चिंतामणि गणपति मंदिर महाराष्ट्र के पुणे जिले के थेऊर गाँव में स्थित गणेश जी का प्राचीन मंदिर है। यह अष्टविनायक – महाराष्ट्र के आठ स्वयंभू गणपति स्थानों – में से एक है और पारंपरिक यात्रा क्रम में पाँचवाँ स्थान रखता है। मुला-मुठा और भीमा नदियों के संगम के पास बसा थेऊर पुणे से लगभग 25 किमी दूर है, इसलिए यह अष्टविनायकों में सबसे अधिक दर्शन किए जाने वाले मंदिरों में गिना जाता है।
चिंतामणि रत्न की कथा
गणेश पुराण से जुड़ी कथा के अनुसार लोभी राजा गण (गणासुर) ने कपिल मुनि से इच्छापूर्ति करने वाला चिंतामणि रत्न छीन लिया था। मुनि की प्रार्थना पर गणेश जी ने गणासुर का संहार किया और रत्न लौटाया। किंतु कपिल मुनि ने रत्न के स्थान पर स्वयं गणेश जी को ही अपने पास रहने का वर माँगा। तभी से गणपति यहाँ चिंतामणि – चिंताओं को हरने वाले – नाम से विराजते हैं। एक अन्य मान्यता के अनुसार यहीं गणेश जी ने ब्रह्मा जी के अशांत मन को शांत किया था।
मंदिर और विग्रह
पूर्वाभिमुख गर्भगृह में विराजमान चिंतामणि का विग्रह स्वयंभू माना जाता है। सिंदूर से लेपित इस मूर्ति की सूंड बाईं ओर मुड़ी है और नेत्रों में रत्न जड़े हैं। मंदिर के निर्माण का श्रेय गाणपत्य संत मोरया गोसावी या उनके वंशज धरणीधर देव को दिया जाता है। बाद में पेशवा माधवराव प्रथम ने इसका जीर्णोद्धार कराया और लकड़ी का सुंदर सभामंडप बनवाया। चिमाजी अप्पा ने वसई किले की विजय के बाद पुर्तगालियों से प्राप्त एक बड़ा यूरोपीय घंटा यहाँ अर्पित किया। आज मंदिर चिंचवड देवस्थान ट्रस्ट के अधीन है।
माधवराव पेशवा और थेऊर
पेशवा माधवराव प्रथम चिंतामणि के अनन्य भक्त थे। गंभीर बीमारी के दिनों में वे थेऊर आ गए और अंतिम समय यहीं मंदिर के परिसर में बिताया। यहीं उनका देहांत हुआ और उनकी पत्नी रमाबाई भी उनके साथ सती हुईं। उनकी स्मृति में आज भी कार्तिक मास में रमा-माधव पुण्योत्सव मनाया जाता है।
प्रमुख उत्सव
- गणेश प्रकटोत्सव: भाद्रपद शुक्ल प्रतिपदा से सप्तमी तक, गणेश चतुर्थी सहित।
- माघोत्सव (गणेश जयंती): माघ शुक्ल पक्ष में।
- रमा-माधव पुण्योत्सव: कार्तिक मास की अष्टमी को।
- हर संकष्टी और अंगारकी चतुर्थी पर विशेष भीड़।
अष्टविनायक यात्रा क्रम
पारंपरिक क्रम है – मोरगाँव (मयूरेश्वर), सिद्धटेक (सिद्धिविनायक), पाली (बल्लालेश्वर), महड (वरदविनायक), थेऊर (चिंतामणि), लेण्याद्री (गिरिजात्मज), ओझर (विघ्नेश्वर), रांजणगाँव (महागणपति) और अंत में फिर मोरगाँव। पुणे से निकट होने के कारण कई यात्री मोरगाँव के बाद सीधे थेऊर आ जाते हैं।
दर्शन का समय
- दर्शन: सुबह लगभग 6:00 से दोपहर 1:00 बजे और दोपहर 2:00 से रात 10:00 बजे तक
- आरती: सुबह, मध्याह्न और रात्रि
गणेश चतुर्थी, माघी गणेश जयंती और अंगारकी चतुर्थी पर भारी भीड़ रहती है।
मुख्य आकर्षण
- श्री चिंतामणि – बाईं ओर मुड़ी सूंड और रत्नजड़ित नेत्रों वाला स्वयंभू विग्रह।
- माधवराव पेशवा का बनवाया लकड़ी का सभामंडप।
- चिमाजी अप्पा द्वारा अर्पित वसई किले से लाया गया बड़ा घंटा।
- मुला-मुठा और भीमा नदियों का संगम क्षेत्र।
- अष्टविनायक के अन्य स्थान – मोरगाँव, रांजणगाँव, सिद्धटेक।
कैसे पहुँचें
- सड़क मार्ग: पुणे से लगभग 25 किमी (पुणे–सोलापुर मार्ग से लोणी काळभोर होकर); पुणे से बस और टैक्सी उपलब्ध।
- रेल मार्ग: पुणे जंक्शन (लगभग 25 किमी)।
- हवाई मार्ग: पुणे हवाई अड्डा (लगभग 25 किमी)।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
अष्टविनायक में थेऊर का क्रम क्या है?
गणपति का नाम चिंतामणि क्यों पड़ा?
माधवराव पेशवा का थेऊर से क्या संबंध है?
थेऊर मंदिर का प्रबंधन कौन करता है?
पुणे से थेऊर कितनी दूर है?
चिंतामणि गणपति मंदिर (अष्टविनायक), थेऊर इन तीर्थ यात्राओं में शामिल है
अन्य प्रसिद्ध मंदिर
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नासिक, महाराष्ट्र भद्रकाली मंदिर (जनस्थान शक्तिपीठ), नासिक माँ भद्रकाली; शक्तिपीठ – भ्रामरी, भैरव विकृताक्ष
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रायगढ़, महाराष्ट्र बल्लालेश्वर गणपति मंदिर, पाली श्री बल्लालेश्वर गणपति; ढुंढी विनायक
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पुणे, महाराष्ट्र गिरिजात्मज गणपति मंदिर (अष्टविनायक), लेण्याद्री श्री गिरिजात्मज गणपति (गुफा की शिला में स्वयंभू विग्रह)
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पुणे, महाराष्ट्र महागणपति मंदिर (अष्टविनायक), रांजणगाँव श्री महागणपति, ऋद्धि-सिद्धि सहित
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Kolhapur, महाराष्ट्र श्री महालक्ष्मी (अंबाबाई) मंदिर, कोल्हापुर माँ महालक्ष्मी (अंबाबाई)
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पुणे, महाराष्ट्र मयूरेश्वर (मोरेश्वर) गणपति मंदिर, मोरगाँव श्री मयूरेश्वर (मोरेश्वर) गणपति, सिद्धि-बुद्धि सहित