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कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी

भक्तिरस – BhaktiRas

श्री महालक्ष्मी (अंबाबाई) मंदिर, कोल्हापुर

Shri Mahalakshmi (Ambabai) Temple, Kolhapur

Kolhapur, महाराष्ट्र माँ महालक्ष्मी (अंबाबाई) निःशुल्क प्रवेश

श्री महालक्ष्मी मंदिर, जिसे स्थानीय लोग प्रेम से अंबाबाई मंदिर कहते हैं, महाराष्ट्र के कोल्हापुर नगर के बीचोंबीच स्थित माँ महालक्ष्मी का प्राचीन मंदिर है। आदि शंकराचार्य से जुड़े अष्टादश महाशक्तिपीठ स्तोत्र में यह सातवाँ पीठ है – “कोल्हापुरे महालक्ष्मी” – और इसे श्री पीठ भी कहा जाता है। यह मंदिर महाराष्ट्र के साढ़े तीन शक्तिपीठों में भी गिना जाता है (तुलजापुर, माहुर और वणी की सप्तश्रृंगी के साथ)। 51 शक्तिपीठों की कुछ सूचियों में भी करवीर (कोल्हापुर) का नाम आता है, जहाँ सती के नेत्र गिरने की मान्यता है।

करवीर क्षेत्र और कोल्हासुर की कथा

पुराणों में कोल्हापुर क्षेत्र को करवीर कहा गया है, और यह नाम आज भी स्थानीय रूप से प्रयोग होता है। कथा के अनुसार यहाँ कोल्हासुर नामक असुर का आतंक था, जिसका वध करने के लिए माँ महालक्ष्मी प्रकट हुईं। असुर के नाम से ही नगर का नाम कोल्हापुर पड़ा माना जाता है। मान्यता है कि महालक्ष्मी भगवान विष्णु (वेंकटेश्वर) की शक्ति हैं, इसलिए बहुत से श्रद्धालु तिरुपति यात्रा के साथ अंबाबाई के दर्शन भी करते हैं।

मंदिर और विग्रह

परंपरा के अनुसार मंदिर का निर्माण 7वीं शताब्दी में चालुक्य काल में हुआ, और बाद के शासकों ने इसका विस्तार किया। गर्भगृह में लगभग तीन फ़ुट ऊँची, मुकुटधारी देवी की प्रतिमा है, जिसके मुकुट में पंचमुखी नाग अंकित है। देवी के चार हाथों में मातुलिंग फल, गदा, ढाल और पानपात्र हैं, और पीछे उनका वाहन सिंह है। मंदिर की एक दीवार पर श्री यंत्र उकेरा गया है। देवी की प्रतिमा पश्चिमाभिमुख मानी जाती है।

किरणोत्सव

मंदिर की सबसे अनोखी परंपरा किरणोत्सव है। वर्ष में दो बार – सामान्यतः जनवरी के अंत-फ़रवरी के आरंभ में और नवंबर में – कुछ दिनों तक अस्त होते सूर्य की किरणें महाद्वार से होकर सीधे देवी तक पहुँचती हैं। पहले दिन किरणें चरणों को, दूसरे दिन मध्य भाग को और तीसरे दिन पूरी प्रतिमा को स्पर्श करती हैं। इन दिनों हज़ारों भक्त यह दृश्य देखने आते हैं; तिथियाँ हर वर्ष थोड़ी बदल सकती हैं।

प्रमुख उत्सव

  • शारदीय नवरात्रि: सबसे बड़ा उत्सव – प्रतिदिन देवी का विशेष श्रृंगार और भारी भीड़।
  • ललिता पंचमी और रथोत्सव।
  • मार्गशीर्ष गुरुवार, दीपावली लक्ष्मी पूजन और किरणोत्सव।

दर्शन का समय

  • दर्शन: सुबह लगभग 4:30 से रात लगभग 10:00 बजे तक
  • काकड़ आरती: भोर में लगभग 4:30–5:00 बजे
  • शेज आरती: रात लगभग 10:00 बजे

नवरात्रि, ग्रहण और विशेष पर्वों पर समय बदल सकता है।

मुख्य आकर्षण

  • माँ अंबाबाई – मुकुट में पंचमुखी नाग, हाथों में मातुलिंग फल, गदा, ढाल और पानपात्र।
  • सिंह – देवी का वाहन, प्रतिमा के पीछे।
  • श्री यंत्र – मंदिर की दीवार पर उकेरा हुआ।
  • किरणोत्सव – वर्ष में दो बार सूर्य किरणें देवी तक पहुँचती हैं।

कैसे पहुँचें

  • रेल मार्ग: छत्रपति शाहू महाराज टर्मिनस, कोल्हापुर (लगभग 3 किमी)।
  • सड़क मार्ग: पुणे–बेंगलुरु राष्ट्रीय राजमार्ग से; पुणे से लगभग 230 किमी, शहर में ऑटो और बसें।
  • हवाई मार्ग: कोल्हापुर हवाई अड्डा (उजळाईवाडी), लगभग 10 किमी।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

कोल्हापुर महालक्ष्मी मंदिर किस शक्तिपीठ से जुड़ा है?
यह आदि शंकराचार्य से जुड़े अष्टादश महाशक्तिपीठ स्तोत्र का सातवाँ पीठ है – "कोल्हापुरे महालक्ष्मी"। यह महाराष्ट्र के साढ़े तीन शक्तिपीठों में भी गिना जाता है, और कुछ 51 शक्तिपीठ सूचियों में करवीर (कोल्हापुर) का नाम आता है।
देवी को अंबाबाई क्यों कहते हैं?
महाराष्ट्र में माँ महालक्ष्मी को प्रेम से अंबाबाई (माँ) कहा जाता है। कोल्हापुर के लोगों के लिए वे नगर की अधिष्ठात्री देवी हैं।
किरणोत्सव क्या है?
वर्ष में दो बार (सामान्यतः जनवरी-फ़रवरी और नवंबर में) कुछ दिनों तक अस्त होते सूर्य की किरणें महाद्वार से होकर सीधे देवी की प्रतिमा तक पहुँचती हैं – पहले चरणों पर, फिर क्रमशः ऊपर तक। तिथियाँ हर वर्ष थोड़ी बदल सकती हैं।
कोल्हापुर को करवीर क्यों कहते हैं?
पुराणों में कोल्हापुर क्षेत्र को करवीर कहा गया है, और यह नाम आज भी स्थानीय रूप से प्रयोग होता है। कथा के अनुसार देवी ने यहाँ कोल्हासुर नामक असुर का वध किया, जिससे नगर का नाम कोल्हापुर पड़ा।
क्या कोल्हापुर और तिरुपति यात्रा का संबंध है?
मान्यता है कि महालक्ष्मी वेंकटेश्वर (बालाजी) की शक्ति हैं, इसलिए बहुत से श्रद्धालु तिरुपति यात्रा के साथ कोल्हापुर में अंबाबाई के दर्शन भी करते हैं।

श्री महालक्ष्मी (अंबाबाई) मंदिर, कोल्हापुर इन तीर्थ यात्राओं में शामिल है

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