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कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी

भक्तिरस – BhaktiRas
काल भैरव

काल भैरव

Lord Kaal Bhairav

काल भैरव जी का मूल मंत्र

ॐ कालभैरवाय नमः

ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरु कुरु बटुकाय ह्रीं

काल भैरव जी की आरती

काल भैरव चालीसा

काल भैरव जी के भजन

काल भैरव जी के व्रत और त्योहार

काल भैरव जी के प्रसिद्ध मंदिर

काल भैरव – परिचय

काल भैरव भगवान शिव का उग्र और रक्षक रूप हैं। “काल” का अर्थ है समय और मृत्यु – काल भैरव को समय का स्वामी माना जाता है, जिनसे स्वयं काल भी डरता है। वे काशी के कोतवाल हैं; मान्यता है कि काशी विश्वनाथ के दर्शन के बाद भैरव बाबा के दर्शन किए बिना यात्रा पूरी नहीं होती। भय, शत्रु बाधा, नकारात्मक शक्तियों और अकाल मृत्यु के डर से रक्षा के लिए उनकी पूजा की जाती है।

काल भैरव की उत्पत्ति की कथा

शिव पुराण के अनुसार एक बार ब्रह्मा जी को अपने सृष्टिकर्ता होने का अहंकार हो गया और उन्होंने शिव का अपमान किया। उस समय ब्रह्मा के पाँच मुख थे। शिव के क्रोध से एक प्रचंड रूप प्रकट हुआ – यही काल भैरव थे। उन्होंने अपने नाख़ून से ब्रह्मा का पाँचवाँ मुख काट दिया, जिससे ब्रह्मा का अहंकार नष्ट हुआ। पर ब्रह्म हत्या का पाप लगने से ब्रह्मा का कपाल उनके हाथ से चिपक गया। प्रायश्चित के लिए भैरव तीनों लोकों में भटके और काशी पहुँचते ही कपाल उनके हाथ से छूट गया। जिस स्थान पर कपाल गिरा, उसे कपाल मोचन तीर्थ कहते हैं। तभी से शिव ने उन्हें काशी का रक्षक नियुक्त किया।

यह घटना मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी को हुई मानी जाती है, इसलिए इस दिन काल भैरव जयंती मनाई जाती है। भगवान ब्रह्मा और भगवान शिव के बारे में भी पढ़ें।

भैरव के रूप – बटुक भैरव और अष्ट भैरव

भैरव के दो रूप सबसे अधिक पूजे जाते हैं। काल भैरव उग्र रूप हैं, जिनकी पूजा रक्षा और शत्रु नाश के लिए होती है। बटुक भैरव बाल रूप हैं, जो सौम्य और शीघ्र प्रसन्न होने वाले माने जाते हैं; गृहस्थ लोग प्रायः इन्हीं की पूजा करते हैं। तंत्र ग्रंथों में आठ भैरव – असितांग, रुरु, चंड, क्रोध, उन्मत्त, कपाल, भीषण और संहार – बताए गए हैं, जो आठ दिशाओं की रक्षा करते हैं। हर शक्तिपीठ में देवी के साथ एक भैरव विराजते हैं।

भैरव बाबा का स्वरूप

काल भैरव का रंग श्याम है, गले में मुंडमाला, हाथों में त्रिशूल, खड्ग, दंड और ब्रह्मा का कपाल रहता है। उनका वाहन काला कुत्ता (श्वान) है, इसलिए भैरव भक्त कुत्तों को रोटी खिलाना पुण्य मानते हैं। दंड धारण करने के कारण उन्हें “दंडपाणि” भी कहते हैं – यानी अधर्म करने वालों को दंड देने वाले।

काल भैरव की पूजा विधि

  1. रविवार, मंगलवार या कालाष्टमी को स्नान कर भैरव मंदिर जाएँ या घर में भैरव जी का चित्र रखें।
  2. सरसों के तेल का दीपक जलाएँ और सिंदूर, काले तिल व फूल अर्पित करें।
  3. इमरती, जलेबी या उड़द के बड़े का भोग लगाएँ और नारियल चढ़ाएँ।
  4. “ॐ कालभैरवाय नमः” मंत्र का 108 बार जाप करें; बटुक भैरव के लिए “ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरु कुरु बटुकाय ह्रीं” मंत्र पढ़ें।
  5. काल भैरव चालीसा या भैरव चालीसा पढ़ें और बटुक भैरव आरती करें।
  6. पूजा के बाद काले कुत्ते को रोटी या मीठा खिलाएँ।

काल भैरव के प्रसिद्ध मंदिर

  • काल भैरव मंदिर, वाराणसी – काशी के कोतवाल का मुख्य मंदिर, विश्वनाथ मंदिर के पास।
  • काल भैरव मंदिर, उज्जैन – यहाँ भैरव जी को मदिरा का भोग लगने की अनोखी परंपरा है। महाकालेश्वर के दर्शन के साथ यहाँ जाने की परंपरा है।
  • बटुक भैरव मंदिर, वाराणसी और भैरवनाथ मंदिर, वैष्णो देवी – माता के दर्शन के बाद भैरव दर्शन से यात्रा पूर्ण मानी जाती है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

काल भैरव कौन हैं?
काल भैरव भगवान शिव का उग्र रूप हैं, जो ब्रह्मा के अहंकार को नष्ट करने के लिए प्रकट हुए थे। उन्हें समय का स्वामी और काशी का कोतवाल माना जाता है।
काल भैरव का वाहन क्या है?
काल भैरव का वाहन श्वान (कुत्ता) है। इसलिए भैरव भक्त काले कुत्ते को रोटी खिलाना शुभ मानते हैं।
काल भैरव की पूजा किस दिन करें?
रविवार और मंगलवार भैरव पूजा के लिए शुभ हैं। हर महीने की कृष्ण अष्टमी (कालाष्टमी) और मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी (काल भैरव जयंती) को विशेष पूजा होती है।
काल भैरव और बटुक भैरव में क्या अंतर है?
काल भैरव शिव का उग्र रूप हैं, जिनकी पूजा रक्षा और शत्रु नाश के लिए होती है। बटुक भैरव बाल रूप हैं, जो सौम्य माने जाते हैं और गृहस्थ लोग प्रायः इनकी पूजा करते हैं।
काल भैरव को क्या भोग लगाया जाता है?
काल भैरव को इमरती, जलेबी, उड़द के बड़े और नारियल का भोग लगाया जाता है। सरसों के तेल का दीपक जलाया जाता है।

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