श्री बल्लालेश्वर मंदिर महाराष्ट्र के रायगड जिले के पाली गाँव में सरसगड किले और अंबा नदी के बीच स्थित गणपति का प्रसिद्ध मंदिर है। पारंपरिक क्रम में यह अष्टविनायक में तीसरा स्थान है – मोरगाँव और सिद्धटेक के बाद। अष्टविनायक में यह एकमात्र विनायक हैं जो देवता के नाम से नहीं, बल्कि अपने भक्त बल्लाल के नाम से जाने जाते हैं।
बालक बल्लाल की कथा
कथा के अनुसार पाली के व्यापारी कल्याण सेठ का पुत्र बल्लाल गाँव के बच्चों के साथ एक बड़ी शिला को गणेश मानकर पूजा करता था। बच्चों के घर न लौटने से क्रोधित कल्याण ने उनकी पूजा उजाड़ दी, शिला फेंक दी और बल्लाल को पीटकर पेड़ से बाँध दिया। बल्लाल की अटूट भक्ति से प्रसन्न होकर गणेश साधु के रूप में प्रकट हुए, उसे मुक्त किया और उसकी प्रार्थना पर यहीं शिला में विराजमान हो गए। तभी से वे बल्लालेश्वर कहलाए। जिस शिला को कल्याण ने फेंका था, वह ढुंढी विनायक के रूप में पूजी जाती है और परंपरा के अनुसार उनके दर्शन बल्लालेश्वर से पहले किए जाते हैं।
मंदिर और विग्रह
बल्लालेश्वर का विग्रह पत्थर के सिंहासन पर पूर्वमुखी विराजमान है, सूंड बाईं ओर मुड़ी है और नेत्रों तथा नाभि में हीरे जड़े हैं। पीछे चाँदी की प्रभावली पर चँवर डुलाती रिद्धि-सिद्धि अंकित हैं। मंदिर इस तरह बना है कि सूर्योदय की किरणें सीधे विग्रह पर पड़ती हैं। मान्यता है कि मोरेश्वर विट्ठल सिंदकर (दिघे) ने 1640 में मंदिर बनवाया और बाद में लकड़ी के मंदिर के स्थान पर पत्थर का मंदिर बना। मंदिर की योजना देवनागरी अक्षर “श्री” के आकार की है, सभामंडप में आठ स्तंभ हैं और बाहरी गर्भगृह में मूषक की प्रतिमा है।
चिमाजी अप्पा का घंटा
मंदिर में लटका बड़ा घंटा पेशवा बाजीराव के भाई चिमाजी अप्पा पुर्तगालियों पर वसई की विजय के बाद लाए थे और बल्लालेश्वर को अर्पित किया। यह घंटा मराठा इतिहास की स्मृति के रूप में आज भी दर्शनीय है।
प्रमुख उत्सव
- भाद्रपदी उत्सव – भाद्रपद शुक्ल प्रतिपदा से पंचमी तक, गणेश चतुर्थी सहित।
- गणेश जयंती (माघ शुक्ल चतुर्थी) पर विशेष पूजा।
- सुबह के समय श्रद्धालु स्वयं पूजा भी कर सकते हैं।
यात्रा क्रम और आसपास
सिद्धटेक के बाद यात्री पाली आते हैं और यहाँ से खोपोली के पास महड के वरदविनायक की ओर जाते हैं, जो चौथा अष्टविनायक है। पाली के पास सरसगड और सुधागड किले भी हैं।
दर्शन का समय
- दर्शन: सुबह लगभग 5:00 से रात 10:00 बजे तक
- आरती: सुबह, दोपहर और संध्या
भाद्रपद और माघ के गणेश उत्सवों में भीड़ अधिक रहती है।
मुख्य आकर्षण
- बल्लालेश्वर – पूर्वमुखी, बाईं सूंड, नेत्रों और नाभि में हीरे।
- ढुंढी विनायक – वही स्वयंभू शिला जिसे कल्याण सेठ ने फेंका था।
- ‘श्री’ आकार का पत्थर का मंदिर और आठ स्तंभों वाला सभामंडप।
- चिमाजी अप्पा द्वारा लाया गया बड़ा घंटा।
- सरसगड किला और अंबा नदी।
कैसे पहुँचें
- रेल मार्ग: कोंकण रेलवे का रोहा स्टेशन (लगभग 28 किमी) या मध्य रेल का खोपोली/कर्जत।
- सड़क मार्ग: मुंबई से पनवेल–खोपोली होकर लगभग 120–125 किमी; पुणे से लगभग 120 किमी, खोपोली–पाली मार्ग से। पुणे और मुंबई से एसटी बसें चलती हैं।
- हवाई मार्ग: मुंबई या पुणे हवाई अड्डा।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
बल्लालेश्वर नाम कैसे पड़ा?
ढुंढी विनायक कौन हैं?
अष्टविनायक में पाली का क्रम क्या है?
पाली मंदिर का घंटा कहाँ से आया?
मुंबई से पाली कितनी दूर है?
बल्लालेश्वर गणपति मंदिर, पाली इन तीर्थ यात्राओं में शामिल है
अन्य प्रसिद्ध मंदिर
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नासिक, महाराष्ट्र भद्रकाली मंदिर (जनस्थान शक्तिपीठ), नासिक माँ भद्रकाली; शक्तिपीठ – भ्रामरी, भैरव विकृताक्ष
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पुणे, महाराष्ट्र चिंतामणि गणपति मंदिर (अष्टविनायक), थेऊर श्री चिंतामणि गणपति (स्वयंभू विग्रह)
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