नृसिंह जी का मूल मंत्र
ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम्। नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम्॥
नृसिंह जी की आरती
नृसिंह चालीसा
नृसिंह स्तोत्र और स्तुति
नृसिंह जी के व्रत और त्योहार
भगवान नृसिंह – परिचय
भगवान नृसिंह (नरसिंह) भगवान विष्णु के दस अवतारों में चौथे अवतार हैं – आधा मनुष्य (नर) और आधा सिंह। उन्होंने अपने भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए खंभे से प्रकट होकर अत्याचारी असुर हिरण्यकशिपु का वध किया था। नृसिंह भगवान भक्त की रक्षा, भय के नाश और बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक हैं। वैशाख शुक्ल चतुर्दशी को उनका प्राकट्य दिवस नृसिंह जयंती मनाया जाता है।
हिरण्यकशिपु का वरदान
भागवत पुराण के अनुसार असुर राजा हिरण्यकशिपु के भाई हिरण्याक्ष को भगवान विष्णु ने वराह अवतार में मारा था। बदला लेने के लिए हिरण्यकशिपु ने ब्रह्मा जी का कठोर तप किया और ऐसा वरदान माँगा जिससे वह लगभग अमर हो जाए – उसे न कोई मनुष्य मार सके न पशु, न दिन में न रात में, न घर के अंदर न बाहर, न धरती पर न आकाश में, न किसी अस्त्र से न शस्त्र से। वरदान पाकर उसने तीनों लोकों पर कब्ज़ा कर लिया और स्वयं को भगवान घोषित कर दिया।
भक्त प्रह्लाद की कथा
हिरण्यकशिपु का पुत्र प्रह्लाद जन्म से ही विष्णु भक्त था। पिता ने उसे भक्ति छोड़ने के लिए कई बार मारने की कोशिश की – पहाड़ से गिरवाया, हाथियों से कुचलवाया, विष दिया और अपनी बहन होलिका की गोद में बैठाकर आग में जलाना चाहा। हर बार प्रह्लाद बच गए और होलिका जल गई – इसी की याद में होलिका दहन होता है।
अंत में क्रोधित हिरण्यकशिपु ने पूछा – “क्या तुम्हारा विष्णु इस खंभे में भी है?” प्रह्लाद ने कहा – “हाँ, वे सब जगह हैं।” हिरण्यकशिपु ने खंभे पर प्रहार किया और उसी खंभे से भगवान नृसिंह प्रकट हुए।
वरदान की हर शर्त का पालन
भगवान ने ब्रह्मा के वरदान को तोड़े बिना हिरण्यकशिपु का अंत किया:
- वे न पूरे मनुष्य थे न पूरे पशु – नर-सिंह रूप।
- समय न दिन था न रात – संध्या (गोधूलि) का समय।
- जगह न घर के अंदर न बाहर – महल की देहरी (चौखट)।
- न धरती न आकाश – भगवान की जंघा (गोद) पर।
- न अस्त्र न शस्त्र – केवल नाख़ूनों से।
वध के बाद भी भगवान का क्रोध शांत नहीं हुआ। देवता डर गए, तब बालक प्रह्लाद ने स्तुति की और भगवान शांत होकर उन्हें गोद में बैठाया। इसीलिए नृसिंह भगवान को भक्तवत्सल कहा जाता है।
नृसिंह पूजा विधि
- नृसिंह जयंती या शनिवार को स्नान कर भगवान नृसिंह और लक्ष्मी जी की तस्वीर स्थापित करें।
- नृसिंह जयंती पर पूजा संध्या (प्रदोष काल) में करें, क्योंकि भगवान इसी समय प्रकट हुए थे।
- चंदन, तुलसी दल, लाल फूल और अक्षत चढ़ाएँ; गुड़ के पानी (पानकम) और फल का भोग लगाएँ।
- “ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुं…” मंत्र का जाप करें।
- नरसिंह चालीसा पढ़ें और नरसिंह भगवान की आरती करें।
प्रसिद्ध नृसिंह मंदिर
- अहोबिलम (आंध्र प्रदेश) – नौ नृसिंह मंदिरों का समूह; मान्यता है कि यहीं भगवान प्रकट हुए थे।
- सिंहाचलम (विशाखापत्तनम) – वराह-नृसिंह मंदिर; मूर्ति साल भर चंदन से ढकी रहती है।
- यादगिरिगुट्टा (तेलंगाना) और मंगलगिरि (आंध्र प्रदेश) – मंगलगिरि में भगवान को पानकम का भोग लगता है।
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