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कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी

भक्तिरस – BhaktiRas

गिरिजात्मज गणपति मंदिर (अष्टविनायक), लेण्याद्री

Girijatmaj Ganapati Temple (Ashtavinayak), Lenyadri

पुणे, महाराष्ट्र श्री गिरिजात्मज गणपति (गुफा की शिला में स्वयंभू विग्रह)

गिरिजात्मज गणपति मंदिर पुणे जिले के जुन्नर के पास लेण्याद्री की पहाड़ी पर प्राचीन गुफाओं में स्थित गणेश जी का मंदिर है। यह अष्टविनायक यात्रा का छठा स्थान है और आठों में अकेला ऐसा मंदिर है जो पहाड़ी पर तथा चट्टान काटकर बनी बौद्ध गुफा के भीतर है। कुकडी नदी के तट के पास, जुन्नर से लगभग 5 किमी उत्तर में स्थित यह स्थान आस्था और इतिहास दोनों का संगम है।

पार्वती की तपस्या की कथा

मान्यता है कि माता पार्वती (गिरिजा) ने पुत्र प्राप्ति की कामना से लेण्याद्री की इन गुफाओं में बारह वर्ष तक तप किया। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर गणेश जी ने उनके पुत्र रूप में जन्म लेने का वर दिया और भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को यहीं प्रकट हुए। गिरिजा के आत्मज (पुत्र) होने के कारण यहाँ वे गिरिजात्मज कहलाते हैं। कथा के अनुसार गणेश जी ने अपना बाल्यकाल भी इसी क्षेत्र में बिताया।

गुफाएँ और विग्रह

लेण्याद्री में लगभग 30 शैलकृत गुफाएँ हैं, जो मूलतः पहली से तीसरी शताब्दी ईस्वी के बीच बौद्ध भिक्षुओं के लिए बनी थीं – इनमें चैत्य (प्रार्थना कक्ष) और विहार (निवास) दोनों हैं। गणेश मंदिर गुफा क्रमांक 7 में है, जो जुन्नर क्षेत्र की सबसे बड़ी गुफा है। इसके भीतर के कक्षों को बाद में गर्भगृह का रूप दिया गया। सिंदूर से लेपित गिरिजात्मज का विग्रह गुफा की शिला में ही उकेरा गया है और स्वयंभू माना जाता है; दीवार से जुड़ा होने के कारण इसकी परिक्रमा नहीं होती। गुफाएँ और मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा संरक्षित राष्ट्रीय महत्त्व के स्मारक हैं।

सीढ़ियों की चढ़ाई

पहाड़ी के नीचे से मंदिर तक लगभग 300 पत्थर की सीढ़ियाँ कई चरणों में बनी हैं। रास्ते में कुकडी घाटी और आसपास की पहाड़ियों का सुंदर दृश्य मिलता है। बुज़ुर्ग या चढ़ाई में असमर्थ श्रद्धालुओं के लिए डोली सेवा उपलब्ध रहती है। गुफा क्षेत्र ASI के अधीन होने से प्रवेश टिकट लगता है।

प्रमुख उत्सव

  • गणेश चतुर्थी: भाद्रपद में – मान्यता के अनुसार गिरिजात्मज के प्रकट होने का दिन।
  • माघी गणेश जयंती पर विशेष पूजा।
  • संकष्टी और अंगारकी चतुर्थी पर भीड़।

यात्रा क्रम और आसपास के दर्शन

अष्टविनायक क्रम में लेण्याद्री थेऊर (चिंतामणि) के बाद और ओझर (विघ्नेश्वर) से पहले आता है; दोनों जुन्नर तालुका में पास-पास हैं, इसलिए यात्री प्रायः एक ही दिन में दोनों के दर्शन करते हैं। जुन्नर का शिवनेरी किला, छत्रपति शिवाजी महाराज का जन्मस्थान, भी निकट ही है।

दर्शन का समय

  • दर्शन: सुबह लगभग 6:00 से शाम लगभग 6:00 बजे तक (दिन के उजाले में)
  • आरती: सुबह और संध्या

गुफा क्षेत्र ASI के अधीन होने से प्रवेश टिकट लगता है। सीढ़ियाँ चढ़ने में लगभग आधा से एक घंटा लगता है, इसलिए सुबह जल्दी पहुँचना अच्छा है।

मुख्य आकर्षण

  • श्री गिरिजात्मज – गुफा क्रमांक 7 की शिला में उकेरा गया स्वयंभू विग्रह।
  • लगभग 30 प्राचीन बौद्ध गुफाएँ, जिनमें चैत्य और विहार हैं।
  • पहाड़ी से कुकडी नदी घाटी का दृश्य।
  • शिवनेरी किला (जुन्नर) – छत्रपति शिवाजी महाराज का जन्मस्थान।
  • पास का अष्टविनायक – ओझर का विघ्नेश्वर।

कैसे पहुँचें

  • सड़क मार्ग: जुन्नर से लगभग 5 किमी उत्तर; पुणे से लगभग 95 किमी (पुणे–नासिक राजमार्ग से नारायणगाँव होकर)। पहाड़ी के नीचे से लगभग 300 सीढ़ियाँ चढ़नी होती हैं।
  • रेल मार्ग: पुणे जंक्शन (लगभग 95 किमी)।
  • हवाई मार्ग: पुणे हवाई अड्डा (लगभग 95 किमी)।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

अष्टविनायक में लेण्याद्री का क्रम क्या है?
पारंपरिक अष्टविनायक यात्रा में लेण्याद्री का गिरिजात्मज छठा स्थान है। यह थेऊर के बाद और ओझर से पहले आता है।
गणपति को गिरिजात्मज क्यों कहते हैं?
मान्यता है कि माता पार्वती (गिरिजा) ने पुत्र प्राप्ति के लिए लेण्याद्री में बारह वर्ष तप किया था। प्रसन्न होकर गणेश जी ने उनके पुत्र रूप में जन्म लिया। गिरिजा के पुत्र होने से वे गिरिजात्मज कहलाते हैं।
लेण्याद्री में कितनी सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं?
मंदिर तक लगभग 300 सीढ़ियाँ हैं, जो कई चरणों में बँटी हैं। चढ़ने में असमर्थ श्रद्धालुओं के लिए डोली सेवा उपलब्ध रहती है।
क्या लेण्याद्री में प्रवेश शुल्क लगता है?
हाँ। लेण्याद्री की गुफाएँ भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा संरक्षित स्मारक हैं, इसलिए सीढ़ियों के आरंभ पर प्रवेश टिकट लेना होता है।
लेण्याद्री अन्य अष्टविनायकों से अलग क्यों है?
लेण्याद्री अकेला अष्टविनायक है जो पहाड़ी पर और प्राचीन बौद्ध गुफा के भीतर स्थित है। यहाँ विग्रह गुफा की दीवार में ही उकेरा गया है, इसलिए परिक्रमा नहीं होती।

गिरिजात्मज गणपति मंदिर (अष्टविनायक), लेण्याद्री इन तीर्थ यात्राओं में शामिल है

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