अन्नपूर्णा जी का मूल मंत्र
अन्नपूर्णे सदापूर्णे शंकरप्राणवल्लभे। ज्ञानवैराग्यसिद्ध्यर्थं भिक्षां देहि च पार्वति॥
अन्नपूर्णा जी की आरती
अन्नपूर्णा चालीसा
अन्नपूर्णा स्तोत्र और स्तुति
अन्नपूर्णा जी के व्रत और त्योहार
अन्नपूर्णा जी के प्रसिद्ध मंदिर
माता अन्नपूर्णा – परिचय
माता अन्नपूर्णा अन्न और पोषण की देवी हैं। “अन्न” यानी भोजन और “पूर्णा” यानी भरपूर – वे संसार के हर जीव को भोजन देने वाली हैं। अन्नपूर्णा को माता पार्वती का ही रूप माना जाता है। हिंदू घरों में रसोई को अन्नपूर्णा का स्थान माना जाता है, इसीलिए भोजन बनाने और खाने से पहले उनका स्मरण किया जाता है। मार्गशीर्ष पूर्णिमा को अन्नपूर्णा जयंती मनाई जाती है।
शिव के भिक्षा माँगने की कथा
एक कथा के अनुसार एक बार भगवान शिव ने पार्वती से कहा कि यह संसार माया है और भोजन भी माया का ही हिस्सा है। यह सुनकर पार्वती अंतर्धान हो गईं, ताकि दिखा सकें कि उनके बिना क्या होता है। उनके जाते ही पूरी सृष्टि में अन्न समाप्त हो गया, अकाल पड़ गया और देवता, मनुष्य, जीव-जंतु सब भूख से व्याकुल हो गए।
तब पार्वती काशी में अन्नपूर्णा रूप में प्रकट हुईं और भोजन बाँटने लगीं। स्वयं शिव भी हाथ में भिक्षापात्र लेकर उनके द्वार पहुँचे और भिक्षा माँगी। अन्नपूर्णा ने उन्हें अपने हाथ से भोजन कराया। शिव ने स्वीकार किया कि अन्न माया नहीं, बल्कि जीवन का आधार है और शरीर के बिना साधना भी संभव नहीं। इसी कथा के कारण काशी को ऐसी नगरी माना जाता है जहाँ कोई भूखा नहीं सोता।
काशी का अन्नपूर्णा मंदिर
वाराणसी में काशी विश्वनाथ मंदिर के पास माता अन्नपूर्णा का प्रसिद्ध मंदिर है। मान्यता है कि विश्वनाथ के दर्शन के बाद अन्नपूर्णा माता के दर्शन ज़रूर करने चाहिए। दीपावली के बाद अन्नकूट के समय यहाँ माता की स्वर्ण प्रतिमा के दर्शन होते हैं, जो साल में कुछ ही दिन खुलते हैं, और भक्तों को अन्न-धन का “खजाना” प्रसाद के रूप में बाँटा जाता है।
अन्नपूर्णा का स्वरूप
माता अन्नपूर्णा रत्नजड़ित सिंहासन पर बैठी दिखाई जाती हैं। उनके एक हाथ में अन्न (खीर) से भरा पात्र और दूसरे में कलछी (दर्वी) रहती है। सामने भिक्षापात्र लिए भगवान शिव खड़े होते हैं। आदि शंकराचार्य का रचा अन्नपूर्णा स्तोत्र उनकी सबसे प्रसिद्ध स्तुति है, जिसकी हर पंक्ति “भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी माताऽन्नपूर्णेश्वरी” पर समाप्त होती है।
रसोई में अन्नपूर्णा पूजा
- रसोई को साफ़ रखें और वहाँ एक कोने में अन्नपूर्णा माता का छोटा चित्र या प्रतिमा रखें।
- शुक्रवार या पूर्णिमा को दीपक जलाकर लाल फूल, रोली और अक्षत चढ़ाएँ।
- घर में बना पहला भोजन – खीर या चावल – माता को अर्पित करें।
- “अन्नपूर्णे सदापूर्णे…” मंत्र पढ़ें, फिर अन्नपूर्णा चालीसा और अन्नपूर्णा आरती करें।
अन्न का सम्मान – अन्नपूर्णा की सच्ची पूजा
- भोजन कभी व्यर्थ न करें; थाली में उतना ही लें जितना खा सकें।
- भोजन से पहले भगवान को भोग लगाएँ या मन में धन्यवाद करें।
- भूखे को भोजन कराना अन्नपूर्णा की सबसे बड़ी सेवा मानी जाती है।
- चूल्हे या गैस को पैर न लगाएँ और रसोई में झूठे बर्तन रात भर न छोड़ें।