श्री वरदविनायक मंदिर महाराष्ट्र के रायगड जिले के खालापुर तालुका में खोपोली के पास बसे महड गाँव में स्थित है। पारंपरिक क्रम में यह अष्टविनायक में चौथा स्थान है – मोरगाँव, सिद्धटेक और पाली के बाद। “वरद” अर्थात वर देने वाले विनायक के रूप में यहाँ गणपति की पूजा होती है। ध्यान रहे, यह महड गाँव इसी जिले के महाड शहर से अलग है।
गृत्समद ऋषि की कथा
कथा के अनुसार कौंडिण्यपुर के राजा भीम के पुत्र रुक्मांगद पर ऋषि वाचक्नवी की पत्नी मुकुंदा मोहित हो गई, पर रुक्मांगद ने उसे ठुकरा दिया। तब इंद्र ने रुक्मांगद का रूप धरकर मुकुंदा से संबंध बनाया, जिससे गृत्समद का जन्म हुआ। सत्य जानकर गृत्समद ने माता को शाप दिया और माता ने भी उसे शाप दिया। प्रायश्चित के लिए गृत्समद ने इसी क्षेत्र के पुष्पक वन में गणेश की तपस्या की, वरदान पाया और यहाँ मंदिर की स्थापना की। गणेश ने यहाँ वर दिया, इसलिए वे वरदविनायक कहलाए।
मंदिर और विग्रह
मान्यता है कि वरदविनायक का स्वयंभू विग्रह 1690 में मंदिर के पास के तालाब में डूबा हुआ मिला था। विग्रह पूर्वमुखी है और सूंड बाईं ओर मुड़ी है। वर्तमान मंदिर 1725 में पेशवा के सूबेदार रामजी महादेव बिवलकर ने बनवाया या जीर्णोद्धार किया। मंदिर सादा है; उसके चारों ओर चार हाथियों की प्रतिमाएँ पहरा देती हैं और परिसर में मूषक, नवग्रह और शिवलिंग भी हैं। मान्यता है कि गर्भगृह का तेल का दीप 1892 से अखंड जल रहा है।
गर्भगृह में स्वयं दर्शन
वरदविनायक की एक विशेषता यह है कि यहाँ श्रद्धालु गर्भगृह में जाकर विग्रह के निकट से दर्शन और पूजा कर सकते हैं। प्रतिदिन पंचामृत पूजा होती है और वर्ष भर भक्तों का आना-जाना लगा रहता है।
प्रमुख उत्सव
- माघी उत्सव (माघ शुक्ल चतुर्थी, गणेश जयंती) – सबसे बड़ा उत्सव, भारी भीड़।
- मान्यता है कि माघी उत्सव में प्रसाद के रूप में मिला नारियल खाने से संतान सुख मिलता है।
- भाद्रपद गणेश चतुर्थी पर भी विशेष पूजा और भीड़।
यात्रा क्रम
पाली के बल्लालेश्वर के बाद यात्री महड आते हैं। यहाँ से पारंपरिक क्रम में पुणे के पास थेऊर के चिंतामणि, फिर लेण्याद्रि, ओझर और रांजणगाँव के दर्शन करके यात्रा अंत में फिर मोरगाँव पहुँचकर पूरी होती है। मंदिर मुंबई–पुणे राजमार्ग से लगभग 3 किमी अंदर है, इसलिए दोनों शहरों से आसानी से पहुँचा जा सकता है।
दर्शन का समय
- दर्शन: सुबह लगभग 5:00 से रात 9:00 बजे तक
- पंचामृत पूजा: प्रतिदिन
माघी गणेश जयंती और भाद्रपद गणेश चतुर्थी पर भारी भीड़ रहती है।
मुख्य आकर्षण
- वरदविनायक का स्वयंभू विग्रह – पूर्वमुखी, सूंड बाईं ओर।
- श्रद्धालु गर्भगृह में जाकर स्वयं दर्शन-पूजा कर सकते हैं।
- मान्यता है कि गर्भगृह का दीप 1892 से अखंड जल रहा है।
- चारों दिशाओं में चार हाथियों की प्रतिमाएँ, मूषक, नवग्रह और शिवलिंग।
- मंदिर के पास का तालाब, जिसमें विग्रह मिला था।
कैसे पहुँचें
- रेल मार्ग: खोपोली और कर्जत स्टेशन सबसे निकट हैं।
- सड़क मार्ग: मुंबई–पुणे राजमार्ग से लगभग 3 किमी अंदर, खोपोली के पास; मुंबई से लगभग 80 किमी और पुणे से लगभग 85 किमी।
- हवाई मार्ग: मुंबई या पुणे हवाई अड्डा।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
वरदविनायक का महड रायगड का महाड शहर है क्या?
अष्टविनायक में वरदविनायक का क्रम क्या है?
क्या वरदविनायक के गर्भगृह में जा सकते हैं?
वरदविनायक का विग्रह कहाँ से मिला?
मुंबई से महड कैसे पहुँचें?
वरदविनायक मंदिर, महड (खालापुर) इन तीर्थ यात्राओं में शामिल है
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