काल भैरव जी का मूल मंत्र
ॐ कालभैरवाय नमः
ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरु कुरु बटुकाय ह्रीं
काल भैरव जी की आरती
काल भैरव चालीसा
काल भैरव जी के भजन
काल भैरव जी के व्रत और त्योहार
काल भैरव जी के प्रसिद्ध मंदिर
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अनंतनाग, जम्मू और कश्मीर श्री अमरनाथ गुफा मंदिर, कश्मीर भगवान शिव (हिमलिंग); शक्तिपीठ – महामाया, भैरव त्रिसंध्येश्वर
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बनासकांठा, गुजरात अंबाजी मंदिर, बनासकांठा माँ अंबा (श्री वीसा यंत्र); भैरव – बटुक
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पूर्व मेदिनीपुर, पश्चिम बंगाल बर्गभीमा मंदिर (विभाष शक्तिपीठ), तमलुक माँ बर्गभीमा (कपालिनी / भीमरूपा); भैरव – सर्वानंद
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कुरुक्षेत्र, हरियाणा श्री देवीकूप भद्रकाली शक्तिपीठ, कुरुक्षेत्र माँ भद्रकाली (सावित्री); भैरव – स्थाणु
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जालंधर, पंजाब श्री देवी तालाब मंदिर (त्रिपुरमालिनी शक्तिपीठ), जालंधर माँ त्रिपुरमालिनी (माँ दुर्गा); भैरव – भीषण
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कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश ज्वाला जी मंदिर (ज्वालामुखी देवी), कांगड़ा माँ ज्वाला (सिद्धिदा / अंबिका) – नौ प्राकृतिक ज्योतियाँ; भैरव – उन्मत्त
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वृंदावन, उत्तर प्रदेश कात्यायनी शक्तिपीठ, वृंदावन माँ कात्यायनी (उमा); भैरव – भूतेश
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कोलकाता, पश्चिम बंगाल कालीघाट काली मंदिर, कोलकाता माँ काली (कालिका); भैरव – नकुलेश्वर
काल भैरव – परिचय
काल भैरव भगवान शिव का उग्र और रक्षक रूप हैं। “काल” का अर्थ है समय और मृत्यु – काल भैरव को समय का स्वामी माना जाता है, जिनसे स्वयं काल भी डरता है। वे काशी के कोतवाल हैं; मान्यता है कि काशी विश्वनाथ के दर्शन के बाद भैरव बाबा के दर्शन किए बिना यात्रा पूरी नहीं होती। भय, शत्रु बाधा, नकारात्मक शक्तियों और अकाल मृत्यु के डर से रक्षा के लिए उनकी पूजा की जाती है।
काल भैरव की उत्पत्ति की कथा
शिव पुराण के अनुसार एक बार ब्रह्मा जी को अपने सृष्टिकर्ता होने का अहंकार हो गया और उन्होंने शिव का अपमान किया। उस समय ब्रह्मा के पाँच मुख थे। शिव के क्रोध से एक प्रचंड रूप प्रकट हुआ – यही काल भैरव थे। उन्होंने अपने नाख़ून से ब्रह्मा का पाँचवाँ मुख काट दिया, जिससे ब्रह्मा का अहंकार नष्ट हुआ। पर ब्रह्म हत्या का पाप लगने से ब्रह्मा का कपाल उनके हाथ से चिपक गया। प्रायश्चित के लिए भैरव तीनों लोकों में भटके और काशी पहुँचते ही कपाल उनके हाथ से छूट गया। जिस स्थान पर कपाल गिरा, उसे कपाल मोचन तीर्थ कहते हैं। तभी से शिव ने उन्हें काशी का रक्षक नियुक्त किया।
यह घटना मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी को हुई मानी जाती है, इसलिए इस दिन काल भैरव जयंती मनाई जाती है। भगवान ब्रह्मा और भगवान शिव के बारे में भी पढ़ें।
भैरव के रूप – बटुक भैरव और अष्ट भैरव
भैरव के दो रूप सबसे अधिक पूजे जाते हैं। काल भैरव उग्र रूप हैं, जिनकी पूजा रक्षा और शत्रु नाश के लिए होती है। बटुक भैरव बाल रूप हैं, जो सौम्य और शीघ्र प्रसन्न होने वाले माने जाते हैं; गृहस्थ लोग प्रायः इन्हीं की पूजा करते हैं। तंत्र ग्रंथों में आठ भैरव – असितांग, रुरु, चंड, क्रोध, उन्मत्त, कपाल, भीषण और संहार – बताए गए हैं, जो आठ दिशाओं की रक्षा करते हैं। हर शक्तिपीठ में देवी के साथ एक भैरव विराजते हैं।
भैरव बाबा का स्वरूप
काल भैरव का रंग श्याम है, गले में मुंडमाला, हाथों में त्रिशूल, खड्ग, दंड और ब्रह्मा का कपाल रहता है। उनका वाहन काला कुत्ता (श्वान) है, इसलिए भैरव भक्त कुत्तों को रोटी खिलाना पुण्य मानते हैं। दंड धारण करने के कारण उन्हें “दंडपाणि” भी कहते हैं – यानी अधर्म करने वालों को दंड देने वाले।
काल भैरव की पूजा विधि
- रविवार, मंगलवार या कालाष्टमी को स्नान कर भैरव मंदिर जाएँ या घर में भैरव जी का चित्र रखें।
- सरसों के तेल का दीपक जलाएँ और सिंदूर, काले तिल व फूल अर्पित करें।
- इमरती, जलेबी या उड़द के बड़े का भोग लगाएँ और नारियल चढ़ाएँ।
- “ॐ कालभैरवाय नमः” मंत्र का 108 बार जाप करें; बटुक भैरव के लिए “ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरु कुरु बटुकाय ह्रीं” मंत्र पढ़ें।
- काल भैरव चालीसा या भैरव चालीसा पढ़ें और बटुक भैरव आरती करें।
- पूजा के बाद काले कुत्ते को रोटी या मीठा खिलाएँ।
काल भैरव के प्रसिद्ध मंदिर
- काल भैरव मंदिर, वाराणसी – काशी के कोतवाल का मुख्य मंदिर, विश्वनाथ मंदिर के पास।
- काल भैरव मंदिर, उज्जैन – यहाँ भैरव जी को मदिरा का भोग लगने की अनोखी परंपरा है। महाकालेश्वर के दर्शन के साथ यहाँ जाने की परंपरा है।
- बटुक भैरव मंदिर, वाराणसी और भैरवनाथ मंदिर, वैष्णो देवी – माता के दर्शन के बाद भैरव दर्शन से यात्रा पूर्ण मानी जाती है।