, जिसकी तीन बड़ी आँखें, सोने से मढ़ी लंबी बाहर निकली जीभ और चार हाथ हैं। हाथों में खड्ग और असुर का कटा सिर है, जबकि दो हाथ अभय और वर मुद्रा में हैं। मूर्ति का स्वरूप बंगाल की पारंपरिक काली प्रतिमाओं से अलग और अनोखा है। मान्यता है कि सती के दाएँ पैर की उँगलियों का अंश आज भी मंदिर के एक गुप्त कक्ष (कुंड) में सुरक्षित है। यहाँ के भैरव नकुलेश्वर हैं, जिनका मंदिर मुख्य मंदिर के पास ही है।

इतिहास

कालीघाट का उल्लेख 15वीं-17वीं शताब्दी के बंगाली ग्रंथों में मिलता है। प्राचीन काल में यहाँ एक छोटी झोपड़ी जैसा मंदिर था। वर्तमान मंदिर का निर्माण 1809 ई. में बड़िशा के सावर्ण रायचौधुरी ज़मींदार परिवार के सहयोग से पूरा हुआ। मंदिर बंगाल की पारंपरिक आटचाला (आठ ढलानों वाली छत) शैली में बना है। मंदिर के पास पवित्र कुंडपुकुर तालाब है, जिसके जल को गंगाजल जितना पवित्र माना जाता है।

कालीघाट की कला और संस्कृति

19वीं शताब्दी में मंदिर के आसपास कारीगरों ने देवी-देवताओं और समाज के दृश्यों पर आधारित जो चित्र बनाए, वे कालीघाट पट चित्र के नाम से विश्व प्रसिद्ध हुए। 1855 में दक्षिणेश्वर मंदिर बनने से पहले कालीघाट ही कोलकाता में काली भक्ति का मुख्य केंद्र था। आज भी मंदिर के आसपास की गलियों में फूल, सिंदूर, चुनरी और पूजा सामग्री के बाज़ार की रौनक रहती है।

प्रमुख उत्सव

  • काली पूजा (दीपावली की अमावस्या): सबसे बड़ा उत्सव – पूरी रात पूजा और दर्शन।
  • दुर्गा पूजा और पोइला बोइशाख (बंगाली नववर्ष) पर विशेष भीड़।
  • नवरात्रि में नौ दिन विशेष श्रृंगार और पूजा।
  • मंगलवार और शनिवार को सामान्य दिनों से अधिक भक्त आते हैं।

सलाह: मंदिर में अनधिकृत “पंडे” शीघ्र दर्शन के नाम पर पैसे माँग सकते हैं; मंदिर समिति के आधिकारिक काउंटर से ही पूजा व दान की रसीद लें।

दर्शन का समय

  • मंगला आरती: सुबह लगभग 4:00 बजे
  • दर्शन: सुबह लगभग 5:00 से दोपहर 2:00 बजे तक
  • भोग के लिए बंद: दोपहर लगभग 2:00 से 5:00 बजे तक
  • संध्या दर्शन: शाम 5:00 से रात लगभग 10:30 बजे तक

काली पूजा की रात मंदिर पूरी रात खुला रहता है।

मुख्य आकर्षण

  • माँ काली की मूर्ति – सोने की जीभ और तीन आँखें।
  • नकुलेश्वर भैरव मंदिर – पास ही।
  • कुंडपुकुर – पवित्र तालाब।
  • आदि गंगा घाट और मंदिर बाज़ार।
  • दक्षिणेश्वर काली मंदिर (लगभग 18 किमी) और बेलूर मठ।

कैसे पहुँचें

  • मेट्रो: कालीघाट मेट्रो स्टेशन (ब्लू लाइन) से लगभग 1 किमी पैदल।
  • रेल मार्ग: हावड़ा स्टेशन लगभग 9 किमी, सियालदह लगभग 7 किमी।
  • हवाई मार्ग: नेताजी सुभाष चंद्र बोस अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा (लगभग 22 किमी)।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

कालीघाट शक्तिपीठ में सती का कौन सा अंग गिरा था?
तंत्र चूड़ामणि के अनुसार कालीघाट में सती के दाएँ पैर की उँगलियाँ गिरी थीं। यहाँ की शक्ति कालिका और भैरव नकुलेश्वर हैं।
कालीघाट मंदिर का दर्शन समय क्या है?
मंदिर सुबह लगभग 5:00 से दोपहर 2:00 बजे और शाम 5:00 से रात 10:30 बजे तक खुला रहता है। दोपहर में भोग के लिए मंदिर बंद होता है।
कालीघाट की माँ काली की जीभ सोने की क्यों है?
मूर्ति की बाहर निकली लंबी जीभ को सोने से मढ़ा गया है। यह माँ काली के उग्र रूप का प्रतीक है और भक्तों द्वारा चढ़ाए गए सोने से बनी मानी जाती है।
कालीघाट और दक्षिणेश्वर में क्या अंतर है?
कालीघाट 51 शक्तिपीठों में से एक प्राचीन मंदिर है, जबकि दक्षिणेश्वर काली मंदिर 1855 में रानी रासमणि ने बनवाया था और रामकृष्ण परमहंस से जुड़ा है। दोनों कोलकाता में हैं।
कालीघाट कैसे पहुँचें?
कोलकाता मेट्रो के कालीघाट स्टेशन से मंदिर लगभग 1 किमी पैदल है। हावड़ा और सियालदह स्टेशन से टैक्सी या बस से भी आसानी से पहुँचा जा सकता है।

कालीघाट काली मंदिर, कोलकाता इन तीर्थ यात्राओं में शामिल है

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