अलोपी देवी मंदिर, जिसे अलोपशंकरी मंदिर भी कहते हैं, प्रयागराज के अलोपीबाग में त्रिवेणी संगम क्षेत्र के पास स्थित है। आदि शंकराचार्य से जुड़े अष्टादश शक्तिपीठ स्तोत्र में “प्रयागे माधवेश्वरी” कहा गया है – इस क्रम में प्रयाग का पीठ अष्टादश महाशक्तिपीठों में चौदहवाँ है, और इसे आम तौर पर इसी मंदिर से जोड़ा जाता है। इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ कोई प्रतिमा नहीं है – भक्त एक पालने (डोली) की देवी रूप में पूजा करते हैं।
“अलोप” नाम की कथा
सती के देह-त्याग के बाद जब विष्णु के सुदर्शन चक्र से उनके अंग अलग-अलग स्थानों पर गिरे, तो मान्यता है कि प्रयाग में गिरा अंग यहाँ के कुंड में समाकर “अलोप” (अदृश्य) हो गया। इसी से देवी अलोपी या अलोपशंकरी कहलाईं। स्थानीय परंपरा यहाँ सती के दाहिने हाथ के पंजे के गिरने की बात कहती है। एक लोककथा एक ऐसी दुल्हन की भी है जो डोली से अदृश्य हो गई थी, और बाद में उसकी पूजा अलोपी देवी के रूप में होने लगी।
पालने की पूजा
गर्भगृह में एक कुंड के ऊपर बने मंच पर पालना लटका है। श्रद्धालु इसी पालने को देवी का स्वरूप मानकर दर्शन और पूजा करते हैं। नवरात्रि में गर्भगृह और पालकी को फूलों से विशेष रूप से सजाया जाता है।
स्थान को लेकर मत
प्रयागराज में शक्तिपीठ को लेकर दो मान्यताएँ हैं। अष्टादश परंपरा की “माधवेश्वरी” को अधिकतर अलोपी देवी से जोड़ा जाता है, जबकि 51 शक्तिपीठों की परंपरा प्रायः मीरापुर के ललिता देवी मंदिर को प्रयाग का शक्तिपीठ मानती है, और कुछ लोग माधवेश्वरी को भी ललिता देवी ही मानते हैं। श्रद्धालु प्रायः दोनों मंदिरों के दर्शन करते हैं।
प्रमुख उत्सव
- चैत्र और शारदीय नवरात्रि: नौ दिनों का मेला, विशेष श्रृंगार और भारी भीड़।
- माघ मेला और कुंभ: संगम स्नान के बाद लाखों श्रद्धालु दर्शन करते हैं।
- सोमवार और शुक्रवार को मंदिर के बाहर “माता का मेला” लगता है।
आसपास के दर्शन
अलोपी देवी के साथ त्रिवेणी संगम में स्नान, संगम तट पर लेटे हुए हनुमान जी, किले के भीतर अक्षयवट, मीरापुर का ललिता देवी मंदिर और कल्याणी देवी मंदिर के दर्शन एक ही दिन में किए जा सकते हैं।
दर्शन का समय
- दर्शन: सामान्यतः सुबह लगभग 6:00 से रात लगभग 9:00 बजे तक
नवरात्रि और माघ मेले/कुंभ के समय भीड़ बहुत अधिक रहती है और समय बदल सकता है।
मुख्य आकर्षण
- पालना (डोली) – गर्भगृह में कुंड के ऊपर लटका पालना, जिसकी देवी रूप में पूजा होती है।
- कुंड – मान्यता है कि देवी का अंग यहीं जल में समा गया।
- नवरात्रि मेला और सोमवार-शुक्रवार की भीड़।
- पास में त्रिवेणी संगम, लेटे हनुमान जी और ललिता देवी मंदिर।
कैसे पहुँचें
- रेल मार्ग: प्रयागराज जंक्शन – वहाँ से ऑटो या टैक्सी से अलोपीबाग।
- सड़क मार्ग: अलोपीबाग संगम क्षेत्र और दारागंज के पास है; शहर में ऑटो और ई-रिक्शा उपलब्ध।
- हवाई मार्ग: प्रयागराज हवाई अड्डा (बमरौली)।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
क्या अलोपी देवी मंदिर अष्टादश शक्तिपीठों में है?
अलोपी देवी मंदिर में मूर्ति क्यों नहीं है?
प्रयागराज में सती का कौन सा अंग गिरा था?
अलोपी देवी मंदिर संगम से कितनी दूर है?
अलोपी देवी मंदिर में सबसे अधिक भीड़ कब होती है?
अलोपी देवी (अलोपशंकरी) मंदिर, प्रयागराज इन तीर्थ यात्राओं में शामिल है
अन्य प्रसिद्ध मंदिर
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मथुरा, उत्तर प्रदेश श्रीकृष्ण जन्मभूमि, मथुरा भगवान श्रीकृष्ण (केशवदेव)
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अयोध्या, उत्तर प्रदेश श्री राम जन्मभूमि मंदिर, अयोध्या भगवान श्रीराम (रामलला)
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वाराणसी, उत्तर प्रदेश विशालाक्षी मंदिर, वाराणसी माँ विशालाक्षी; भैरव – काल भैरव
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प्रयागराज, उत्तर प्रदेश ललिता देवी शक्तिपीठ, मीरापुर प्रयागराज माँ ललिता देवी; भैरव – भव
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