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कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी

भक्तिरस – BhaktiRas
संतोषी माता

संतोषी माता

Santoshi Mata

संतोषी माता जी का मूल मंत्र

ॐ श्री संतोषी महामायै नमः

संतोषी माता जी की आरती

संतोषी माता चालीसा

संतोषी माता जी के भजन

संतोषी माता – परिचय

संतोषी माता संतोष, सुख और शांति की देवी हैं। लोक परंपरा के अनुसार वे भगवान गणेश और उनकी पत्नियों रिद्धि-सिद्धि की पुत्री हैं। उनकी पूजा मुख्य रूप से शुक्रवार को होती है, और 16 शुक्रवार का व्रत घर में सुख-समृद्धि, कलह की शांति और मनोकामना पूरी करने के लिए रखा जाता है। संतोषी माता का नाम ही उनका संदेश है – जीवन में संतोष ही सबसे बड़ा धन है।

संतोषी माता के जन्म की कथा

लोक कथा के अनुसार एक बार रक्षाबंधन पर गणेश जी की बहन ने उन्हें राखी बाँधी। यह देखकर गणेश जी के पुत्र शुभ और लाभ उदास हो गए कि उनकी कोई बहन नहीं है जो उन्हें राखी बाँधे। उन्होंने पिता से बहन की इच्छा जताई। तब गणेश जी ने अपनी शक्ति और रिद्धि-सिद्धि के तेज से एक दिव्य कन्या को प्रकट किया। वह कन्या सबको संतोष देने वाली थी, इसलिए उसका नाम संतोषी रखा गया।

संतोषी माता की पूजा उत्तर भारत में बीसवीं सदी में बहुत तेज़ी से लोकप्रिय हुई। उनका उल्लेख प्राचीन पुराणों में नहीं मिलता; उनकी पूजा लोक आस्था और व्रत कथा की परंपरा पर आधारित है। फिर भी करोड़ों परिवारों में शुक्रवार का व्रत श्रद्धा से रखा जाता है।

संतोषी माता का स्वरूप

चित्रों में संतोषी माता कमल पर बैठी, लाल वस्त्र पहने चार भुजाओं वाली देवी के रूप में दिखती हैं। उनके हाथों में तलवार, त्रिशूल और चावल (अन्न) का पात्र रहता है, और एक हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में होता है। गुड़ और चने का भोग उनका सबसे प्रिय प्रसाद है।

16 शुक्रवार व्रत की विधि

  1. किसी भी शुक्ल पक्ष के पहले शुक्रवार से व्रत शुरू करें और लगातार 16 शुक्रवार रखें।
  2. सुबह स्नान कर माता की तस्वीर के सामने जल से भरा कलश रखें और उस पर गुड़-चने से भरी कटोरी रखें।
  3. घी का दीपक जलाएँ, लाल फूल चढ़ाएँ और “ॐ श्री संतोषी महामायै नमः” का जाप करें।
  4. संतोषी माता की व्रत कथा सुनें या पढ़ें, फिर संतोषी माता की आरती करें।
  5. गुड़-चने का प्रसाद बाँटें और कलश का जल घर में छिड़कें। दिन में एक बार भोजन करें।

व्रत के ज़रूरी नियम

  • खटाई बिल्कुल वर्जित है – व्रत करने वाला और परिवार के सदस्य उस दिन नींबू, इमली, दही, अचार जैसी कोई खट्टी चीज़ न खाएँ, न किसी को खिलाएँ।
  • प्रसाद में केवल गुड़ और चना दें; पैसे का दान उस दिन न करें।
  • व्रत के दिन क्रोध, कलह और झूठ से बचें – माता संतोष की देवी हैं।
  • मासिक धर्म के समय उस शुक्रवार को व्रत न गिनें; अगले शुक्रवार से गिनती आगे बढ़ाएँ।

उद्यापन की विधि

16 शुक्रवार पूरे होने पर अगले शुक्रवार को उद्यापन करें। आठ बालकों (संभव हो तो परिवार के) को खीर-पूरी और चने की सब्ज़ी का भोजन कराएँ, दक्षिणा में फल या वस्तु दें (पैसे नहीं)। ध्यान रखें कि उद्यापन के भोजन में भी खटाई न हो। अंत में संतोषी माता चालीसा का पाठ कर व्रत पूर्ण करें।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

संतोषी माता किसकी पुत्री हैं?
लोक परंपरा के अनुसार संतोषी माता भगवान गणेश और रिद्धि-सिद्धि की पुत्री हैं। शुभ और लाभ उनके भाई हैं।
संतोषी माता का व्रत किस दिन रखा जाता है?
संतोषी माता का व्रत शुक्रवार को रखा जाता है। मनोकामना के लिए लगातार 16 शुक्रवार व्रत रखकर उद्यापन किया जाता है।
संतोषी माता के व्रत में क्या नहीं खाना चाहिए?
व्रत के दिन कोई भी खट्टी चीज़ – नींबू, इमली, दही, अचार – नहीं खानी चाहिए। परिवार के अन्य सदस्य भी उस दिन खटाई से बचते हैं।
संतोषी माता को क्या भोग लगाते हैं?
संतोषी माता को गुड़ और भुने चने का भोग लगाया जाता है और यही प्रसाद बाँटा जाता है।
संतोषी माता के व्रत का उद्यापन कैसे करें?
16 शुक्रवार पूरे होने पर आठ बालकों को खीर-पूरी और चने की सब्ज़ी खिलाएँ, दक्षिणा में फल दें और भोजन में खटाई बिल्कुल न रखें।

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