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कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी

भक्तिरस – BhaktiRas
माता पार्वती

माता पार्वती

Goddess Parvati

पार्वती जी का मूल मंत्र

ॐ उमायै नमः

ॐ गौरी शंकराय नमः

पार्वती जी की आरती

पार्वती चालीसा

पार्वती स्तोत्र और स्तुति

पार्वती जी के भजन

पार्वती जी के व्रत और त्योहार

पार्वती जी के प्रसिद्ध मंदिर

माता पार्वती – परिचय

माता पार्वती भगवान शिव की अर्धांगिनी, आदिशक्ति का सौम्य रूप और गणेश व कार्तिकेय की माता हैं। वे पर्वतराज हिमालय (हिमवान) और रानी मैना की पुत्री हैं, इसलिए उन्हें पार्वती, शैलजा और गिरिजा कहा जाता है। सुहाग, प्रेम, धैर्य और तप की देवी के रूप में विवाहित स्त्रियाँ और अच्छे वर की कामना करने वाली कन्याएँ उनकी विशेष पूजा करती हैं।

सती से पार्वती तक – पुनर्जन्म की कथा

पुराणों के अनुसार शिव की पहली पत्नी सती प्रजापति दक्ष की पुत्री थीं। दक्ष के यज्ञ में शिव का अपमान होने पर सती ने योगाग्नि में देह त्याग दी। वही सती अगले जन्म में हिमवान के घर पार्वती बनकर जन्मीं। इसीलिए शिव और पार्वती का संबंध जन्म-जन्मांतर के प्रेम का प्रतीक माना जाता है।

शिव को पाने के लिए कठोर तपस्या

सती के वियोग में शिव गहरी समाधि में थे। पार्वती ने उन्हें पति रूप में पाने के लिए वर्षों तक कठोर तप किया – पहले फल खाकर, फिर केवल पत्ते खाकर और अंत में पत्ते भी त्यागकर। पत्ते (पर्ण) भी न खाने के कारण उनका नाम “अपर्णा” पड़ा। उनकी परीक्षा लेने स्वयं शिव ब्राह्मण का वेश धरकर आए और शिव की निंदा की, पर पार्वती अपने निश्चय से नहीं डिगीं। तब शिव ने प्रसन्न होकर विवाह स्वीकार किया। यही कथा हरतालिका तीज व्रत का आधार है।

पार्वती के रूप

शाक्त परंपरा में पार्वती को आदिशक्ति माना जाता है, जिनसे दुर्गा, काली और नवदुर्गा के रूप प्रकट होते हैं। नवरात्रि के पहले दिन पूजी जाने वाली शैलपुत्री और आठवें दिन की महागौरी उन्हीं के रूप हैं। अन्नपूर्णा के रूप में वे संसार का पोषण करती हैं। उग्र रूपों के बारे में देवी दुर्गा का पेज देखें।

शिव-पार्वती परिवार

शिव-पार्वती का परिवार आदर्श गृहस्थ जीवन का प्रतीक है। उनके पुत्र भगवान गणेश को पार्वती ने अपने उबटन से बनाकर प्राण दिए, और कार्तिकेय देवताओं के सेनापति बने। परिवार के वाहन – शिव का नंदी, पार्वती का सिंह, गणेश का मूषक और कार्तिकेय का मोर – एक-दूसरे के स्वाभाविक शत्रु होते हुए भी साथ रहते हैं, जो सहनशीलता का संदेश देता है। भगवान शिव के बारे में और पढ़ें।

माता पार्वती के व्रत और त्योहार

पूजा विधि

  1. स्नान के बाद शिव-पार्वती की प्रतिमा या चित्र को साफ़ चौकी पर रखें।
  2. माता को लाल चुनरी, सिंदूर, चूड़ियाँ, बिंदी और मेहंदी जैसी सुहाग सामग्री अर्पित करें।
  3. लाल फूल, अक्षत और रोली चढ़ाएँ; शिव जी को बेलपत्र और जल अर्पित करें।
  4. खीर या फल का भोग लगाएँ और “ॐ उमायै नमः” का 108 बार जाप करें।
  5. पार्वती चालीसा पढ़ें और पार्वती माता की आरती करें।

अविवाहित कन्याएँ अच्छे वर के लिए “हे गौरी शंकरार्धांगि यथा त्वं शंकरप्रिया। तथा मां कुरु कल्याणि कान्तकान्तां सुदुर्लभाम्॥” मंत्र का जाप करती हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

माता पार्वती के माता-पिता कौन हैं?
माता पार्वती पर्वतराज हिमवान (हिमालय) और रानी मैना की पुत्री हैं। इसीलिए उन्हें शैलजा, गिरिजा और पार्वती कहा जाता है।
पार्वती को अपर्णा क्यों कहते हैं?
शिव को पाने के लिए तपस्या करते समय पार्वती ने पत्ते (पर्ण) खाना भी छोड़ दिया था, इसलिए उनका नाम अपर्णा पड़ा।
क्या सती और पार्वती एक ही हैं?
हाँ, पुराणों के अनुसार दक्ष की पुत्री सती ने देह त्याग के बाद हिमवान के घर पार्वती के रूप में जन्म लिया और फिर से शिव से विवाह किया।
माता पार्वती की पूजा किस दिन करनी चाहिए?
सोमवार को शिव-पार्वती की साथ पूजा शुभ मानी जाती है। सावन के मंगलवार को मंगला गौरी व्रत और भाद्रपद शुक्ल तृतीया को हरतालिका तीज का व्रत रखा जाता है।
अच्छे वर के लिए पार्वती का कौन सा मंत्र पढ़ें?
अविवाहित कन्याएँ "हे गौरी शंकरार्धांगि यथा त्वं शंकरप्रिया। तथा मां कुरु कल्याणि कान्तकान्तां सुदुर्लभाम्॥" मंत्र का जाप करती हैं।

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